June 25, 2017

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फिलस्तीन की फिक्र किसे है

भारत पहला गैर-अरब मुल्क था जिसने फिलस्तीन को मान्यता दे उससे राजनीतिक संबंध स्थापित किया।

Author March 13, 2017 05:24 am
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिलस्तीन में अपने समकक्ष रियाद अल-मलिकी से हाथ मिलाती हुईं।

केसी त्यागी

यों तो सैन्य व राजनीतिक उथल-पुथल से पूरा पश्चिम एशिया अशांत है लेकिन इजराइल में प्रधानमंत्री के रूप में बेंजामिन नेतन्याहू की वापसी और फिलस्तीनी मुद््दों पर उनके रुख से फिलस्तीन खासा परेशान है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा फिलस्तीनी जमीन पर उपनिवेशन को लेकर पारित प्रस्ताव का इजराइली प्रधानमंत्री द्वारा ठुकराया जाना तथा कई अवसरों पर अमेरिका के पूर्व शासन को चुनौती देना, नए नेतृत्व के कड़े तेवर का परिचायक है। यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद, जिसका जिक्र पैगंबर के साथ किया जाता है, को लेकर विशेष विवाद है। यह मस्जिद दुनिया भर के मुसलमानों के लिए तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। इन दिनों मस्जिद में फिलस्तीनियों के आने-जाने पर कई तरह के अवरोध खड़े किए गए हैं, जिनमें नमाजियों की तलाशी तथा प्रार्थना के दौरान लाउडस्पीकर की आवाज कम करना भी शामिल है।

फिलस्तीनी सरजमीं पर दिनोंदिन बढ़ती इजराइली आक्रामकता न सिर्फ फिलस्तीनियों के लिए बड़ा संकट है बल्कि सभी अरब मुल्कों के लिए चिंता का बड़ा विषय बना हुआ है। बीसवीं सदी में शुरू हुए इजराइल-फिलस्तीन विवाद का अब तक कोई समाधान नहीं दिख रहा है। विवाद का ऐतिहासिक कारण फिलस्तीन में रहने वाले यहूदी, आॅटोमन तथा अरब आबादी के बीच का टकराव है जिसे सुलझाने में संयुक्त राष्ट्र समेत विश्व समुदाय अब तक नाकाम रहा है। एक दूसरे के अस्तित्व को मान्यता, सीमा-सुरक्षा, जल अधिकार, धार्मिक हस्तक्षेप, यरुशलम पर नियंत्रण, इजराइली बस्तियां, आजादी आंदोलन तथा शरणार्थियों की समस्या आदि आज भी टकराव के अहम मुद््दे हैं। वर्ष 1914 में जब फिलस्तीन तुर्की के आॅटोमन सामा्रज्य का हिस्सा था, लाखों की संख्या में अरब और यूरोप से हजारों की संख्या में आए यहूदी निवास करते थे। इन्हीं दिनों ब्रिटेन के तत्कालीन विदेशमंत्री लॉर्ड बलफोर ने यहूदियों से फिलस्तीन को उनका घर बनाने का वादा किया था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद फ्रांस का सीरिया, ब्रिटेन का फिलस्तीन तथा जॉर्डन पर शासन स्थापित हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले यानी 1939 तक यूरोप से लाखों की संख्या में यहूदी फिलस्तीन पहुंचे, जिसका फिलस्तीनियों ने कड़ा विरोध किया। यहूदियों के दावे वाले इन इलाकों में अरब फिलस्तीनियों की आबादी बस चुकी थी। 1922 से ये इलाके ब्रिटिश हुकूमत के कब्जे में होने के बावजूद दोनों पक्षों ने अपने अस्तित्व के लिए गृहयुद्ध जारी रखा। इसी दौरान 30 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा यहूदियों व अरबों के लिए विवाद वाले इलाके में बंटवारे की योजना को सहमति प्रदान कर दी गई। समझौते के अनुसार 15 मई 1948 को इस क्षेत्र से अंग्रेजी शासन समाप्त हुआ और इजराइल व फिलस्तीन दो अलग राष्ट्र बने।

