March 28, 2017

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नई स्वास्थ्य नीति की कठिन डगर

हाल में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को मंजूरी दे दी। इसमें सबको स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने को सरकार की जिम्मेदारी बताया गया है।

Author March 20, 2017 05:36 am
अस्पताल ।

हाल में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को मंजूरी दे दी। इसमें सबको स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने को सरकार की जिम्मेदारी बताया गया है। स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को बढ़ा कर जीडीपी के 2.5 फीसद पर पहुंचाया जाएगा। इस समय यह करीब 1.04 फीसद है। इस नीति के तहत 2025 तक औसत जीवन आयु सत्तर वर्ष करने और शिशु मृत्यु दर घटाने का संकल्प लिया गया है। इस नीति के माध्यम से सभी नागरिकों को निश्चित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। विडंबना है कि हमारे देश में नीतियां तो बहुत बनती हैं, लेकिन उनका ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाता। इसलिए सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी कि नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का ठीक से क्रियान्वयन हो, ताकि गांव के आखिरी आदमी तक इसका लाभ पहुंच सके। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि आने वाले समय में हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियां भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी। इस रिपोर्ट के अनुसार 2012 से 2030 के बीच इन बीमारियों के इलाज पर करीब 6.2 खरब डॉलर (41 लाख करोड़ रुपए से अधिक) खर्च होने का अनुमान है। रिपोर्ट में इन बीमारियों के भारत के शहरी इलाकों में तेजी से फैलने का खतरा बताया गया है। असंक्रामक रोग शहरों में रहने वाली मानव आबादी के स्वास्थ्य के लिए ही खतरा नहीं हैं, बल्कि इसके चलते अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ता शहरीकरण और वहां काम और जीवनशैली की स्थितियां असंक्रामक रोगों के बढ़ने का मुख्य कारण हैं। 2014 से 2050 के बीच भारत में चार करोड़ चालीस लाख आबादी शहरों का हिस्सा बनेगी। इसके चलते शहरों में अनियोजित विकास होने से स्थिति बदतर होगी।
गौरतलब है कि इस समय देश में पांच लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत में 1,674 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। जबकि हमारे देश में व्यवस्था की नाकामी और विभिन्न वातावरणीय कारणों से बीमारियों का प्रकोप ज्यादा होता है। डॉक्टरों की कमी के कारण गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने में देरी होती है। यह स्थिति अंतत: पूरे देश के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर गठित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि हमारे देश में आम लोगों को समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के अनेक कारण हैं। इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं को और तीव्र बनाने की जरूरत है। चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त खामी के लिए संसदीय समिति ने निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली अवैध कैपिटेशन फीस, शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं में अंतर और चिकित्सा शिक्षा तथा जनस्वास्थ्य में साम्य न होने को जिम्मेदार माना है। स्वास्थ्य सेवाओं के मुद्दे पर भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। गरीबी और गंदगी के कारण विभिन्न संक्रामक रोगों से पीड़ित लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा। पिछले दो दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि दर चीन के बाद शायद सबसे अधिक रही है। इसलिए पिछले दिनों योजना आयोग की एक विशेषज्ञ समिति ने भी यह सिफारिश की थी कि सार्वजनिक चिकित्सा सेवाओं के लिए आबंटन बढ़ाया जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। इस माहौल में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति दयनीय है। विडंबना यह है कि भारत में दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह स्वास्थ्य योजनाएं भी लूट-खसोट की शिकार हैं। पिछले दिनों भारतीय चिकित्सा परिषद ने डॉक्टरों द्वारा दवा कंपनियों से लेने वाली विभिन्न सुविधाओं को देखते हुए एक आचार संहिता के तहत डॉक्टरों को दिए जाने वाली सजा की रूपरेखा तय की थी। मगर अब भी डॉक्टर दवा कंपनियों से विभिन्न सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं और इसका बोझ रोगियों पर पड़ रहा है। इस दौर में डॉक्टरों द्वारा अधिक दवाइयां लिखना एक परिपाटी बन गई है। दवाइयों की विभिन्न कंपनियां डॉक्टरों को कीमती से कीमती उपहार देने की होड़ में रहती हैं। डॉक्टर उपहार के बदले हर कंपनी को खुश करना चाहता है। इसलिए उसका हर पर्चा अक्सर कई अनावश्यक दवाइयों से भरा रहता है। इस व्यवस्था में डॉक्टर और दवा कंपनियां तो तृप्त रहती हैं, पर आम जनता को शोषण का शिकार होना पड़ता है। स्पष्ट है कि बाजार की शक्तियां अपने हित के लिए मानवीय हितों की आड़ में मानवीय मूल्यों को तरजीह नहीं देती हैं। हद तो तब हो जाती है जब कुछ डॉक्टर अनावश्यक दवाइयां लिख कर दवा कंपनियों को दिया वचन निभाते हैं। इस व्यवस्था में डॉक्टर के लिए दवा कंपनियों का हित रोगी के हित से ऊपर हो जाता है।

