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महिला उद्यमियों की मुश्किलें

भारत में ‘स्टार्टअप’ संस्कृति की शुरुआत हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ, और जैसा कि अमूमन होता है इस क्षेत्र में भी पुरुषों का ही दबदबा है।
Author April 19, 2017 04:49 am
(Photo-myentrepreneur.org)

ऋतु सारस्वत

भारत में ‘स्टार्टअप’ संस्कृति की शुरुआत हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ, और जैसा कि अमूमन होता है इस क्षेत्र में भी पुरुषों का ही दबदबा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार देश के कुल उद्यमियों में महिलाएं मात्र चौदह प्रतिशत हैं। इनमें से 7.9 प्रतिशत महिलाएं वे हैं जिन्होंने अपने संसाधन स्वयं जुटाए हैं, सिर्फ 4.4 प्रतिशत महिलाओं को कारोबार शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता संस्थानों व सरकारी बैंकों के माध्यम से मिली। महिला सशक्तीकरण की अवधारणा का सबसे प्रमुख आयाम आर्थिक आत्मनिर्भरता है। ऐसे समय में जब महिला सशक्तीकरण देश के विकास का प्रमुख मुद््दा है, यह आवश्यक हो जाता है कि देश की आर्थिक नीतियां ऐसी हों जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त करें। इस दिशा में अनवरत प्रयास हो भी रहे हैं, फिर भी महिलाएं उद्योग स्थापित करने के मामले में पिछड़ी हुई हैं।

वर्तमान में संपूर्ण विश्व समावेशी समृद्धि की दिशा में काम रहा है। ऐसे में हमारी आदर्श प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि देश की प्रगति व विकास का पचास प्रतिशत निवेश महिलाओं के लिए हो। व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है जो कि महिलाओं के सशक्तीकरण में योगदान कर सकता है। इसके लिए महिलाओं में कौशल विकास की दिशा में काम करना अपरिहार्य है। ऐसा खाका तैयार करने की जरूरत है कि महिलाएं शुरुआती स्तर के कर्मचारी से कॉरपोरेट प्रबंधन के स्तर तक जा सकें। पितृसत्तात्मक भारतीय समाज आज भी, महिलाओं की क्षमताओं को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित है और उनकी कार्य क्षमताओं को लेकर इस कदर सशंकित है कि नवाचार के उनके प्रयासों को वह हतोत्साहित करता है। यहां तक कि विभिन्न सरकारी नीतियों के बावजूद महिला उद्यमियों को बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण सहजता से प्राप्त नहीं होता। हाल ही में देश में इकतीस सौ से ज्यादा महिलाओं और पुरुषों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि महिलाएं पारदर्शिता, सहानुभूति और समस्याएं सुलझाने के मामले में पुरुषों से कहीं ज्यादा आगे होती हैं। उनमें रचनात्मक सोच पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है। उनका संवाद और संबंधित समस्या को लेकर उनके विचार कहीं ज्यादा सुलझे हुए होते हैं। अगर इन तमाम खूबियों के बावजूद महिलाएं ‘स्टार्टअप’ के लिए संघर्ष कर रही हैं तो तय है कि उनपर सामाजिक और सांस्कृतिक पाबंदियों के दायरे बहुत विस्तार से फैले हुए हैं, और इस बात की पुष्टि फेसबुक की ओर से किए गए एक शोध से होती है। शोध के मुताबिक, देश की पांच में से हर चार महिलाएं उद्यमी बनने की खूबी रखती हैं, बशर्ते उनके सशक्तीकरण के लिए बेहतर प्रयास किए जाएं। महिलाओं ने इस अध्ययन में यह स्वीकार किया है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वे खुल कर व्यावसायिक गतिविधियों से नहीं जुड़ पाती हैं। धन की कमी को उद्यमिता में महिलाएं एक बहुत बड़ी बाधा मानती हैं। वहीं एक बड़ा हिस्सा ऐसी महिलाओं का भी है जो कारोबार तो करना चाहती हैं पर उनके पास समुचित जानकारी का अभाव होता है। स्टार्टअप योजना के बारे में जानकारी के अभाव को, इस अध्ययन में, महिलाओं ने स्वीकार किया है।

