December 05, 2016

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भाषाओं का विस्थापन

असल में यह सब भूमंडलीकरण का असर है। वर्तमान पीढ़ी के पास कोई एक समृद्ध भाषा नहीं है। बहुत सारी मातृभाषाएं व्यवहार में नहीं बची हैं।

Author November 21, 2016 02:42 am
प्रतिकात्मक चित्र।

बीते चार दशकों के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों की करीब पांच सौ भाषाओं या बोलियों में से लगभग तीन सौ विलुप्त हो चुकी हैं और 190 से ज्यादा आखिरी सांसें ले रही हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि भाषा-संपदा का इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी कहीं कोई हलचल नहीं है। यह शायद इसलिए कि इनमें से ज्यादातर जनजातियों की मातृभाषाएं थीं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड और गुजरात जैसे प्रदेश अपनी सांस्कृतिक विविधता और लोकसंपदा के कारण पहचाने जाते रहे हैं। इनका अपना भरा-पूरा लोक संसार रहा है। लेकिन अब इनमें से अधिकांश सांस्कृतिक संपदा खत्म होने के कगार पर है। कारण यह कि जिस भाषा में यह लोक संसार रचा-बसा है, वही भाषा-बोली खत्म होने जा रही है।

किसी भी समाज की भाषा उस अंचल की रीढ़ होती है। उसके खत्म होने का सवाल सिर्फ भाषाई नहीं है। भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन नहीं होती, बल्कि उसमें इतिहास और मानव विकास-क्रम के कई रहस्य छिपे होते हैं। बोली के नष्ट होने के साथ ही जनजातीय संस्कृति, तकनीक और उसमें अर्जित बेशकीमती परंपरागत ज्ञान भी तहस-नहस हो जाता है। बाजार, रोजगार और शिक्षा जैसी वजहों से जनजातीय बोलियों में बाहर के शब्द तो प्रचलित हो रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी मातृभाषा के स्थानिक शब्द प्रचलन से बाहर हो रहे हैं। दुखद है कि हजारों सालों से बनी एक भाषा, एक विरासत, उसके शब्द, उसकी अभिव्यक्ति, खेती, जंगल, इलाज और उनसे जुड़ी तकनीकों का समृद्ध ज्ञान, उनके मुहावरे, लोकगीत, लोक कथाएं एक झटके में ही खत्म होने लगी हैं।

यूनेस्को की ‘इंटरेक्टिव एटलस’ की रिपोर्ट बताती है कि अपनी भाषाओं को भूलने में भारत अव्वल नंबर पर है। दूसरे नंबर पर अमेरिका (192 भाषाएं) और तीसरे नंबर पर इंडोनेशिया (147 भाषाएं) है। दुनिया की कुल छह हजार भाषाओं में से ढाई हजार पर आज विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यूनेस्को के ‘एटलस आफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेस इन डेंजर’ के मुताबिक अकेले उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाऊंनी और रोंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैं। पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोल्चा व रंग्कस तो विलुप्त भी हो चुकी हैं। वहीं उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र बारह हजार लोग बोलते हैं। पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसी, उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं। दारमा को 1761, ब्यांसी को 1734, जाड को 2000 और जौनसारी को 1,14,733 लोग ही बोलते-समझते हैं।

एटलस के मुताबिक 20,79,500 लोग गढ़वाली, 20,03,783 लोग कुमाऊंनी और 8000 लोग रोंगपो बोली के क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि यहां रहने वाले सभी लोग ये बोलियां जानते ही हों। मध्यप्रदेश में भी करीब दर्जन भर बोलियां विलुप्ति के मुहाने पर पहुंच चुकी हैं। प्रदेश की कुल आबादी का 35.94 फीसद अब भी आंचलिक बोलियों पर ही निर्भर है, लेकिन इन आदिवासी बोलियों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। भीली, भिलाली, बारेली, पटेलिया, कोरकू, मवासी निहाली, बैगानी, भटियारी, सहरिया, कोलिहारी, गौंडी और ओझियानी जैसी जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैं, लेकिन अब ये बीते दिनों की कहानी बनने के कगार पर हैं। प्रदेश के एक बड़े हिस्से में- करीब बारह जिलों में- बोली जाने वाली मालवी भी अब दम तोड़ने लगी है। मध्यप्रदेश के 8.58 फीसद (51,75,793) लोगों की मातृभाषा मालवी है।

