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दहेज के अभिशाप से मुक्ति कब

दहेज हत्या या दहेज के नाम पर प्रताड़ना का एक पहलू यह भी है कि पिछले कुछ सालों में दहेज उत्पीड़न के मामलों में गिरफ्तारी की संख्या बेतहाशा बढ़ी है।
Author October 8, 2016 04:49 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

श्रीशचंद्र मिश्र

विडंबना है कि पर्याप्त कानूनों के बावजूद कुछ बुनियादी सामाजिक अभिशापों का दंश कम होने के बजाय बढ़ रहा है। साल-दर-साल दहेज के नाम पर होने वाली हत्याओं का बढ़ता आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि दहेज-विरोधी कानूनों को सख्त बनाने और दहेज के खिलाफ व्यापक स्तर पर अभियान छेड़ने का भी कोई खास असर नहीं हो पा रहा है। समाज और परिवार की मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। संपन्नता बढ़ी है। मध्यवर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है। कहने को लोगों की मानसिकता भी बदली है। उनकी सोच उदार हुई है। धर्म के प्रति लोगों की आस्था मजबूत हुई है। पिछले कुछ सालों में धार्मिक अनुष्ठानों में जुटने वाली भीड़ और उसमें लगातार हो रही बढ़ोतरी इसका प्रमाण है। कायदे से ऐसे माहौल में सामाजिक व्यवस्था में सहिष्णुता, धैर्य और संतोष बढ़ना चाहिए। पर हो उलट रहा है।  यह पुराना मिथक पूरी तरह टूट चुका है कि आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दहेज की मांग की जाती है और वह मांग पूरी न होने पर दहेज-हत्या का घिनौना रास्ता अपना लिया जाता है। अब तो संपन्नता के बावजूद अधिक अमीर बनने का लालच इस प्रवृत्ति को जिंदा रखे हुए है। सामाजिक और सरकारी स्तर पर इस प्रवृत्ति के खिलाफ कोशिश हो रही है। खुद लड़कियां भी इस सामाजिक अभिशाप के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखा रही हैं।

किसी भी समाज की पहचान इस बात से होती है कि उसमें महिलाओं का स्थान क्या है? रायटर फाउंडेशन ने दुनिया भर के 370 विशेषज्ञों से 2014 में जो आकलन कराया, उसमें आम राय यही बनी कि महिलाओं की सबसे खराब स्थिति भारत में है। यह तथ्य किसी को इसलिए चौंकाता नहीं क्योंकि महिलाओं पर होने वाले अपराध के लगातार बढ़ते आंकड़े इस कड़वी सच्चाई को सामने लाते रहे हैं। अन्य अपराधों की तुलना में दहेज के लिए महिलाओं के उत्पीड़न के मामले ज्यादा शर्मनाक हैं, क्योंकि यह पूरे समाज की मानसिकता बताते हैं। दहेज के नाम पर रोज औसतन तेईस हत्याएं होती हैं। महिलाओं को प्रताड़ित करने की घटनाएं इससे कई गुना ज्यादा हैं। 2011 में दहेज के नाम पर 8618 महिलाओं की हत्या की गई। 2012 में 8233, 2013 में 8083 और 2014 में 8455।  शर्मनाक है कि दहेज के लिए हत्या वे करते हैं, जो शादी के बाद लड़की के परिजन हो जाते हैं। यह हत्या सिर्फ रिश्तों और विश्वास की नहीं, विवाह जैसे सांस्कृतिक विधान को भी नकारने जैसा है। दहेज हत्याओं की बढ़ती संख्या ज्यादा चिंताजनक है। 2000 में दहेज के लिए 6996 हत्याएं हुर्इं। 2011 में इनकी संख्या 8618 हो गई। 2014 में यह आंकड़ा 8455 पर रहने से साबित हो जाता है कि लोगों में पहले जैसा लालच कायम है। और उसके लिए किसी मासूम की जान लेने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में देश भर में व्यक्तिगत दुश्मनी, जमीन के विवाद और प्रेम प्रसंग के बाद सबसे ज्यादा हत्याएं दहेज को लेकर हुर्इं।

दहेज हत्या या दहेज के नाम पर प्रताड़ना का एक पहलू यह भी है कि पिछले कुछ सालों में दहेज उत्पीड़न के मामलों में गिरफ्तारी की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। इससे समस्या का एक और पक्ष सामने आया है। इनमें कितने मामले सचमुच उत्पीड़न के थे और कितनों में सबक सिखाने के लिए कानून का दुरुपयोग कर गिरफ्तारियां कराई गर्इं, यह तय करना मुश्किल है। बढ़ते मामलों और घटती सजा से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि दहेज उत्पीड़न की ज्यादातर शिकायतें झूठी होती हैं। अक्सर आरोप साबित नहीं हो पाते या पारिवारिक दबाव में शिकायतकर्ता ढीला पड़ जाता है। लेकिन इसका एक गलत संकेत भी है, जिसकी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने इशारा किया है।  दर्ज मामलों की तुलना में कम लोगों का अपराध साबित होने का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वे पुलिस को हिदायत दें कि आइपीसी की धारा 498 ए के तहत मामला दर्ज होते ही गिरफ्तारी करने की तत्परता न दिखाए। पुलिस पहले आश्वस्त हो जाए कि सीआरपीसी की धारा 41 में दिए गए प्रावधानों के तहत गिरफ्तारी करना जरूरी है। इस धारा में नौ बिंदु बताए गए हैं, जिन्हें जांच-परख कर ही गिरफ्तारी की जा सकती है। इसमें अभियुक्त का व्यवहार जांचना और यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि वह कहीं फरार तो नहीं हो जाएगा।

