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मातृभाषाओं का विस्थापन

भारत बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है, पर इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि यहां के सभी निवासी अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा भी जानते हैं। भा
Author February 21, 2017 05:57 am
प्रतीकात्मक चित्र।

भारत बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है, पर इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि यहां के सभी निवासी अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा भी जानते हैं। भारत-संघ की दो राजभाषाएं हिंदी और अंग्रेजी हैं। देश के बहुत-से लोग इन दोनों में से कोई भी भाषा नहीं जानते हैं। लिहाजा, बच्चों की शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा ही होना चाहिए। मातृभाषा में शिक्षा पाने से बच्चों में सीखने की कुशलता तेजी से जाग्रत होती है। इन बच्चों की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, उनकी कुशलता और स्मरण-दक्षता भी बढ़ती है। इसी उत्तरोत्तर वृद्धि से उनमें अंतर्दृष्टि और विचारों को विस्तार देने की काबिलियत में भी इजाफा होता है। मातृभाषाओं में कहावतें, लोककथाएं, कहानियां, पहेलियां, सूक्तियां होती हैं, जो सीधे तौर पर उनकी जीवंत स्मृतियों से जुड़ी होती हैं। जब बच्चों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती है तो उनके चेहरे उत्फुल्ल होते दिखाई देते हैं, वहीं भारतीय भाषाएं भी विकसित और समृद्धशाली होती हैं। इंग्लैंड, जर्मनी और रूस आदि पश्चिमी राष्ट्रों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही है। इससे वहां के युवाओं में अपने धर्म, संस्कृति, साहित्य और राष्ट्र के लिए अधिक प्रेम की भावना रहती है।

एक समय विश्व में लगभग सोलह हजार भाषाएं बोली जाती थीं, जिनमें से वर्तमान में लगभग 6,900 भाषाएं प्रचलन में हैं। वहीं ढाई हजार भाषाओं की हालत बेहद चिंताजनक है। ये वे भाषाएं हैं, जिनका अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त होने की कगार पर हैं। दुनिया में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस से भी कम है तथा 178 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या डेढ़ सौ से भी कम है। संसार की आधी भाषाओं के बोलने वालों की संख्या दस हजार हजार से भी कम है, वहीं एक चौथाई भाषाएं एक हजार से भी कम लोग बोलते हंै।
संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की रिपोर्ट ‘एटलस आॅफ वर्ल्ड्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर-2009’ में कहा गया है कि मौजूदा सभी भाषाओं में से तकरीबन नब्बे फीसद भाषाएं अगले सौ वर्षों में अपना वजूद खो सकती हैं। जिन देशों की भाषाएं खतरे में हंै उनमें भारत शीर्ष पर है। यहां 196 भाषाएं मिटने के कगार पर हैं। दुनिया भर में बढ़ रहे आर्थिक और बौैद्धिक साम्राज्यवाद के चलते अंगे्रजी या दूसरी वर्चस्व वाली भाषाएं तेजी से विकास कर रही हैं। जो भाषाएं सीधे तौर पर आर्थिक रूप से जुड़ी हैं और शासन-सत्ता को प्रभावित करती हैं वे अपना विकास तेजी से कर रही हंै। वहीं जो भाषाएं कमजोर वर्गों या समुदायों की हैं, वे नष्ट हो रही हंै, क्योंकि उनमें रोजगार की कोई गारंटी न होने के कारण उस समुदाय के लोग भी भाषाई पलायन करके उस भाषा का दामन थाम रहे हैं, जिसमें रोजगार की संभावना दिखती है।

