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मोटे अनाज से कुपोषण मुक्ति

कुपोषण की व्यापकता एकांगी हरित क्रांति और गेहूं-चावल केंद्रित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की देन है।
प्रति घंटा तीन से ज्यादा बच्चे कुपोषण के चलते होने वाली बीमारियों से मरते हैं। (Express File Photo)

इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक ओर देश के गोदाम अनाज से भरे हुए हैं और दूसरी ओर कुपोषण के मामले में भारत शीर्ष स्थान पर है। वैश्विक भूख सूचकांक 2016 के मुताबिक कुपोषण-भुखमरी के मामले में एक सौ अठारह देशों में भारत सत्तानबेवें पायदान पर है। इस सूची में भारत की पड़ोसी देशों- नेपाल, चीन और बांग्लादेश से भी बुरी हालत है। इस रिपोर्ट में 48.01 फीसद महिलाओं को खून की कमी का शिकार बताया गया है। संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत में कुपोषण के संबंध में जो आंकड़े जारी किए हैं वे अंतरराष्ट्रीय स्तर से कई गुना ज्यादा हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक भारत में कुपोषण के कारण हर साल पांच साल से कम उम्र के लगभग दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है।

देखा जाए तो कुपोषण की व्यापकता एकांगी हरित क्रांति और गेहूं-चावल केंद्रित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की देन है। गौरतलब है कि 1960 के दशक में सी. सुब्रमण्यम, एमएस स्वीमानाथन और बी. शिवरामन ने जिस हरित क्रांति का आगाज किया उसका दायरा गेहूं, धान जैसे अनाज और पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत के चुनिंदा इलाकों तक सिमटा रहा। इन क्षेत्रों में केंद्र सरकार भारतीय खाद्य निगम के जरिए अनाज की सरकारी खरीद की पक्की व्यवस्था की। आगे चल कर भारतीय खाद्य निगम की देखादेखी इन राज्यों ने अपने-अपने खरीद और भंडारण तंत्र का विकास किया, लेकिन वहां भी गेहूं, धान की प्रमुखता बनी रही। इससे इन राज्यों में गेहूं-धान किसानों की मजबूत राजनीतिक लॉबी का विकास हुआ और राज्य सरकारें इस लॉबी को खुश करने और अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए गेहूं, धान पर बोनस देने लगीं।

गेहूं-धान केंद्रित सरकारी खरीद नीति का नतीजा यह हुआ कि गेहूं, धान, गन्ना, कपास के रकबे में तेजी से बढ़ोतरी हुई। दूसरी ओर दलहन, तिलहन और दूसरे मोटे अनाजों का रकबा सिकुड़ता गया। अब किसान इन फसलों की खेती अनुर्वर और सीमांत भूमि पर और अपनी जरूरत भर का करने लगे। इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो जैसे पौष्टिक और रेशेदार अनाज बाजार और भोजन की थाली से गायब हो गए। इतना ही नहीं, इससे भूजल के चिंताजनक स्तर तक नीचे गिरने, मिट्टी के पोषक तत्त्वों में गिरावट, उर्वरकों का बढ़ता इस्तेमाल जैसी समस्याएं पैदा हुर्इं। गेहूं-धान केंद्रित कृषि विकास के कई अन्य दुष्परिणाम भी निकले। फसल चक्र का पालन न होने से असंतुलित फसल प्रणाली को बढ़ावा मिला, जिससे मिट्टी कमजोर हुई। इसे गेहूं के उदाहरण से समझा जा सकता है। हरित क्रांति के शुरू में कुल खाद्यान्न उत्पादन में गेहूं की हिस्सेदारी महज तेरह फीसद थी, जो आज बढ़ कर अड़तीस फीसद तक पहुंच गई है। इस प्रकार एकफसली खेती के बढ़ते चलन से न सिर्फ खेती, बल्कि थाली की भी विविधता घटी और हम बारहों महीने कुछेक अनाज खाने लगे। देश में कुपोषण की व्यापकता का मूल कारण यही है।

