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विरोधाभासों का कारोबार

बीती दीपावली की शाम का समय था। लोग त्योहार की खरीदारी करके अपने-अपने घरों को लौटने की तैयारी में थे।
आरटीओ जनवरी 2017 से हो जाएंगे कैशलैस। (FILE PHOTO)

बीती दीपावली की शाम का समय था। लोग त्योहार की खरीदारी करके अपने-अपने घरों को लौटने की तैयारी में थे। इंटरनेट-ऐप के जरिए टैक्सी मंगवाने के प्रयास हो रहे थे। मगर लोग उस पल हक्के-बक्के रह गए जब टैक्सी सेवा देने वाली कंपनियों (मुख्यतया उबर और ओला) के किरायों में सामान्य दरों की तुलना में दो सौ फीसद से ज्यादा तक का उछाल नजर आने लगा। कुछ व्यस्त मार्गों पर तो उछाल सामान्य किरायों की तुलना में तीन सौ फीसद तक था। लोगों की मजबूरी का फायदा उठा कर मुनाफे कूटने की इस तरकीब का खूब विरोध हुआ।

दिन के व्यस्त समय में दुगुना से तिगुना किराया वसूलने के इस तरीके को कंपनियों ने ‘सर्ज प्रायसिंग’ (किरायों में उछाल) का नाम दिया। जब एक सीमा से अधिक संख्या में लोग एक ही मार्ग पर वाहनों की मांग करेंगे तो किरायों में उछाल आना स्वाभाविक है। जब मुंबई में महाराष्ट्र सरकार और नई दिल्ली में दिल्ली सरकार ने इन कंपनियों के नियमन के संबंध में कायदे-कानून बनाने के प्रयास किए तो उन कोशिशों की जमकर आलोचना हुई। कहा गया कि सरकार फिर से लाइसेंस-कोटा-परमिट राज दौर के प्रतिबंध कंपनियों पर लादना चाहती है। सरकारी हस्तक्षेप से नवाचार की प्रवृत्ति ठप हो जाएगी। ओला कंपनी ने बाकायदा मीडिया में बयान जारी करके कहा कि उनका कारोबारी मॉडल बेहद नया है। सरकारी नियमन-हस्तक्षेप के पुराने मानकों पर उन्हें नहीं तोला जा सकता। इन कंपनियों के साथ ही खुले बाजार के समर्थक जानकारों ने भी सरकार को मसले से दूर रहने की ही सलाह दी। तर्क था कि यह बाजार की दिक्कतें हैं और कंपनियां इनसे अपने-आप निपट लेंगी। सरकारी हस्तक्षेप फायदे के बजाय नुकसान अधिक करेगा।

अब यह मामला एक सौ अस्सी डिग्री के कोण पर पलट चुका है। बीते दिनों दो मुख्य भारतीय यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप (याद रहे, एक अरब डॉलर का कारोबारी आंकड़ा छूने वाली तकनीकी स्टार्ट-अप कंपनियों को यूनिकॉर्न कहा जाता है) कंपनियों- ओला और फ्लिपकार्ट- के प्रमुखों ने खुले तौर पर सरकार से गुहार लगाई कि उन्हें उबर और अमेजन जैसी विदेशी कंपनियों से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्द्धा से बचाया जाए। ओला कंपनी के प्रमुख भावेश अग्रवाल का कहना था कि विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय इकाइयों में अकूत पैसा लगा रही हैं और उनके पास विश्वस्तरीय तकनीक भी है। ऐसे में, अगर सरकार ने संरक्षण मुहैया नहीं करवाया तो ओला और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां अपने विदेशी समकक्षों उबर और अमेजन के सामने नहीं टिक पाएंगी। इस विरोधाभास को कैसा समझा जाए? कुछ रोज पहले तक विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर सरकार को दूर रहने की नसीहतें देने वाली कंपनियां अब सरकार से सुरक्षा-कवच मांग रही हैं। जब वैश्वीकरण के दौर में सरकार अपनी घरेलू कंपनियों को खास तरह की सहूलियतें मुहैया करवाती है तो ऐसे प्रयासों को ‘संरक्षणवाद’ कहा जाता है। दूसरे लफ्जों में कहें तो फ्लिपकार्ट और ओला जैसी भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियां सरकार से संरक्षणवादी कदम उठाने की मांग कर रही हैं!

वैश्वीकरण और डब्ल्यूटीओ के दौर में जब दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं आपस में गुंथी हुई हैं और मुक्त व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति प्रदान कर चुकी है, तब संरक्षणवादी कदम उठाए जा सकते हैं या नहीं, यह सवाल अपनी जगह पर है। मौजूं बात यह है कि जिन तर्कों के सहारे सरकार से संरक्षणवादी कदम उठाए जाने की मांग हो रही है, कंपनियां अतीत में उन्हीं तर्कों के विपरीत छोर पर खड़ी थीं, या उनका प्रदर्शन संदेह-भरा था। मसलन, फ्लिपकार्ट के सहसंस्थापक सचिन बंसल का तर्क था कि भारत सरकार को अपनी घरेलू कंपनियों को संरक्षण देना चाहिए। क्या ये कंपनियां वास्तव में ‘घरेलू’ कंपनियां हैं। फ्लिपकार्ट का ही उदाहरण लीजिए। इस कंपनी के अधिकतर निवेशक विदेशी हैं। फ्लिपकार्ट की सबसे बड़ी निवेशक संस्था ‘टागइर ग्लोबल’ भी एक विदेशी कंपनी है। यह सीधा-सादा तथ्य है कि कंपनी का अंतिम लक्ष्य अपने शेयरधारकों का मुनाफा बढ़ाना होता है। जब कंपनी के निवेशक विदेशी हैं तो फायदा भी उन्हें ही मिलेगा। फिलवक्त फ्लिपकार्ट में 66 फीसद हिस्सेदारी विदेशी निवेशकों और संस्थाओं की है, तो इस कंपनी को किस मापदंड से भारतीय कहा जा सकता है?

