ताज़ा खबर
 

जवाबदेही से पलायन

बीसवीं सदी के मध्यकाल में विश्व के अनेक देश स्वतंत्र हुए और सभी ने जनतंत्र को अपनाने का प्रयास प्रारंभ किया।
बुधवार को राज्यसभा में हंगामा करते विपक्षी दल। (Photo: PTI)

बीसवीं सदी के मध्यकाल में विश्व के अनेक देश स्वतंत्र हुए और सभी ने जनतंत्र को अपनाने का प्रयास प्रारंभ किया। अधिकांश उसमें सफल नहीं हुए और लगभग एक दशक बाद यह कहा जाने लगा कि भारत में प्रजातांत्रिक सिद्धांतों की नींव सही तथा गहराई तक रखी जा चुकी है। यह अपने आप में सही आकलन था। प्रशासकीय ‘अनुभवहीन नेताओं तथा अनपढ़ मतदाताओं’ ने आश्चर्यजनक ढंग से इसमें सफलता पाई थी। वैशाली और लिच्छवी जैसे गणराज्यों की हजारों साल पहले स्थापित हुई परंपराओं के सातत्य का इसमें कितना योगदान रहा होगा यह तो कह पाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन ही होगा, पर कहीं न कहीं इनके संबंधों की निरंतरता का आभास तो अवश्य ही होता है। अत: इसे याद करना तो तर्कसंगत ही माना जाना चाहिए।

1947 के बाद भारतीय जनतंत्र का जो स्वरूप निर्धारित होकर 1950 में संविधान के रूप में स्वीकृत हुआ उसके निर्धारण में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों का नि:स्वार्थ योगदान था। ये वे लोग थे जो त्याग, राष्ट्र-सेवा तथा जन-सेवा के अर्थ को नैतिक और नीतिपरक मार्ग पर जीवन जीकर अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर पहचान चुके थे। वे जानते थे कि गांधीजी के विचारों के पीछे की सोच में पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति ही सबसे महत्त्वपूर्ण क्यों था! वे यह भी जानते थे कि गांधीजी से बड़े मतभेद होने के बावजूद उनकी श्रेष्ठता और नेतृत्व को सभी वर्गों के लोग क्यों स्वीकार कर लेते थे। ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ का मंत्र दूरदराज के क्षेत्रों में भी उन लोगों ने क्यों अपना लिया था जिन्हें शायद कभी गांधीजी से मिलने का या उन्हें प्रत्यक्ष देखने का अवसर भी न मिला हो!
प्रचार-प्रसार के टेलीविजन तथा ‘सोशल मीडिया’ जैसे संसाधन तब उपलब्ध नहीं थे, रेडियो तथा समाचारपत्रों की पहुंच भी सीमित ही थी। इस सब के बावजूद गांधी नैतिकता तथा अहिंसा के सिद्धांतों पर चलने के लिए सारे देश को तैयार कर सके, यह अपने आप में सामान्य उपलब्धि नहीं थी। आज का युवा यह सोच भी नहीं पाता है कि राजनेताओं पर जनता पूर्णरूपेण विश्वास कर सकी होगी तथा उनके त्याग और बलिदान की सराहना करती थकती नहीं होगी।

विश्व भर में भारत के नव-जनित गणतंत्र की जड़ें जमाने का श्रेय पंडित नेहरू को दिया गया, क्योंकि गांधीजी के बाद बाहर उन्हीं का नाम सर्वविदित था। उस समय के युवाओं का मनोबल इससे बढ़ता था, अपने पर, अपने देश के नेताओं पर, तथा प्रजातंत्र के मूल्यों पर उनकी आस्था गहरी होती थी। भारत में स्वतंत्रता के बाद के अगले दो दशक में गांधीजी के सिद्धांतों को समझने वाली तथा तदनुसार आचरण करने वाली पीढ़ी ओझल होने लगी। चयनित प्रतिनिधियों की सुख-सुविधाएं और विशेषाधिकार लगातार बढ़ते गए। जब उन्होंने एक बार रास्ता देख लिया, फिर वे अपने लिए सुख-सुविधाएं, वेतन-भत्ते, धन-आवंटन, विशेषाधिकार और और न जाने कितने ही प्रावधान उन्होंने स्वयं अपने लिए निर्धारित कर लिये। सुख-सुविधाएं बढ़ती गर्इं, उसी अनुपात में जनता से और उसकी समस्यायों से दूरी भी बढ़ती गई। दूसरी तरफ नौकरशाहों की पकड़ कसती गई। फलस्वरूप हर लोकसेवक केवल ‘अधिकारी’ होकर गया, उसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, मनोरंजन आदि की जिम्मेवारी जनता से इकट्ठा किए गए सरकारी खजाने से अलग विशेष व्यवस्था से होने लगी। अधिकारी-स्तर द्वारा पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के शोषण का ‘सामान्यीकरण’ हो गया।