पड़ोसी अरब मुल्कों को यह बंटवारा रास नहीं आया और अरब-इजराइल युद्ध से लेकर अब तक वर्चस्व का संघर्ष चलता आया है। 1948 के युद्ध में अरबों को मात खानी पड़ी। इस युद्ध ने लाखों लोगों को शरणार्थी बना दिया। इस दौरान फिलस्तीन का एक बड़ा हिस्सा इजराइल के कब्जे में आ गया। वर्ष 1964 में फिलस्तीन लिबरेशन आॅर्गनाइजेशन (पीएलओ) अस्तित्व में आया। पांच वर्ष बाद यासर अरफात की अल फतह वहां की सत्ता में आई। अरफात के नेतृत्व में समाधान का मार्ग प्रशस्त होता था। उनके रहते पश्चिम एशिया में बहुत हद तक शांति भी बहाल हुई, पर 2007 में गाजापट्टी में फिलस्तीनियों की आजादी के संघर्ष में कट्टर व आक्रामक रणनीति को बढ़ावा देने वाले हमास के काबिज होने के बाद संघर्ष हिंसक व अनियंत्रित हो चुका है।

इस दिशा में अब वैश्विक प्रयासों से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है। हाल के दिनों में पश्चिम एशिया के राष्ट्र इस विषय गंभीर दिखे हैं। इसी वर्ष 21 और 22 फरवरी को ईरान की राजधानी तेहरान में फिलस्तीनी एकजुटता को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें लगभग डेढ़ सौ मुल्कों के सांसदों व राजनायिकों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन से फिलस्तीन समर्थकों में एक बार फिर से उत्साह का संचार हुआ है। इससे पूर्व 28-29 नवंबर 2016 को एक ऐसा ही आयोजन तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में हुआ था जिसमें अनेक देशों के सांसदों व अन्य राजनेताओं ने हिस्सेदारी की थी। सम्मेलन में तुर्की के राष्ट्रपति ने फिलस्तीन की समस्या और फिलस्तीनियों की बदहाली का जिक्र किया तो ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अली खामेनी ने विश्व समुदाय से एकजुट हो फिलस्तीन में शांति बहाली की अपील की। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्ताव 242 तथा 338 का अमल न करने पर इजराइल सरकार की निंदा भी की गई। फिलस्तीनी भूभाग के अलावा यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद भी चर्चा का विषय रही। पर अफसोस कि इन तमाम प्रसंगों में फिलस्तीन के महान नेता यासर अरफात का जिक्र तक नहीं था।

यह राहत की बात है कि अपनी बाहरी तथा आंतरिक राजनीतिक समस्याओं से घिरे होने के बावजूद तुर्की फिलस्तीनियों की सुध लेता है। आंदोलन के कम होते प्रभाव का एक कारण यह भी है कि अब अमेरिका के दखल की निंदा कम होने लगी है। इजराइल सरकार की आलोचना अब भी होती है लेकिन यहूदीवाद को लेकर जितनी चर्चा होनी चाहिए, नहीं होती। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही यहूदियों ने वहां डेरा जमाना शुरू कर दिया था जिसे अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का खुला समर्थन प्राप्त था। उस समय अब्दुल गुलाम नासिर अरब के बड़े नेता के रूप में उभरे थे जिनका फिलस्तीन को खुला समर्थन था। साठ के दशक में पंडित नेहरू के गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जोर पकड़ने पर चाउ-एन-लाइ, मार्शल टीटो, एनक्रुमा तथा सुकर्णो जैसे नेता फिलस्तीन के समर्थन में खुलकर आगे आए थे। भारत पहला गैर-अरब मुल्क था जिसने फिलस्तीन को मान्यता दे उससे राजनीतिक संबंध स्थापित किया। दुखद है कि उसी कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री नरसिंह राव केकार्यकाल में (1992 में) इजराइल को भारत ने मान्यता दी। इससे देश की गुटनिरपेक्षता की साख पर सवाल खड़े हुए। इसके बाद से भारत-इजराइल सैन्य संबंध परवान चढ़े और कई लाख करोड़ रुपए के रक्षा सौदे तय किए गए जो भारत की स्वघोषित फिलस्तीन नीति के विरुद्ध भी है।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप और भारत में नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने से फिलस्तीनियों की चिंताएं बढ़ी हैं। ये चिंताएं इजराइल से बढ़ती नजदीकियों को लेकर हैं। मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे जिनकी इजराइल यात्रा प्रस्तावित है, लेकिन फिलस्तीन से गुरेज है। इससे पहले की सरकारें ऐसे विषयों पर संतुलित निर्णय लेती रहीं। जहां तक अमेरिका के रुख का सवाल है, वह अब एकतरफा होता जा रहा है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से सबसे ज्यादा खुशी इजराइल को ही है। कारण यह कि ओबामा प्रशासन संतुलित नीति पर काम कर रहा था। पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिलस्तीन-इजराइल संघर्ष पर समाधान के रूप में ‘एक राष्ट्र’ के एजेंडे का संकेत दिया है। इसी वर्ष फरवरी में इजराइली संसद द्वारा एक नया ‘सेटलमेंट बिल’ अनुमोदित किया गया है जो फिलस्तीनी भूभाग पर इजराइल द्वारा बसाई गई अवैध बस्तियों को मान्यता प्रदान करता है। हालांकि इस बिल की निंदा वहां की विपक्षी दलों द्वारा भी की जा रही है, लेकिन वैश्विक हस्तक्षेप नदारद है। ऐसी भी खबरें हैं कि ट्रंप प्रशासन फिलस्तीन में रुचि नहीं ले रहा है। इस दिशा में एक कदम आगे बढ़कर नई सरकार फिलस्तीनियों को दी जाती आ रही अनुदान की राशि भी बंद करने का एलान कर चुकी है। ऐसे संकेतों के बीच शक की गुंजाइश नहीं बचती कि अमेरिका की नीति क्या होने वाली है? इसलिए वक्त आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र समेत सभी फिलस्तीन समर्थक देश न्याय की गुहार में एकजुट हों।
लेखक जद (यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

