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आपातकाल से मिली नसीहत

आपातकाल के दूसरे दिन सैकड़ों विपक्षी नेता व कार्यकर्ता गिरफ्तार हो चुके थे। तीस-पैंतीस सांसदों को जेल भेज दिया गया। आपातकाल का दौर आज के विवादों में अब भी जिंदा है।
Author June 26, 2017 05:34 am
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी।

बारह जून 1975 का दिन, सामान्य से थोड़ा ज्यादा गर्म था। दोपहर होते-होते मौसम और राजनीति, दोनों का तापमान काफी चढ़ गया जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के खिलाफ दायर एक चुनाव याचिका में उनके विरुद्ध फैसला सुनाया। इस फैसले ने न सिर्फ हिंदुस्तान, बल्कि पूरे विश्व को चकित कर दिया। 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान श्रीमती गांधी द्वारा की गई अनियमितताओं के आरोप में समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा दायर की गई याचिका पर संबंधित न्यायिक आदेश ने न सिर्फ उनके चुनाव को निरस्त कर दिया, बल्कि श्रीमती गांधी को छह साल के लिए अयोग्य भी घोषित कर दिया। इंदिरा गांधी पर चुनाव के दौरान अपने निजी सचिव यशपाल कपूर को, जो उस समय भारत सरकार के अधिकारी भी थे, अपना चुनाव एजेंट बनाने, स्वामी अवैतानंद को पचास हजार रुपएघूस देकर राय बरेली से ही उम्मीदवार खड़ा करने, वायुसेना के विमानों का दुरुपयोग करने, चुनाव के दौरान डीएम-एसपी की अवैध मदद लेने, मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब, कंबल आदि बांटने तथा निर्धारित सीमा से अधिक खर्च करने का आरोप लगाया गया था।

उसी दिन गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने लगे थे जिसमें मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाला जनता मोर्चा बढ़त में था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध चले गुजरात युवा आंदोलन के दबाव में वहां की विधानसभा भंग की गई थी। इस चुनाव के नतीजों से देशव्यापी महागठबंधन के स्वर निकलने शुरू हो गए थे। जनता मोर्चा को कुल 182 में से 77 सीटों पर बढ़त प्राप्त हुई। चिमन भाई चुनाव हार चुके थे। 18 जून को बीपी पटेल को मुख्यमंत्री पद के लिए अहमदाबाद बुला लिया गया। सीपीआइ को छोड़ पूरे विपक्ष का राष्ट्रपति भवन के समक्ष धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया। विपक्ष की मांग थी- ‘इंदिरा गांधी गद््दी छोड़ो।’ इस्तीफे की पुरजोर मांग के बाद सर्वोच्च न्यायालय में श्रीमती गांधी ने अपने बचाव में याचिका दायर की। कांग्रेस पार्टी के सांसदों, मुख्यमंत्रियों, विधायकों तथा पदाधिकारियों द्वारा इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले को नकार कर एकजुटता की आवाज बुलंद की जा रही थी। तत्कालीनकांग्रेस अध्यक्ष बरुआ ने इंदिरा गांधी को देश का पर्याय (‘इंदिरा इज इंडिया’) बता दिया। लेकिन इस समय तक कांग्रेस पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र बेहद कमजोर भले हो चुका था, समाप्त नहीं हुआ था।

उस समय कांग्रेस के युवातुर्क नेता चंद्रशेखर, कृष्णकांत, लक्ष्मीकांतम्मा, रामधन आदि जयप्रकाश नारायण और उनके आंदोलन के प्रति आदर व सहानुभूति रखते थे, साथ ही उन्हें कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की भी चिंता थी। चंद्रशेखर 1971 के कांग्रेस शिमला सम्मेलन में इंदिरा गांधी द्वारा मनोनीत उम्मीदवार के मुकाबले कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव जीत कर एक बड़े नेता बन चुके थे। चंद्र्रशेखर ने अपने युवा दिनों में आचार्य नरेंद्र देव से समाजवाद की दीक्षा ग्रहण कीथी। इस दौरान उनकी पूरी कोशिश रही कि बातचीत के जरिये रास्ता निकाला जाए जिससे किसी तरह की टकराव की स्थिति उत्पन्न न होने पाए। उन्होंने जेपी-इंदिरा की मुलाकात कराई। नब्बे मिनट के वार्तालाप के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