नवंबर से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के पूरे देश में लागू होने के बाद यह दावा किया जा रहा है कि अब कोई व्यक्ति भूख से नहीं मरेगा। इस कानून के तहत देश के सभी राज्यों के ग्रामीण इलाकों की करीब पचहत्तर फीसद और शहरी इलाकों की पचास फीसद आबादी को खाद्यान्न मुहैया कराया जाएगा। इसके तहत हर चिह्नित लाभार्थियों को दो रुपए प्रति किलो के भाव गेहूं और तीन रुपए प्रति किलो के भाव चावल मिलेगा। इस प्रकार 81.34 करोड़ चिह्नित लाभार्थियों को नाममात्र की कीमत में अनाज देने की कानूनी गारंटी दी गई है। अनाज वितरण में होने वाली गड़बड़ी रोकने के लिए केंद्र सरकार देश भर में फैली 1,61,854 उचित दर की राशन दुकानों का कंप्यूटरीकरण कर रही है। इसके तहत बायोमिट्रिक पहचान के आधार पर राशन का वितरण किया जाएगा। लेकिन यह कवायद शायद ही देश को कुपोषण से मुक्ति दिला पाए, क्योंकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का लक्ष्य खाद्य सुरक्षा मुहैया कराना है, न कि पोषण सुरक्षा। गौरतलब है कि केवल पेट भरना पोषण नहीं है। हमारे भोजन में समुचित मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज, विटामिन और जल आदि का शामिल होना बहुत जरूरी है। इसीलिए पोषण विशेषज्ञ खानपान के मामलों में सतर्कता से काम लेने का सुझाव देते हैं, ताकि कुपोषण पर काबू पाया जा सके। अगर सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गेहूं-चावल के साथ-साथ मोटे अनाजों का वितरण करे तो न सिर्फ कुपोषण पर लगाम लगेगी, बल्कि खेती की विविधता को भी बढ़ावा मिलेगा।

फसल विविधीकरण की दिशा में एक ठोस प्रयास 2013-14 के बजट में हुआ, जब पांच सौ करोड़ रुपए का कोष बना कर फसल विविधता पर राष्ट्रीय मिशन की शुरूआत की गई है। इसके तहत गेहूं-धान उत्पादक इलाकों में मोटे अनाजों, दलहन, तिलहन, साग-सब्जी की खेती और कृषि वानिकी को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिए फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की नीति पर काम हो रहा है, लेकिन मोटे अनाजों की बुवाई से लेकर उपज की बिक्री से जुड़े जोखिम के चलते इनका रकबा अपेक्षित रफ्तार से नहीं बढ़ पा रहा है।मोटे अनाजों की खासियत यह है कि वे कम पानी में पैदा होते हैं और खाद्य तथा पोषण सुरक्षा देने के साथ-साथ पशुचारा भी मुहैया कराते हैं। मसलन, जहां एक किलो धान पैदा करने में पांच हजार लीटर पानी की खपत होती है वहीं ज्वार कुछ सौ लीटर पानी में हो जाती है। ये फसलें मौसमी उतार-चढ़ाव भी आसानी से झेल लेती हैं। स्पष्ट है पानी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण खाद्यान्न उत्पादन पर मंडराते संकट के दौर में मोटे अनाज उम्मीद की किरण जगाते हैं, क्योंकि इनकी खेती अधिकतर वर्षाधीन इलाकों में बिना उर्वरक-कीटनाशक के होती है। पोषक तत्त्वों की दृष्टि से इन्हें गुणों की खान कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। प्रोटीन और रेशे की भरपूर मौजूदगी के चलते मोटे अनाज डाइबिटीज, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप का खतरा कम करते हैं। इनमें खनिज तत्त्व भी प्रचुरता से पाए जाते हैं, जिससे कुपोषण की समस्या अपने आप दूर हो जाती है।

मोटे अनाजों के बहुआयामी लाभों के बावजूद इनकी सरकारी खरीद, भंडारण और वितरण की कोई व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि किसान इन फसलों की खेती मजबूरी में ही करते हैं। ऐसे में अगर सरकार गेहूं-धान से आगे बढ़ कर इन अनाजों की खरीद, भंडारण और बिक्री का विकेंद्रित नेटवर्क बनाए, तो किसान एक बार फिर इन अनाजों को अपनाएंगे और ये भोजन की थाली में जगह बना लेंगे। मगर इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का फिलहाल अभाव है। मसलन, गन्ना, गेहूं, धान, कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिए अक्सर आंदोलन करने वाले किसान संगठन और नेता इन अनाजों को भूले-बिसरे भी याद नहीं करते। इनकी सुध बस कृषि वैज्ञानिक और पोषण विशेषज्ञ लेते हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ-साथ बाजार भी मोटे अनाजों के लिए शुभ साबित होगा, क्योंकि तरह-तरह की बीमारियों वाले दौर में प्रचार और विपणन की सुनियोजित रणनीति इन्हें खानपान की मुख्य धारा में शामिल करा सकती है। टाटा समूह के एक अध्ययन के मुताबिक 2017 तक भारत में स्वास्थ्यप्रद भोजन का बाजार दस अरब डॉलर का हो जाएगा। इसका कारण है कि अनियमित जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां जैसे-जैसे बढ़ रहीं हैं वैसे-वैसे मल्टी ग्रेन, लो कोलेस्ट्राल, आर्गनिक फूड आदि की मांग बढ़ती जा रही है। यही बढ़ता हुआ बाजार मोटे अनाजों विशेषकर रागी, ज्वार, बाजरा के लिए उम्मीद जगाता है।

 

 

 

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