पुराने समय में डॉक्टर या वैद्य का रोगी से कोई लालच नहीं होता था। उनका मुख्य उद्देश्य रोगी को ठीक करना होता था और उसी से उन्हें संतोष भी मिलता था। इसीलिए कुल मिला कर एक ऐसा वातावरण बनता था जिसमें डर नाम की कोई चीज नहीं होती थी। आज डॉक्टर का नाम लेते ही डर लगने लगता है। इस दौर में स्वयं डॉक्टर भी ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिससे रोगी के मन में अपनी बीमारी को लेकर डर बैठ जाए और वह डॉक्टर पर सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाए। जो डॉक्टर सेवाभाव से मरीजों के हितों के लिए रात-दिन एक कर रहे हैं उन पर भला कौन अंगुली उठाएगा? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस दौर में हमारी पीढ़ी बाजार के हाथों इस कदर बिक गई है कि न्यूनतम मानवीय मूल्य भी जिंदा नहीं रह पाए हैं। इस बाजार आधारित व्यवस्था में हमारी संवेदना भी बाजारू हो गई है। यह कटु सत्य है कि बाजार के प्रभाव ने हर क्षेत्र में दलाल नामक जीव पैदा किए हैं। ऐसे में डॉक्टरी का पेशा भी दलाली से मुक्त कैसे रह सकता था! डॉक्टरों को मरीजों के परीक्षण कराने के लिए भी परीक्षण केंद्रों द्वारा कमीशन दिया जाने लगा। इसी व्यवस्था के अनुरूप मरीजों के अनावश्यक परीक्षण कराए जाने लगे। अगर आपने डॉक्टर की इच्छा के विरुद्ध किसी अन्य जगह परीक्षण करा लिया तो वह सब गलत है। हालांकि यह सुखद है कि इस माहौल में भी कुछ डॉक्टर अपने पेशे की गरिमा को बचाए हुए हैं।

दलाली के युग में संवेदना के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि आज डॉक्टर गांवों की तरफ रूख नहीं करते हैं। दरअसल, इस दौर में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का खमियाजा ज्यादातर बच्चों, महिलाओं और बूढ़े लोगों को उठाना पड़ रहा है। यही कारण है कि देश के अनेक राज्यों में जहां एक ओर बच्चे विभिन्न गंभीर बीमारियों के कारण काल के गाल में समा रहे हैं, तो दूसरी ओर महिलाओं को भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। इस मामले में वृद्धों का हाल और दयनीय है। अनेक परिवारों में वृद्धों को मानसिक संबल नहीं मिल पाता है। साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में उन्हें जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया न हों तो उनका जीवन नरक बन जाता है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का चुस्त-दुरुस्त और ईमानदार होना न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी जरूरी है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए एक गंभीर पहल की जरूरत है। नई स्वास्थ्य नीति इस दिशा मे एक सार्थक कदम है, बशर्ते इसका ठीक ढंग से क्रियान्वयन हो।

 

 

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First Published on March 20, 2017 5:36 am

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