बिहार आंदोलन की आवाज पूरे देश में फैल चुकी थी। आंदोलन मूल रूप से भ्रष्टाचार, महंगाई तथा अलोकतांत्रिक रवैये के खिलाफ था। 12 जून की घटना के बाद इंदिरा-विरोधी आंदोलन और तेज हो गया। 22 जून को दिल्ली में आयोजित रैली में जयप्रकाश नारायण शामिल होने वाले थे, पर ओछी राजनीति के कारण वे शामिल नहीं हो सके। दरअसल, कलकत्ता से दिल्ली आने वाले विमान को निरस्त कर जेपी को इस विशाल रैली से दूर रखने की साजिश की गई थी। बारिश के बावजूद इस रैली में काफी भीड़ जुटी जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, राजनारायण, अशोक मेहता, मधु लिमये जैसे बड़े नेता शामिल हुए।
25 जून को श्रीमती गांधी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘कंडीशनल स्टे’ दिया गया जिसके तहत वह प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, पर मताधिकार छीन लिया गया। इसी दिन रामलीला मैदान में एक सभा हुई जिसके मंच पर बैठने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ था। जेपी स्पष्ट शब्दों में सरकार के विरुद्ध सिविल नाफरमानी की घोषणा कर चुके थे। सरकार से असहयोग करने की भी अपील की जा चुकी थी। कांग्रेस के अड़ियल रवैये की वजह से आंदोलन थमने के बजाय और तेज होता जा रहा था। दूसरी तरफ न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा के पुतले फूंके जा रहे थे, उन्हें सीआइए का एजेंट बताया जा रहा था।

हालांकि श्रीमती गांधी ने न्यायमूर्ति सिन्हा के पुतले जलाए जाने की निंदा की थी। यही वह दिन था जब नागरिक आजादी, स्वतंत्र विचरण, मुक्तलेखन के दरवाजे बंद कर दिए गए। 26 जून की सुबह तो हुई पर अन्य सुबहों से काफी भिन्न। आपातकाल लग चुका था। प्रेस की आजादी कैद हो चुकी थी। अमावस्या की काली-अंधेरी रात की तरह तानाशाही छा चुकी थी। आपातकाल के दूसरे दिन सैकड़ों विपक्षी नेता व कार्यकर्ता गिरफ्तार हो चुके थे। तीस-पैंतीस सांसदों को जेल भेज दिया गया। आपातकाल का दौर आज के विवादों में अब भी जिंदा है। गैर-कांग्रेसी जहां इसे ‘काला दौर’ की संज्ञा देते रहे हैं, कांग्रेस इसे साहसिक कदम बताती आई है। पर वास्तविकता यह है कि उन दिनों लोकतंत्र की रक्षा करने लायक कोई संस्था नहीं बची थी जो इसके रक्षक की भूमिका निभा सके। चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया दब चुका था। न्यायपालिका, संविधान की पतली गली से निकलने की कोशिश में सत्ताधारी पार्टी को नाखुश करने में संकोच करती दिख रही थी। नौकरशाहों की चापलूसी की वजह से प्रशासनिक संस्थाएं न सिर्फ मौन व्रत में थीं बल्कि सत्ता-प्रेम में लिप्त भी थीं। आपातकाल चंूकि व्यक्ति-विशेष के आदेशानुसार थोपा गया था, इसमें संवैधानिक तत्त्वों तथा तौर-तरीकों को ताक पर रख दिया गया। विपक्ष और विरोध की गुंजाइश नहीं बची।

कुल मिलाकर राज्य की लोकतांत्रिक संरचना तार-तार हो चुकी थी। ‘मीसा’ (मेंटेनेन्स आॅफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) लागू कर बिना वारंट गिरफ्तारी की खुली छूट थी। आपातकाल के दौरान मीसा कानून में कई बार संशोधन भी किए गए। तत्कालीनमहाधिवक्ता (अटॉर्नी जनरल) ने तो यह तक कहा था कि ‘आपातकाल के दौरान राज्य किसी को गोली भी मार सकता है जिसका कोई संवैधानिक प्रतिकार नहीं है।’ निश्चित रूप से आपातकाल के दिन भय और अविश्वास भरे थे।  31 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटा लिया। फिर चुनाव की घोषणा हो गई। नवगठित जनता पार्टी को अपार जनसमर्थन प्राप्त हुआ। श्रीमती गांधी चुनाव हार गर्इं और जनता पार्टी विजयी हुई। इन तमाम प्रसंगों व घटनाक्रम से देश को एक बड़ी सीख मिली है।