 

 

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First Published on March 13, 2017 5:24 am

  1. चक्रपाणि पांडेय
    Mar 13, 2017 at 4:39 pm
    भारत को इजराइल के साथ अच्छेे सम्बन्ध बनाने चाहिए.
    Reply
    1. H
      hh
      Mar 14, 2017 at 4:49 am
      के.से त्यागी अपने बेटी मुल्लो को ब्यह दे
      Reply
      1. R
        Raghuvansi
        Mar 13, 2017 at 6:43 pm
        Tyagi ji aap to bologe hi kyonki aap secular ho .... History always change .... Kya aap jante hai ki ye Arab ne apne past main kitna katle aam machaya tha ..uske mukable isreal ne kuch nahi kiya .... Kyonki jahan ye musalman rahega wahan aman shanti kavi nahi aa sakti ...ye Muslim duniya ka cancer hai aur hame vi in cancer SE nijat pane ki jarurat hai lekin aap jaise neta ki vajah SE ye cancer apna sad uthta hai aur hame hi bejjat karta hai ... Mat bhulye is dharti par Mahabharata ho chuka hai .
        Reply
        1. R
          raj kumar
          Mar 14, 2017 at 3:58 am
          इसराइल भारत का शुरू से अच्छा व् सच्चा दोस्त रहा है इसके मुकाबले फिलिस्तीन ने क्या किया हमें सिर्फ अपने देश के बारे में सोचना चाहिए खली आदर्शवाद से देश का कितना भला हुआ है एक इराक का सद्दाम हुसेन ही था जो भारत को समर्थन करता था इसलिए हमें गांधीजी की तरह गलती नहीं करनी चाहिए देश के लिए जो अच्छा है वही करना चाहिए सुक्र है की हमारा मौजूद प्रधानमंत्री सिर्फ देश के लिए सोचता है और पहले के प्रधानमंत्री अंतराष्ट्रीय नेता बनने के चक्कर में देश का ही नुकसान कर गए कश्मीर का मसला इसका उदहारण है -धन्यवाद
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          1. R
            raj kumar
            Mar 14, 2017 at 4:40 am
            जदयू नेता बजाय फलस्तीन के अपने देश के बारे में सोचे इसराइल पाक युद्ध में हमारे साथ खड़ा था उसने भारत का हमेशा साथ दिया है हमें दुनियाभर के मुस्लिमो के बजाय अपने देश के हर नागरिक के बारे में सोचना होगा सिर्फ कोरा आदर्शवाद हमारा भला नहीं कर सकता
            Reply
            1. Load More Comments
            सबरंग