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विकल्प एक रचना पक्ष है

न केवल आवाज उठाना, बल्कि उन आवाजों को संरक्षित करने का काम भी मीडिया ही करता है जिससे जनता के जीवन में बदलाव की, खुशहाली की इबारत लिखी जाती रही है।
Author March 25, 2017 04:45 am
प्रतीकात्मक चित्र।

पत्रकारिता सत्ता व जन के बीच जीवन, विचार, सोच व स्वप्न को साझा करने और जीवन के एकाकी पक्ष में विकल्प की आवाज बनने का भी मंच है। विकल्प तभी संभव होता है जब कोई एक पक्ष जनता के पूरे सच को सामने नहीं रख पाता। विकल्प एक रचना पक्ष है। रचना का प्रतिपक्ष ही समाज व सभ्यता संस्कृति की आवाज बनकर मनुष्यता का संरक्षण करती है। मनुष्यता के इस संरक्षण को हर दौर में पत्रकारिता संरक्षित करने का काम करती है। यह कार्य ही स्वतंत्र मन-मस्तिष्क की रचना भी करता है। इसलिए मीडिया में हमेशा से विकल्प की आवाजों के लिए जगह मौजूद रहती है।  एक तरह से देखा जाए तो यह सभ्यता का पाठ है। इस तरह सभ्यता व संस्कृति की गतिविधियां सतत रूप से चलती हैं जिसे स्वतंत्र मीडिया संरक्षित करने का काम करता है। आज मीडिया अपने परंपरागत रूप से अलग हटकर एक स्वतंत्र तकनीक का रूप लेता जा रहा है, जहां जितने मुंह उतनी तरह की बातें हैं। लेकिन जिम्मेदारी का अहसास नहीं। यह स्वतंत्र मीडिया कितना सच की रखवाली करता है या कितना सत्याभास को रखता है इसे कौन तय करेगा? मीडिया एक तरह से जनता व सत्ता के बीच जन-भागीदारी के मंच के रूप में काम करता है। इसके इसी रूप पर जनता का भरोसा बनता है। न केवल आवाज उठाना, बल्कि उन आवाजों को संरक्षित करने का काम भी मीडिया ही करता है जिससे जनता के जीवन में बदलाव की, खुशहाली की इबारत लिखी जाती रही है।

मीडिया स्वयं में एक तरह की सत्ता है। अगर इस सच को हमारे मीडिया संस्थान समझते हों तो प्रशिक्षण के दौरान जिन सवालों व सच से गुजरना पड़ता है, जिसका जिक्र ‘बेबाक बोल’ में किया गया है वह न होता। आपने सही कहा है, ‘छात्रा ने मुझे इस बात का अहसास कराया कि हर संस्थान एक स्कूल भी होता है। हमारा लिखना, बोलना हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है तो हमें अपनी साख को लेकर सजग होना ही होगा’। किसकी साख बनेगी यह सारे सवाल मीडिया के सामने हमेशा से उठते रहे हैं। विश्वास की कसौटी पर खरे बने रहना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। यह विश्वास जितना बड़ा होता है, उतनी ही बड़ी ताकत भी मीडिया की होती है। इसलिए एक सजग मीडिया संस्थान हमेशा जनता से कमाए भरोसे को कायम रखने के लिए ही अपना सब-कुछ दांव पर लगाता है। लेकिन आज विराट पूंजी के आने से समझौते की शक्लें भी सामने आ रही हैं। क्या सच इतना सिकुड़ गया है कि उसे किसी भी रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है या सच की जगह झूठ को भी सच सा दिखलाया जा सकता है। क्या तकनीक से भाग पाना संभव है? या नए सिरे से आवाजें सामने आएंगी।

वैश्विक पूंजी के इजारेदारी के इस समय में यह दावा करना कि हमने कुछ रचा है यह तभी संभव होगा जब कुछ नया सोच रहे होंगे। नया कुछ करने का जज्बा तभी संभव हो सकता है जब एकरसता को तोड़कर अपनी आवाज व अपने मन को, साथ में अपने विचार को समझने का भी जतन करें। पर अब स्वप्न देखना भी एक पीड़ादायक अनुभव होता जा रहा है। यातना में विचार या रचनात्मकता कैसे जन्म लेगी? या तो सब लोग खुशहाल दिखाए जा रहे हैं या जो नहीं हंै उसकी छवि बनाने में सब एक जैसे ही दिख रहे हैं। यह थोड़ा सा अलग जो दिखने की बात एक जमाने में आदर्श के रूप में सामने आती थी अब कहां चली गई? यदि कहीं नहीं गई और यहीं है तो दिखाई क्यों नहीं दे रही है? चारों तरफ एक चुप्पी या एक ही शोर दिखाई दे रहा है जिसे इस वैश्विक युग की पूंजी रच रही है। क्या सब कुछ पैसा ही रचेगा या कुछ हमारे स्वप्न भी बनाएंगे? जाहिर है जिसे हमारे स्वप्न रचते हैं वही हमारे विचार व सरोकार को भी जन्मने के कारक बनते हैं। यह तकनीक से आगे मनुष्य के जीवन व विचार की दुनिया का सवाल है जिसे मनुष्य अपने आत्मिक आनंद व वैचारिकी के लिए रचता है। यह रचनात्मक स्वतंत्रता ही जीवन है। हमारी दुनिया का सबसे बड़ा सच जिसे तकनीक नहीं बल्कि विचार के बीच जीवित एक इंसान रचता है। यह इंसानों की दुनिया कभी भी विकल्पहीन नहीं होती।
-विवेक कुमार मिश्र, समृद्धि नगर स्पेशल, बारां रोड, कोटा (राजस्थान)।

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