जब कोई व्यक्तिया नेता अपने को पार्टी या राष्ट्र का पर्याय मान लेता है, लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन और तानाशाही की बुनियाद वहीं से शुरू हो जाती है। वस्तुत: इंदिरा गांधी को ‘गरीबी हटाओ’ जैसे लोकलुभावन नारों ने जनता के बीच एक मसीहा बना दिया था। 1971 के चुनावों में अपार जनसमर्थन मिलना पार्टी और व्यवस्था को पीछे छोड़ श्रीमती गांधी को काफी आगे बढ़ा गया जो उन्हें तानाशाही का मार्ग अपनाने से नहीं रोक सका। लिहाजा, एक पार्टी का बहुत ज्यादा मजबूत हो जाना, विपक्ष का अत्यंत कमजोर होना, पार्टी में प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के बजाय चापलूसों का बोलबाला होना, कृत्रिम राष्ट्रवाद का माहौल तैयार करना आपातकाल जैसे दिनों का स्मरण कराता है। हालांकि औपचारिक रूप से आपातकाल थोपना अब बहुत मुश्किल हो गया है, पर कृत्रिम राष्ट्रवाद और लोकप्रिय भाषणों के बीच अमूमन ऐसी आशंकाएं बनी रहती हैं जो किसी व्यक्ति-विशेष को संस्थागत तंत्रों व सिद्धांतों से ऊपर उठा देती हैं। यही गलती 1975 में हुई थी, जो अब हर नागरिक के लिए सबक है।
लेखक जनता दल (यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

 

केसी त्यागी

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  1. I
    indrajeet
    Jun 26, 2017 at 4:53 pm
    thoda manmohan ji ke karykaal me huge ghotalo ka jikar bhi kar lo. 1975 me to hum the nhi isliye suni sunai bato par vishvas nhi kar sakte. lekin 2004 se 2014 tak bharat loot ka khel congresiyo ne khela hai vo humane dekha hai har machine koi n koi scam.is aadhar par yhi kaha ka sakta hai imergency Indira dwara jaan bujhkar lgaya gya tha taki congress ka koi virodh karne vala hi n the lekin Indira safal n ho payi.aaj bhi congress loksabha me 44seat par pahuch gayi hai Karnataka ke alawa aur kisi bade state me satta me nhi . up me 403 seat me mantra 7seat jaisi dayniy avastha me pahuch chuki hai Indira ki congress.
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  2. M
    manish agrawal
    Jun 26, 2017 at 2:09 pm
    आपातकाल लगने के लिए केवल एक व्यक्ति जिम्मेदार था और वो था, जयप्रकाश नारायण ! प्रधानमंत्री​ इंदिरा गांधीजी बहुत शानदार तरीके से हिन्दोस्तान को नेतृत्व दे रही थीं और जन-कल्याण के काम में लगी थीं ! बेहद शालीन और गंभीर स्वभाव की थीं इंदिराजी ! हिन्दोस्तान को पोखरण में परमाणु विस्फोट कर strategically बहुत strong बना चुकी थीं ! पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग कर चुकी थीं, बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर चुकी थीं, लेकिन कभी भी अपने भाषणों में, आजकल के ओछे नेताओं की तरह,अपने इन महान कार्यों का श्रेय नहीं लेती थीं ! सब कुछ अच्छा चल रहा था और हिन्दोस्तान आहिस्ता आहिस्ता लेकिन निश्चित रूप से उन्नति के पथ पर अग्रसर था लेकिन राहु और केतु की तरह राजनारायण और जयप्रकाश नारायण ने देश को ग्रहण लगा दिया और हिन्दोस्तान को आंदोलन, रैली, प्रदर्शन इत्यादि के माध्यम से अराजकता की आग में झौंक दिया ! तब मज़बूरन, राष्ट्रहित में इंदिराजी को आपातकाल लगाना पड़ा ! इंदिराजी जानती थीं की यदि इन निकम्मे विपक्षी नेताओं को सत्ता सौपी तो ये हिन्दोस्तान को तबाह करके रख देंगे क्योंकि अराजकता फैलाने के अलावा विपक्षी किसी काबिल नहीं थे !
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