इसी तरह राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के सवा अरब लोग 1652 मातृभाषाओं में बात करते हैं। इसमें सबसे ज्यादा 42,20,48,642 लोग (41.03 फीसद) हिंदी भाषी हैं, राजस्थानी बोलने वाले 1,83,55,613 (1.78 फीसद) लोग हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के 28,672 वर्ग मील के बड़े क्षेत्र में भील रहते हैं, पर भीली बोलने वाले 95,82,957 लोग (0.93 फीसद) और संथाली बोलने वाले तो मात्र 64,69,600 (0..63 फीसदी) हैं। देश में लगभग साढ़े पांच सौ जनजातियां निवास करती हैं जिनकी अपनी-अपनी बोलियां भी हैं। लेकिन इनमें से कई बोलियों को बोलने वालों की तादाद अब घट कर हजारों में सिमट चुकी है। जनजातीय बोलियों को लिपिबद्ध किए जाने की अब तक कहीं कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई है। इन्होंने अपने वाचिक स्वरूप में ही हजारों सालों का सफर तय किया है।
कई जानकारों का मानना है कि जब तक इन बोलियों या भाषाओं को छात्रों के पाठ्यक्रम से नहीं जोड़ा जाता, तब तक इन्हें आगे बढ़ाने की बात बेमानी साबित होगी। खासतौर पर प्राथमिक शिक्षा में यह बहुत जरूरी है। प्राथमिक शिक्षा हिंदी और अंग्रेजी तक सिमट गई है। इस कारण बच्चे अपनी स्थानीय बोलियों से लगातार कटते जा रहे हैं और अपनी बोलियों को लेकर उनके मन में हीनभावना भी आने लगी है। यदि समय रहते इन बोलियों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते तो जल्द ही ये पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगी।

यह सिर्फ एक बोली या भाषा की नहीं, मानव समाज की कई अमूल्य विरासतों की भी विलुप्ति होगी। बीते तीस-चालीस सालों में एक बड़ी आबादी की मातृभाषा गुम हो चुकी है।
भूमंडलीकरण के कारण दुनिया भर में इस वक्त जिंदा रहने वाली भाषाओं में चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, जापानी, रूसी, बांग्ला और हिंदी सहित कुल सात भाषाओं का राज है। दो अरब पचास करोड़ से ज्यादा लोग ये भाषाएं बोलते हैं। इनमें से अंगरेजी का प्रभुत्व सर्वाधिक है और वह वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है। हालांकि भाषाविज्ञानी इसे खतरनाक रुझान मानते हैं। क्योंकि चीन और अर्जेंटीना ऐसे देश हैं जहां भाषा की विविधता खत्म हो चुकी है। इसकी वजह वहां सरकारी स्तर पर एक ही भाषा का चुनाव रहा। यह हर्ष की बात है कि हिंदी भी जिंदा भाषाओं में शामिल है। हिंदी ढेरों चुनौतियों से निपटती, आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंची है। वह इस समय भले यूनेस्को की सुरक्षित भाषाओं वाली श्रेणी में आती हो, लेकिन महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस सदी के अंत तक हिंदी की यही हैसियत बनी रहेगी? या वह भी इक्कीसवीं सदी के आखिरी चरण में यूनेस्को द्वारा लुप्त भाषा की श्रेणी में रखी जाएगी?

