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विकास की राह में एनपीए का रोड़ा

बढ़ते एनपीए के कारण विकास दर में अपेक्षित तेजी नहीं आ पा रही है।
Author October 14, 2016 04:20 am
भारत अब लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैश्विक तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है। (express Photo)

गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की गर्मी से अर्थव्यवस्था का चेहरा भी अब मलिन पड़ने लगा है। बढ़ते एनपीए के कारण विकास दर में अपेक्षित तेजी नहीं आ पा रही है। वैश्विक स्तर पर भारत की विकास दर बहुत तेज है, लेकिन अब भी हमारे देश में समावेशी विकास नहीं हो रहा है। यहां विकास में सभी की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। निजी क्षेत्र का योगदान विकास में अपेक्षा से बहुत कम है। आधारभूत संरचना को मजबूत करने की सरकारी कोशिश, सरकारी खर्च में बढ़ोतरी, सबसिडी आदि के कारण ही विकास दर में रफ्तार बनी हुई है। सरकार ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टैंड अप इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ आदि संकल्पना को साकार करने की कोशिश कर रही है। बैंकों से कहा गया है कि वे जरूरतमंदों को कर्ज देने से न हिचकें। कारोबारी आसानी से कारोबार कर सकें, इसके लिए सरकार कर-संचरना में लचीलापन व राहत, सबसिडी की व्यवस्था जैसे सकारात्मक कदम उठा रही है। सरकार चाहती है कि जल्द से जल्द वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हो, ताकि कारोबारियों को कारोबार करने में किसी तरह की परेशानी न हो। बावजूद इसके, सरकार के प्रयासों को सफल बनाने के लिए अभी तक निजी क्षेत्र का साथ उसे नहीं मिल सका है। गौरतलब है कि अगस्त, 16 में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 0.7 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई है।

हालांकि सरकार को बीमारी का पता चल चुका है; वह समझ चुकी है कि निजी निवेश बढ़ाने के लिए एनपीए का इलाज जरूरी है। लंबे समय से बढ़ते एनपीए के कारण बैंकों को भारी-भरकम राशि का प्रावधान करना पड़ रहा है, जिससे कारण उनके लाभ में निरंतर कमी आ रही है। चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में एनपीए के कारण अनेक बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।  इधर, पूंजी की भारी किल्लत के कारण नीतिगत दरों में कटौती का पूरा लाभ बैंक ग्राहकों को नहीं दे पा रहे हैं। इससे देश में रोजगार को बढ़ावा, विकास को बल, उत्पादन में इजाफा, विविध उत्पादों की बिक्री में तेजी, अर्थव्यवस्था में मजबूती आदि नहीं आ पा रही है। वैसे एक अनुमान के मुताबिक मुद्रास्फीति में अभी और भी कमी आने की संभावना है। अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से ब्याज दरों में आगे और कटौती की गुंजाइश बनेगी, जिससे पूंजी की कमी दूर होगी और बैंक ग्राहकों को कर्ज देने में समर्थ हो सकेंगे। लेकिन पूंजी की कमी दूर करने का यह अस्थायी इलाज है और इस उपाय से विकास की गति स्थायी रूप से कायम नहीं रखी जा सकता है।

आज की तारीख में घटते मुनाफे और बढ़ते एनपीए के कारण बैंक जरूरतमंदों को कर्ज देने से परहेज कर रहे हैं। सितंबर, 16 में कर्ज-वृद्धि दर घट कर महज 9.3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जो स्थिति की भयावहता को दर्शाती है, जबकि विकास दर में तेजी बरकरार रखने के लिए कम से कम बीस से पच्चीस प्रतिशत की अग्रिम वृद्धि दर होनी चाहिए। अगर मौजूदा माहौल में सुधार नहीं होता है तो उद्योग जगत के लिए कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। विकास के लिए निजी निवेश जरूरी है। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और विकास दर में इजाफे के लिए आवश्यक है कि बैंक कारोबारियों को कर्ज-वितरण में कोताही न बरतें, क्योंकि उद्योग जगत को कर्ज मिलने से ही विनिर्माण क्षेत्र में तेजी, आधारभूत संरचना को मजबूती, रोजगार में बढ़ोतरी, विविध उत्पादों की बिक्री में तेजी, अर्थव्यवस्था में गति लाना आदि संभव हो सकता है।

बैंकों के एनपीए ने कितना विकराल रूप ले लिया है, इसका पता रिजर्व बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा से भी चलता है। चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही के अंत तक द्वितीय अनुसूची में शामिल वाणिज्यिक बैंकों का सकल एनपीए बढ़ कर कुल ऋण के 8.7 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि मार्च 2015 में यह 4.6 प्रतिशत और मार्च, 16 में 7.8 प्रतिशत था। रिजर्व बैंक ने मार्च, 17 तक सकल एनपीए अनुपात के 8.5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया है। बहरहाल, सरकार एक ऐसी योजना बनाने की दिशा में अग्रसर है, जिससे तेजी से बढ़ते एनपीए पर काबू पाया जा सकेगा। सरकार तीन तरह की रणनीति पर विचार कर रही है, जिसमें ऐसेट स्वेप, हर बैंक में उसकी परिस्थिति को ध्यान में रख कर एनपीए पर काबू पाने की पहल तथा एनपीए बैंक बनाना शामिल है।
एक आकलन के मुताबिक, अगर एनपीए पर तुरंत काबू नहीं पाया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था भी मंदी के भंवर में फंस सकती है। फिलवक्त, अर्थव्यवस्था और अग्रिम वृद्धि की जो स्थिति है उसमें सुधार के लिए बहुत विकल्प शेष नहीं बचे हैं। ताइवान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया में विनिर्माण पर आधारित अर्थव्यवस्था जब तेजी से बढ़ रही थी तो वहां कर्ज और जीडीपी का अनुपात 130 प्रतिशत था, जबकि भारत में यह आज महज 56 प्रतिशत है।

हाल ही में बैंकों को सीमित मात्रा में एसेट स्वेप की इजाजत दी गई है। कुछ कंपनियों में कर्ज के बदले बैंक उसके शेयर हासिल कर रहे हैं। एसेट्स के बदले बॉन्ड जारी करने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है। रियल एस्टेट कंपनियों के मामलों में कर्ज के बदले जमीन लेने की कोशिश की जा सकती है। एनपीए बैंक द्वारा सभी तरह के एनपीए एसेट्स को खरीदने का प्रस्ताव है। हालांकि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन इस संकल्पना को अपनाने के विरुद्ध थे। राजन के मुताबिक ऐसे मामले निजी बैंकों के एनपीए के संदर्भ में उपयुक्त हो सकते हैं, लेकिन भारत में एनपीए का बड़ा हिस्सा सरकारी बैंकों के पास है। लिहाजा, एनपीए एसेट का मूल्यांकन करना आसान नहीं है। हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर ऊर्जित पटेल की नियुक्ति के बाद ऐसे प्रस्ताव पर विचार किए जाने की संभावना बढ़ गई है।

सरकारी बैंक लंबी अवधि वाली परियोजनाओं जैसे ऊर्जा उत्पादन, आधारभूत संरचना आदि की परियोजनाओं को कर्ज देने से परहेज कर रहे हैं। ऐसी परियोजनाओं के लिए आमतौर पर सात से बारह साल के लिए कर्ज दिए जाते हैं। हालांकि बैंककर्मियों का कहना है कि ऊर्जा व बंदरगाह से जुड़ी परियोजनाओं के लिए कर्ज की मांग में कमी आई है। लंबी अवधि के लिए कर्ज नहीं देने के कारण सरकारी बैंक अब पांच साल से अधिक के मियादी जमा भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं, और सरकारी बैंकों की पूंजी लागत चूंकि अधिक है, इसलिए वे कर्ज पर प्रभारित किए जाने वाले ब्याज को भी कम नहीं कर पा रहे हैं।
अमूमन ब्याज दर कम रहने पर ग्राहक लंबी अवधि का कर्ज लेने से परहेज करते हैं। देखा गया है कि ब्याज दर कम रहने पर ग्राहक दो से तीन साल तक के लिए कर्ज लेते हैं और बाद में उसे कम ब्याज दर पर पुन: कर्ज दे देते हैं, जिससे उनकी ब्याज देनदारी कम हो जाती है। गौरतलब है कि अधिक रेटिंग वाली जिन कंपनियों ने पहले बारह या तेरह प्रतिशत पर कर्ज लिया था, वे एनपीए से बचने के लिए दस से ग्यारह प्रतिशत पर उनका पुनर्वित्तीयन कर रहे हैं, जिससे बैंकों के लाभ पर दबाव बना हुआ है और उनके लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल भी सृजित हो रहा है।

पहले किए गए करारनामे के आधार पर बैंक लंबी मियादी जमा पर अब भी कुछ ग्राहकों को नौ से दस प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहे हैं, जिसके कारण उनके मार्जिन या स्प्रेड में उल्लेखनीय कमी आई है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक पांच साल या इससे अधिक की मियादी जमाओं में कुल जमा का योगदान मार्च, 14 तक 18.6 प्रतिशत था, जो मार्च 2015 में घट कर 5.9 प्रतिशत के स्तर पर आ गया। ऐसे में लंबी अवधि की मियादी जमा स्वीकार करने से बैंकों को नुकसान होना लाजिमी है। बैंकों द्वारा इस तरह की नीति अपनाने का कारण संपत्ति व देनदारी के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, जिससे पूंजी की कमी न हो और मुनाफे में भी बढ़ोतरी की गुंजाइश बनी रहे।

कहा जा सकता है कि बढ़ते एनपीए ने बैंकिंग अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है और अब एनपीए की आंच से देश की अर्थव्यवस्था झुलस रही है। आज एनपीए और पुनर्गठित कर्ज की राशि दस लाख करोड़ से भी अधिक हो चुकी है और बासेल तृतीय के विविध मानकों को पूरा करने के लिए भी बैंकों को अलग से अरबों-खरबों रुपए की जरूरत है। स्पष्ट है, इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था करने में न तो सरकार समर्थ है और न ही बैंक। विकास दर में तेजी कायम रखने के लिए विनिर्माण क्षेत्र में गतिशीलता, औद्योगिक क्षेत्र में वृद्धि, विविध उत्पादों की बिक्री में तेजी, रोजगार-निर्माण में बढ़ोतरी आदि की जरूरत है, लेकिन कर्ज न मिलने के कारण कल-कारखाने बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं। इसी कारण ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टैंड अप इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ आदि संकल्पनाओं को लागू करने की गति बहुत धीमी है। जाहिर है, जब कारोबारी कमाएंगे नहीं तो विकास में अपनी भागीदारी कैसे सुनिश्चित करेंगे। लिहाजा, अगर समय रहते सरकार ने एनपीए का इलाज नहीं किया तो भारत मंदी की चपेट में आ सकता है।

 

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First Published on October 14, 2016 4:18 am

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