सभी ने देखा, जाना, सुना: बड़े-बड़े वायदे किए गए कि स्थिति सुधरेगी, मगर जिन्हें सुधारना था उन्हें तो कहीं कोई असुविधा थी ही नहीं। वे अपने में ही मगन थे और आज भी हैं। निजी स्कूल खुलते गए, निजी अस्पताल बनते गए, और उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों तथा अस्पतालों में हर पक्ष नीचे की तरफ ही लुढ़कता गया। भारत की संसद की गरिमा इस वर्ष के अंतिम माह में केवल इसलिए घटी है क्योंकि आज देश के सम्माननीय जनप्रतिनिधि अपने बेलगाम होते अहं पर थोड़ा भी नियंत्रण करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। यदि ऐसा न होता तो निश्चित ही नोट-बंदी से होने वाली असुविधाओं से जूझते लोगों को उन्हीं के जनप्रतिनिधि पूरी तरह दरकिनार नहीं कर देते! वे पक्ष-विपक्ष को भूल कर समाधान निकालते, लोगों के साथ खड़े होते, उन लंबी कतारों में खड़े होकर यह दर्शाते कि वे उनसे अलग नहीं हैं। काश! एक सांसद तो ऐसा मिलता जो कहता कि चूंकि सत्र नहीं चला अत: वह उस दौरान अपना वेतन और भत्ते नहीं लेगा!

हवा जहरीली होती गई, नदियां या तो सूख गर्इं या प्रदूषित होकर समाप्ति के स्तर पर पहुंचने लगीं, गांव वीरान होते गए। बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी गगनचुंबी अट्टालिकाएं लगातार उभरने लगीं, किसान विस्थापित होते गए, गांव वीरान होते गए, और भारत प्रगति के रास्ते पर सरपट दौड़ने लगा था! भारत के युवाओं के लिए स्वर्णिम काल में चार सौ चतुर्थ श्रेणी के सरकारी पदों के लिए चौबीस लाख युवा प्रार्थना पत्र देने लगे। फर्जी उपाधियों के आधार पर आचार्य ही नहीं, कुलपति और मंत्री तक हटाए गए! साक्षरता बढ़ी, मगर कक्षा छह के आधे से अधिक बच्चे कक्षा दो की पुस्तक पढ़ना नहीं सीख पाए! कोई बात नहीं, साक्षरता दर तो पचहत्तर फीसद के आसपास पहुंच गई है! क्या यह छोटी उपलब्धि है? कतई नहीं! मगर इस उपलब्धि का सार-तत्त्व क्या है? इसका गूढ़ार्थ भी शिक्षा-व्यवस्था के स्रोत में ही निहित है।

पश्चिमी देशों ने भारत को असभ्य माना, बाद में यहां के चिंतन को सराहा मगर अव्यावहारिक करार दिया। यहां के साहित्य, संगीत, कला, वास्तु, विज्ञान, गणित की श्रेष्ठता को कभी स्वीकारा ही नहीं। मानव जीवन के आचार-विचार-व्यवहार के स्रोत तो इन्हीं में निहित थे। जीवन जीने की भव्यता के उदाहरण भारत में हर तरफ उपलब्ध हैं। एक खजुराहो ही इंगित कर देता है कि भौतिक जीवन, अर्थ और काम को कभी नकारा नहीं गया। उसका आनंद और उपभोग मानवीय गरिमाओं में रह कर करने पर कोई रोक-टोक नहीं लगाई गई। आध्यात्मिकता के मूल तत्त्व जन-जन तक पहुंचे, हर गृहस्थ ने उन्हें जाना और अपनाया। ये सदा ही सर्वमान्य थे, और आज भी हैं। प्रकृति के प्रति सम्मान, अपरिग्रह जैसे मूल्य किसको हानि पहुंचा सकते हैं?

यह सही है कि कुछ दर्शन प्रकृति को केवल मानव के उपभोग के लिए सृजित हुई मानते हैं, पर आज वे भी उसके दुष्परिणाम देख ही नहीं, भोग भी रहे हैं। सुधार के प्रयास भी कर रहे हैं, मगर शोषण, केंद्रीकरण तथा अनियंत्रित उपभोग पर कोई लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। समाज तथा सभ्यताओं के आज एक दूसरे से अलग रह कर विकसित होने का समय तो बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है। अब सभी का भाग्य पूरी तरह से जुड़ गया है। अत: मानव को प्रकृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व समेकित सोच के आधार पर ही निभाने का निर्णय लेना होगा। सभी जानते हैं कि सही राह कौन-सी है। अपने भाइयों का सबकुछ हड़पने के लिए सारे नीतिगत कर्तव्य और पारिवारिक तथा मानवीय संबंधों को सत्ता-अहंकारवश नकारने वाला दुर्योधन जब सबकुछ यहीं छोड़ कर जाने लगा तब महर्षि वेद व्यास जी ने चार शब्दों में मानव जीवन की सारी विडंबनाओं का सार संकलित कर दिया था: जानामि धरमम् न च मे प्रवृत्ति:, जानामि अधर्मम् न च मे निवृत्ति:। समाधान के प्रयास तो पुन: मनुष्य के मष्तिष्क से ही उत्पन्न होंगे। उसे ही सद्-आचरण के मार्ग पर लाने के प्रयास करने होंगे। और यह ज्ञान के पथ पर चल कर संभव होगा, जिसके लिए कहा गया है; ज्ञान का पंथ कृपाण की धार। इस पर चलने को कौन तैयार हैं?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग