June 23, 2017

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गरम होती धरती के खतरे

मौसम का पारा जिस तरह ऊपर चढ़ रहा है उससे ऐसा लगता है कि इस बार झुलसाने वाली गर्मी पड़ेगी।

बढ़ते तापमान की वजह से धरती के गर्म होने की संभावना बढ़ गई है। (एपी फोटो)

मौसम का पारा जिस तरह ऊपर चढ़ रहा है उससे ऐसा लगता है कि इस बार झुलसाने वाली गर्मी पड़ेगी। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव हमारी खेती पर पडेÞगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनलैंड के पिघलते ग्लेशियर समुद्री जल-स्तर को आधा मीटर तक बढ़ा सकते हैं। इसके नतीजे भयावह होंगे। दुनिया भर के वैज्ञानिक अब यह अनुभव करने लगे हैं कि हम आधुनिक विकास के जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह हमारे विनाश का कारण बन सकता है। आज सांस लेने के लिए न तो शुद्ध हवा है न पीने के लिए साफ पानी बचा है। लेकिन अब खतरा इससे भी बड़ा आने वाला है। अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो 2030 तक दस करोड़ लोग सिर्फगरमाती धरती की वजह से मौत के मुंह में समा जाएंगे। बीस विकासशील देशों की ओर से करवाए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण 2030 तक अमेरिका और चीन के जीडीपी में 2.1 फीसद, जबकि भारत के जीडीपी में पांच प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। धरती के गरमाने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इससे धरती के धु्रवों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वायु प्रदूषण, भूख और बीमारी से हर साल पचास लाख लोगों की मौत हो जाती है। 2030 तक हर साल साठ लाख लोगों की मौत इस वजह होगी। इस दर से अगले पंद्रह साल यानी 2030 तक नौ करोड़ लोग जलवायु परिवर्तन के शिकार होंगे। इनमें से नब्बे फीसद मौतें विकासशील देशों में होंगी। यह खतरा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, वनों के कटान और आधुनिक विकास की नई-नई तकनीकों के कारण पैदा हुआ है।

विकासशील देशों की इस अध्ययन रिपोर्ट में 2010 और 2030 में 184 देशों पर जलवायु परिवर्तन के आर्थिक असर का आकलन किया गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल विश्व के जीडीपी में 1.6 फीसद यानी बारह सौ खरब डॉलर की कमी हो रही है। अगर जलवायु परिवर्तन के कारण धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो 2030 तक यह कमी 3.2 फीसद हो जाएगी और इस सदी के अंत तक यह आंकड़ा दस फीसद को पार कर जाएगा। जबकि जलवायु परिवर्तन से लड़ते हुए कम कार्बन पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था को खड़ा करने में विश्व जीडीपी का मात्र आधा फीसद खर्च होगा। जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर गरीब देशों पर होगा। 2030 तक उनके जीडीपी में ग्यारह फीसद तक की कमी आ सकती है। एक अनुमान के मुताबिक धरती के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी में कृषि उत्पादन में दस प्रतिशत की गिरावट आती है। अगर बांग्लादेश का उदाहरण लिया जाए तो उसके खाद्यान्न उत्पादन में चालीस लाख टन की कमी आएगी।