यही नहीं, फ्लिपकार्ट कंपनी आधिकारिक तौर पर सिंगापुर में पंजीकृत है। ऐसे में इसे किस बिना पर भारतीय कंपनी माना जाए? क्या कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी के पद पर एक भारतीय नागरिक बैठा है, इसलिए उसे भारतीय कंपनी माना जाए। अगर इस तर्क को स्वीकार करें तो उबर और अमेजन भी भारतीय कंपनियां ही कहलाएंगी, क्योंकि इनकी भारतीय इकाइयों का परिचालन भी भारतीय लोग ही संभाल रहे हैं। उबर व अमेजन ही क्यों, अधिकतर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भारतीय इकाइयों का परिचालन भारतीय लोगों के पास है। कई मामलों में तो भारतीय लोग बड़ी कंपनियों के संपूर्ण वैश्विक परिचालन को देख रहे हैं, तो क्या उन्हें भारतीय कंपनियां समझा जाए? यही इस संपूर्ण मामले में बड़ा विरोधाभास है। जब कंपनियां पूंजी लेते समय देश की परवाह नहीं करती, परिचालन के समय उन्हें सरकार का दखल नहीं चाहिए और पंजीकरण तथा शेयर बाजार में सूचीबद्धता के समय वे सिंगापुर और न्यूयार्क जाती हैं तो मुनाफे के समय सरकार की याद क्यों? क्या ये कंपनियां रोजगार देते समय सामाजिक रूप से वंचित समूहों को प्राथमिकता देने की सरकारी नीति की परवाह करती हैं? सरकार से लाइसेंस नहीं चाहिए, सरकार के नियमन का विरोध है बल्कि आज के कारोबारी हलकों में सरकार शब्द अपने-आप में हिकारत का पर्याय बन गया, तो फिर प्रतिस्पर्द्धा के समय सरकार से गुहार क्यों?

दरअसल, आज के बदले हुए परिवेश में परिचालन कर रही कंपनियां शायद ही देशी कंपनी की परंपरागत परिभाषा पर खरी उतरें। पूंजी की प्रकृति ही किसी कंपनी का मालिकाना हक तय करती है और आज चाहे फ्लिपकार्ट हो या अमेजन, सब में ऐसे निवेशकों का पैसा लगा है जो किसी भी राष्ट्रीयता के दायरे में नहीं बंधे हैं। इन निवेशकों का पैसा उसी दिशा में जाता है, जहां अधिकतम मुनाफे की संभावना होती है। कंपनी चाहे भारत की हो या अमेरिका की, इस बात की बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रह गई है। ऐसे में संरक्षणवादी फैसलों से किसी कंपनी के कारोबार को बचाने की बात बेमानी और हास्यास्पद है।
आज का कारोबार तकनीक पर टिका हुआ है। यहां एक तकनीक को नई तकनीक प्रतिस्थापित कर रही है और पुरानी स्थापित कंपनियों को नई कंपनियां पछाड़ रही हैं। मशहूर पत्रिका ‘इकोनॉमिस्ट’ ने इस प्रक्रिया को चौथी औद्योगिक क्रांति की संज्ञा दी है। जाहिर है, इस दौर में सरकार के संरक्षणवादी कदम भी बहुत दूर तक सहारा नहीं दे पाएंगे। वैसे भी, उदारीकरण की राह पर हम इतना आगे निकल आए हैं कि अब संरक्षणवादी कदम उठाने से विदेशी निवेश आकर्षित करने वाले देश के रूप में भारत की छवि पर खराब असर पड़ने की संभावना ज्यादा है और इन कदमों से फायदा होने की गुंजाइश बेहद कम है।

आज के दौर में पूंजी नए विचारों पर दांव लगाती है और पुरानी लकीर पर चलने वाली कंपनियां स्वत: खत्म हो जाती हैं। सरकार से गुहार लगाने के बजाय फ्लिपकार्ट और ओला को चाहिए कि अपने परिचालन में बदलाव करें और ग्राहकों की उम्मीदों पर खरा उतर कर उबर और अमेजन का सामना करें। अगर सरकार संरक्षणवादी कदम उठा भी लेती है, तब भी अगर सेवा की गुणवत्ता में कमजोरी है, तो ग्राहक उन्हें नकार देंगे। बेहतर होगा, सरकार कंपनियों की चूहादौड़ से दूर रहे। जिस तरह पानी देर-सबेर अपना स्तर हासिल कर लेता है, उसी तरह कारोबार के मानकों और ग्राहकों की उम्मीदों पर खरी उतरने वाली कंपनियां अपना वजूद बरकरार रखती हैं।

 

 

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