आईपीसी की धारा 498 ए के तहत आरोपित होने वाले व्यक्ति को हालांकि अधिकतम तीन साल की ही सजा मिल सकती है, लेकिन गैर-जमानती धारा होने की वजह से अदालत से किसी अभियुक्त को मुश्किल से ही जमानत मिल पाती है। समस्या यह है कि कौन दहेज हत्या का सचमुच दोषी है और कौन कानून के शिकंजे में फंसा दिया गया, यह तय करना आसान नहीं है। ऐसा रास्ता तलाशना जरूरी है, जिसमें पीड़िता न्याय से वंचित न रह पाए और निर्दोषों को बेवजह परेशान न होना पड़े। पुलिस या कानून के जरिए इस फर्क को समझा नहीं जा सकता। बात घूम-फिर कर समाज या परिवार के विवेक पर आ जाती है।  विवेक का सही इस्तेमाल न होने की वजह से यह उलझन भरी स्थिति आ गई है कि दहेज निरोधक कानून के दुरुपयोग की शिकायतें बढ़ रही हैं। एक तरफ मानवता को तार-तार करने वाली समस्या है, तो दूसरी तरफ उसकी आड़ में प्रतिशोध लेने की बढ़ती भावना। यह सही है कि जिस तरह प्रताड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिए कानून है, उसी तरह कानून उस व्यवस्था का दुरुपयोग कर उस एक पूरे परिवार की इज्जत मटियामेट कर देने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए भी बने। लेकिन इस चर्चा में मूल समस्या को भुलाया नहीं जा सकता। दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें निश्चित रूप से होती हैं, लेकिन उनकी संख्या दहेज के लालच में महिला की जान लेने या उसे आत्महत्या के लिए बाध्य करने वाले मामलों की तुलना में काफी कम है। सवाल इसे रोकने का है।

ऐसे मामलों में दोष साबित होने का अनुपात कम होता जाना ज्यादा चिंता की बात है। कुछ हद तक यह न्याय-व्यवस्था का दोष है। मामलों की संख्या को देखते हुए उनका समय पर निपटारा करने के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। 2011 में दहेज निरोधक कानून के तहत देश भर में एक लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई। अगले सालों में यह संख्या लगातार बढ़ी है। 2011 से 2013 के बीच गिरफ्तारी की तुलना में आरोप-पत्र दाखिल होने का अनुपात पच्चीस से तीस फीसद रहा और फैसला बीस फीसद से भी कम मामलों का हो पाया। लेकिन इसमें बड़ी अड़चन यह है कि इस तरह के संगठनों के लिए दहेज प्रताड़ना कोई अभिशाप नहीं है।  पिछले दिनों काफी विवादास्पद रही धर्म गुरु राधे मां पर इस तरह के आरोप भी लगे कि उनकी शह पर उनके कुछ अनुयायियों ने दहेज के नाम पर प्रताड़ना की। आरोप सही थे या गलत, इसकी गहराई में जाने का कोई मतलब नहीं है। असल बात तो यह है कि धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों को सम्मोहित करने वाले धर्म गुरु अगर दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान छेड़ें तो उसका व्यापक असर हो सकता है। खाप पंचायतें इस दिशा में ज्यादा सार्थक भूमिका निभा सकती हैं।

समस्या किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। लालच किसी को भी अपराध का रास्ता दिखा सकती है। इस तरह का रास्ता अपनाने वालों को न सजा का खौफ होता है न सामाजिक लांछन का। कानून की अपनी सीमा है। दहेज हत्या के लिए आरोपी को मौत की सजा देने का प्रावधान लागू करने में कुछ व्यावहारिक और मानवीय दिक्कतें हैं। दहेज हत्या के आरोपियों के मामले में सामाजिक मानसिकता किस तरह की है, इसकी एक मिसाल अस्सी के दशक में आई। स्टोव फटने से हुई महिला की कथित मौत को दिल्ली की अदालत ने साजिशन हत्या माना और इसे दुर्लभतम अपराध करार देते हुए महिला के पति, देवर और सास को मौत की सजा सुना दी। हाईकोर्ट से वे बरी हो गए। हत्या का दाग लगा होने के बावजूद पति को दूसरी शादी करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। महिला पक्ष की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। उसने तीनों को उम्र कैद की सजा सुना दी। आरोपी परिवार को अगर सामाजिक संरक्षण नहीं मिलता, तो शायद उन्हें अपने कृत्य का भान होता। लेकिन समाज ऐसे मामलों में उदासीन रवैया अपना कर उसे एक परिवार की समस्या के दायरे में बांध देता है।

पिछले कुछ सालों में दहेज उत्पीड़न में ससुराल पक्ष की महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। पिछले चार-पांच साल में हुई गिरफ्तारियों में बीस से बाईस फीसद महिलाओं का होना यही साबित करता है। सरकार ने चार राज्यों को छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में दहेज निरोधक अधिकारियों की नियुक्ति करने की पहल की है। चार राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम और नगालैंड का सामाजिक ढांचा इस तरह का है कि वहां दहेज की समस्या पैर ही नहीं जमा सकी है। उनसे सीख ली जा सकती है।
जाहिर है कि कानूनी स्तर पर दहेज समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। उसके लिए परिवार और समाज की दकियानूसी मान्यता को बदलना होगा। इसके लिए धार्मिक और सामाजिक संगठन बीड़ा उठाएं तो बात बन सकती है।

 

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