धरती का तापमान जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, वह इस सदी के अंत तक प्रलय के नजारे दिखा सकता है। नए शोधों के अनुसार समुद्र का जल-स्तर एक मीटर तक बढ़ सकता है। इससे कई देश और भारत के तटीय नगर डूब जाएंगे। आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग से बढ़े समुद्र के जल-स्तर ने प्रशांत महासागर के पांच द्वीपों को जलमग्न कर दिया है। दुनिया के नक्शे से गायब हुए ये द्वीप पापुआ न्यू गिनी के पूर्व में सोलोमन द्वीप-समूह का हिस्सा थे। हालांकि इन डूबे हुए द्वीपों पर इंसानों की बस्तियां नहीं थीं। पिछले दो दशक में इस क्षेत्र में समुद्र का जल-स्तर तेजी से बढ़ा है। दुनिया इसी सदी में एक खतरनाक वातावरण परिवर्तन का सामना करने जा रही है। भारत समेत पूरी दुनिया का तापमान छह डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों का कोई वैकल्पिक र्इंधन ढूंढ़ने में विफल दुनिया भर की सरकारें इन हालात के लिए जिम्मेवार हैं। अगर कार्बन रहित कामकाज की दर को दोगुना कर दिया जाए तो भी इस सदी के अंत तक निरंतर कार्बन उत्सर्जन के कारण छह डिग्री सेल्सियस तक तापमान और बढ़ जाएगा। हमें एक गर्म दुनिया में खुद को बनाए रखने की योजना बनानी होगी। 2016 अब तक का सबसे गर्म साल रहा था। वैश्विक तापमान में 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई और धु्रवीय क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघली। यह सिलसिला इस साल भी जारी रहने वाला है। वर्ल्ड मीटियोरोलॉजिकल आर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएमओ) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस साल मौसम की दशाएं ज्यादा अनियमित और असामान्य रहने वाली हैं। अल नीनो प्रभाव के अलावा अन्य कारक हैं जो विश्व के मौसम-चक्र को हानि पहुंचा रहे हैं। 1961-1990 के औसत तापमान को इस इस वृद्धि का आधार माना गया है। वर्ष 2001 से अब तक हर साल इस तापमान में 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो रही है। 2016 में अल नीनो प्रभाव के चलते समुद्री स्तर भी चिंताजनक रूप से बढ़ा है। अटलांटिक से आर्कटिक की ओर जाने वाला गर्म और नम हवाओं का तूफान इस शीत ऋतु में तीन बार चला। इसका मतलब यह है कि शीत ऋतु में आर्कटिक पर बर्फ जमने के दौरान कई दिन बर्फ पिघलने लायक तापमान था। आर्कटिक व अंटार्कटिक में बर्फ लगातार कम हो रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मुताबिक 1979 के बाद से इस साल दोनों ध्रुवों पर बर्फ का क्षेत्र सबसे कम रहा। 13 फरवरी को दोनों धु्रवीय क्षेत्रों, 7 मार्च को आर्कटिक और 3 मार्च को अंटार्कटिक में सबसे कम बर्फ मापी गई।

ग्लोबल वार्मिंग के कहर से सबसे ज्यादा एशियाई देश प्रभावित होंगे। अगले दो सौ सालों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली मानसून प्रणाली बहुत कमजोर पड़ जाएगी। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश कम होने से भी ज्यादा भयावह स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए हमें एक ऐसी दुनिया में जीने की तैयारी कर लेनी चाहिए जहां सब कुछ हमारे प्रतिकूल होगा। 2017 के मानसून के बारे में स्काईमेट ने अपने पहले अनुमान में कहा है कि इस बार कमजोर मानसून रहेगा। मानसून में लंबी अवधि के औसत के 95 फीसद ही बारिश का अनुमान है। लंबी अवधि का औसत जून से सितंबर तक चार महीने के दौरान हुई बारिश से निकाला जाता है। भारत के मानसून के लिए यह कम है। इससे कम बारिश की आशंका है। इसके अलावा अल नीनो की भी आशंका जताई गई है। स्काईमेट का यह अनुमान भारत के लिए चिंतित करने वाला है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में होने वाली सत्तर फीसद बारिश इन्हीं चार महीनों के दौरान होती है। भारत के लिए भी यह संकेत खतरनाक है, क्योंकि खरीफ की फसल की बुआई इसी बारिश के भरोसे होती है।
भारत में खरीफ की खेती अधिकतर दक्षिण-पश्चिमी मानूसन पर ही आधारित होती है। ऐसे में अगर औसत से पांच फीसद कम बारिश हुई तो खेती पर असर पड़ना स्वाभाविक है। कमजोर मानसून का सबसे ज्यादा खतरा देश के पश्चिमी हिस्सों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के आसपास के हिस्सों और प्रायद्वीपीय भारत के प्रमुख हिस्सों पर है। कमजोर मानसून की आशंकाएं हमारे माथे पर इसलिए पसीना लाती रही हैं क्योंकि हमने सूखे और कम बारिश से निपटने के तौर-तरीकों के बारे में तमाम अनहोनियों के बावजूद कोई सबक नहीं लिया है और मुश्किलें पैदा होने पर ही हालात से निपटने की नीति बना रखी है।

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First Published on April 18, 2017 12:46 am

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