विभिन्न सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट हो चुका है कि झारखंड की कई भाषाएं- कुडख, मुंडारी, हो, खड़िया, असुरी, भूमिज, बिरहोरी, मलतो आदि- विलुप्त होने के कगार पर हैं। भारत में खत्म होने वाली भाषाओं में ज्यादातर क्षेत्रीय और कबीलाई बोलियां हंै। पिछले पचास सालों में भारत की करीब बीस फीसद भाषाएं विलुप्त हो गई हंै। वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं थीं, जिनकी संख्या 2001 में घट कर मात्र 234 रह गई। पिछले पांच दशक में भारत 1418 भाषाएं खो चुका है। राष्ट्रीय भाषा संस्थान, मैसूर की रिपोर्ट में बारह आदिवासी भाषाओं को विलुप्त होने वाली सूची में रखा गया है। भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से बाईस को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। उसमें सिर्फ दो आदिवासी भाषाओं- संथाली और बोडो- को रखा गया है। अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भाषा की समस्या सबसे गंभीर है, क्योंकि वे अधिकतर समाज के बड़े हिस्से के साथ संगठित होने की कोशिश करते हैं। ऐसे में वे अपनी भाषाओं से दूर होने लगते हैं। भाषा के संस्कृति से जुड़े होने के कारण नुकसान होता है। लोग केवल भाषा नहीं बल्कि अपना पारंपरिक ज्ञान भी खोते चले जा रहे हैं। किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है। भाषा का खत्म होना किसी त्रासदी से कम नहीं है। भाषा के खत्म होने के साथ न सिर्फ उस भाषा के बोलने वाले खत्म हो जाते हैं, बल्कि उनका गौरवपूर्ण इतिहास भी खत्म हो जाता है। भारत में भाषाओं का लोप सिर्फ मामूली मातृभाषाओं और अवर्गीकृत बोलियों के रूप में नहीं हो रहा है, बल्कि ऐसी कई बड़ी भाषाएं भी विलुप्त हो रही हैं, जिनकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा रही है और उनका काफी लिखित साहित्य भी मौजूद है।
गौरतलब है कि आदिवासी भाषाओं के साथ पूरी दुनिया का रवैया हमेशा से भेदभावपूर्ण रहा है। सत्ता और ताकत के बल पर ऐसी परिस्थितियां निर्मित की गर्इं कि आदिवासी समाज अपनी भाषाओं से विमुख हो जाए। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने के नाम पर शिक्षण के दायरे से आदिवासी भाषाओं को बहिष्कृत रखा गया। आज दक्षिण के सभी राज्यों में आदिवासियों की भाषाएं गायब हो रही हैं। उनकी संस्कृति और अस्मिता लुप्त होने के कगार पर हैं।

विद्वानों का मानना है कि जिस देश की संस्कृति खत्म करनी हो या देश को खत्म करना हो तो उसकी भाषाओं को खत्म कर दो। संस्कृति स्वत: खत्म हो जाएगी। आज भारत में आदिवासियों की भाषाएं खत्म की जा रही हैं, जबकि भाषा का प्रश्न उनकी अस्मिता से जुड़ा हुआ है। उनकी करीब छह सौ भाषा/ बोलियां हैं, जिनमें से नब्बे में साहित्य लिखा जा रहा है। दुनिया के किसी भी देश में इतनी भाषाओं में साहित्य नहीं लिखा जा रहा है। फिर भी आदिवासियों को शिक्षा उनकी अपनी मातृभाषा में न देकर प्रदेश की राज-भाषा में दी जा रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350-ए में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य छात्रों को उनकी मातृभाषा में ही प्रारंभिक शिक्षा दें। छोटा बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता है। इसलिए मातृभाषा बच्चे के जीवन का अभिन्न अंग और अमूल्य निधि होती है। निर्विवाद रूप से बच्चे की शिक्षा का माध्यम उसकी मातृभाषा ही होनी चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि शिक्षा को ग्रहणशीलता, संप्रेषण, अनुभूति, अनुभव, यथार्थ और परिवेश से जोड़ कर नहीं, सिर्फ प्रतिपर्स्धा और बाजार के नजरिए से देखा जा रहा है। वैश्वीकरण के नाम पर यह दृष्टिकोण अधिक से अधिक हावी होता गया है और अब यह इस हद तक ताकतकवर हो गया है कि आदिवासियों की मातृभाषाएं ही नहीं, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं भी अपना महत्त्व और प्रभाव खोती जा रही हैं। आदिवासियों की विभिन्न भाषाओं को बचाने का एकमात्र तरीका यही है कि आदिवासी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा के माध्यम से दी जाए। यदि इन बच्चों को प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य कर दिया जाए तो इन भाषाओं का भविष्य सुरक्षित रह सकता है। दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है। अगर इन भाषाओं को बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो बची हुई भाषाएं भी विलुप्त हो जाएंगी। भाषा एक सामाजिक संपत्ति व सामूहिक विरासत है। इसलिए किसी भाषा की मौत एक जाति, समुदाय, उसके इतिहास, सांस्कृतिक मूल्य और सौंदर्य चेतना का अंत है। जिसके निर्माण में सदियां बीत जाती हैं, उसे बचाए रखना हमारा कर्तव्य है।

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  1. N
    Narendra Kashyap
    Feb 21, 2017 at 3:15 am
    मात्रा भाषा भले ही अलग अलग हो मगर राष्ट्र भाषा केवल और केवल एक होनी चाहिए उसे ही पढ़ा और लिखा जावे अपनी मात्र भाषा के साथ दुर्भाग्य है की हिंदी राष्ट्र भाषा होने के बाद भी वो सम्मान नहीं मिल पा रहा है हिंदी बोलने और लिखने दोनों का त्याग किया किया जाता है
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    Reply
    सबरंग