असल में यह सब भूमंडलीकरण का असर है। वर्तमान पीढ़ी के पास कोई एक समृद्ध भाषा नहीं है। बहुत सारी मातृभाषाएं व्यवहार में नहीं बची हैं। साढ़े छह लाख गांवों के देश का विकास अंग्रेजी थोपने से संभव नहीं है। कितनी अजीब बात है कि विश्वगुरु बनने का अभिलाषी यह देश संयुक्त राष्ट्र में तो हिंदी का परचम फहराना चाहता है लेकिन अपनी ही धरती पर उसे राजकाज की भाषा के रूप में नहीं अपनाना चाहता, न ही उसे आम जनता की रोजी-रोटी की भाषा बनने देना चाहता है। जबकि सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बीस में से छह भाषाएं हमारे देश में हैं। ये हैं- हिंदी, बांग्ला, तेलुगू, मराठी, तमिल और पंजाबी। वर्तमान समय में देश में अपनी भाषाओं की जो भी स्थिति है, उसका कारण ये मानसिक गुलामी से ग्रसित लोग हैं। मानसिक गुलामी को अवश्यंभावी बता कर लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। पूरी दुनिया में चीनी भाषा का जितना सम्मान है, उतना किसी भी भारतीय भाषा का नहीं है। उसकी वजह सिर्फ हम हैं। भलें हम ग्लोबल युग में रहते हैं। लेकिन भाषाओं का इतिहास तो सत्तर हजार साल पुराना है जबकि भाषाएं लिखने का इतिहास सिर्फ चार हजार साल पुराना है। इसलिए ऐसी भाषाओं के लिए यह संस्कृति का ह्रास है। खासकर जो भाषाएं लिखी ही नहीं गर्इं, जब वे नष्ट होती हैं तो यह बहुत बड़ा नुकसान होता है।

यह सांस्कृतिक नुकसान तो है ही, आर्थिक नुकसान भी है। भाषा आर्थिक पूंजी भी होती है, क्योंकि आज की सभी तकनीक भाषा पर आधारित तकनीक हैं। चाहे पहले की रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान या इंजीनियरिंग से जुड़ी तकनीक हो या आज के दौर का यूनिवर्सल अनुवाद, मोबाइल तकनीक, सभी भाषा से जुड़ी हैं। ऐसे में भाषाओं का लुप्त होना एक आर्थिक नुकसान भी है। यही वजह है कि भाषाविद भाषाओं के लुप्त होने को मनुष्य की मृत्यु के समान मानते हैं। भाषाशास्त्री डेविड क्रिस्टल अपनी पुस्तक ‘लैंग्वेज डेथ’ में कहते हैं, भाषा की मृत्यु और मनुष्य की मृत्यु एक-सी घटना है, क्योंकि दोनों का ही अस्तित्व एक-दूसरे के बिना असंभव है।

एक भाषा की मौत का अर्थ है उसके साथ एक खास संस्कृति का खत्म होना, एक विशिष्ट पहचान का गुम हो जाना। तो क्या दुनिया से विविधता समाप्त हो जाएगी और पूरा संसार एक रंग में रंग जाएगा? बहुत सारी भाषाओं के निरंतर कमजोर पड़ने के साथ यह सवाल गहराता जा रहा है। पहनावे के बाद अब भाषाओं पर आया संकट अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। कहा जाता है कि भाषा अपनी संस्कृति भी साथ लाती है। वास्तव में भाषा को बचाने का मतलब है, भाषा बोलने वाले समुदाय को बचाना। सागरतटीय, घुमंतू, पहाड़ी, मैदानी और शहरी, सभी समुदायों के लोगों के लिए अलग योजना की जरूरत है। बहुत-से लोग शहरीकरण को भाषाओं के लुप्त होने का कारण मानते हैं, लेकिन शहरीकरण भाषाओं के लिए खराब नहीं है। शहरों में इन भाषाओं की अपनी एक जगह होनी चाहिए। बड़े शहरों का भी बहुभाषी होकर उभरना जरूरी है।

 

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First Published on November 21, 2016 2:42 am

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