पर पारिवारिक जिम्मेदारियां, धन का अभाव और कारोबार शुरू करने के लिए जानकारी जुटाना, ऐसी बाधाएं नहीं हैं जिन्हें दूर किया जाना संभव नहीं। हालांकि ‘पारिवारिक जिम्मेदारियों’ को कम करना तब तक संभव नहीं जब तक कि इसमें परिवार के अन्य सदस्यों की सकारात्मक भूमिका न हो। वर्तमान में स्टार्टअप योजना के अधिकांश लाभार्थी पुरुष ही हैं। नैसकॉम स्टार्टअप रिपोर्ट-2016 में बताया गया है कि फुल स्टार्टअप में से केवल नौ प्रतिशत स्टार्टअप महिलाओं के हिस्से में है। साफ है कि महिलाओं को केंद्र्र की वित्तीय योजनाओं का लाभ सही तरीके से नहीं मिल पा रहा है। स्टार्टअप को लेकर एक सबसे बड़ा भ्रम यह है कि इसे सिर्फ वही महिलाएं ही शुरू कर सकती हैं जो या तो उच्चशिक्षित हों या फिर उनकी ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि हो, पर यह मिथ्या धारणाहै। अगर सामाजिक पृष्ठभूमि के लिहाज से देखा जाए तो स्टार्टअप में हाशिए के समुदाय की महिला उद्यमियों की संख्या भी अच्छी-खासी है। अन्य पिछड़ा वर्ग की महिला उद्यमियों की संख्या जहां 40.6 प्रतिशत है वहीं उच्च वर्ग की 40.2 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि अनुसूचित जाति की महिला उद्यमियों की संख्या 12.2 प्रतिशत है। भारत में सबसे अधिक महिला उद्यमी तमिलनाडुु में हैं। दस लाख से ज्यादा महिला उद्यमियों के साथ यह राज्य पहले स्थान पर है। अगर महाराष्ट्र, केरल और आंध्र प्रदेश को जोड़ दें तो देश की कुल महिला उद्यमियों में से साठ प्रतिशत इन्हीं चार राज्यों से हैं। विभिन्न अध्ययनों में कहा गया है कि अगर देश में महिला उद्यमियों की बाधाओं को दूर करना है तो बैंक खातों तक उनकी पहुंच आसान बनाना, वित्तीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना और पूंजीगत जरूरतों को पूरा करने के उपायों को तलाशना होगा।

यों तो देश में इच्छुक महिला उद्यमियों को वित्तीय सहयोग प्रदान करने और उन्हें औपचारिक बैंकिंग संस्थानों से जोड़ने के लिए 2013 में भारतीय महिला बैंक लिमिटेड (बीएमबीएल) की स्थापना की गई थी। वित्तीय सहायता की दिशा में एक अपूर्व निर्णय हाल ही में लिया गया, जिसके तहत सरकार ने अगले तीन साल में हर सरकारी बैंक की प्रत्येक शाखा के लिए एक दलित महिला को उद्यमिता के लिए कर्ज देना अनिवार्य किया है। देश में सरकारी बैंकों की 1.25 लाख शाखाएं हैं। दलित इंडिया चैंबर आॅफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (दिक्की) की तरफ से तेईस राज्यों की राजधानियों में स्टैंडअप इंडिया को लेकन अभियान चलाने का निर्णय लिया गया है। इस योजना में जो भी दलित उद्यमी बनना चाहता है वह दिक्की की मदद से आॅनलाइन आवेदन कर सकता है। जिस क्षेत्र में वह अपना व्यवसाय शुरू करना चाहता है, उसके आसपास के सरकारी बैंक के कर्मचारी स्वयं संपर्क करके उसकी मदद करेंगे। यकीनन यह योजना स्वागत-योग्य है और इससे दलित उद्यमी महिलाओं की वित्तीय समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलेगी। पर इसके साथ ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न, स्टार्टअप योजना को लेकर ‘प्रशिक्षण’ का है। इस दिशा में भी पहल की गई है। हाल ही में खबर आई कि आइआइटी फाउंडेशन ने महिला स्टार्ट क्लब (डब्ल्यूइइ- वीमेन इंटरप्रेन्योरशिप एंड एम्पावरमेंट) बनाने की जिम्मेदारी ली है। इसका उद््देश्य महिलाओं को नवाचार के क्षेत्र में आगे आने के लिए प्रेरित करना है।

तमाम बाधाओं के बावजूद पिछले दो-तीन वर्ष में जिस तरह से महिला उद्यमी सामने आ रही हैं, वह आशाजनक तस्वीर तो पेश करता ही है, यह विश्वास भी दिलाता है कि प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता से, महिलाएं बहुत कम समय में स्वयं को साबित कर सकती हैं। इसके लिए उच्च शिक्षा या एमबीए जैसी किसी डिग्री की भी आवश्यकता नहीं है। इस तथ्य का जीवंत उदाहरण झारखंड में पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा के आसपास के गांवों की अनपढ़ महिलाएं हैं। इन महिलाओं के बनाए कपड़े पिछले दिनों यूरोपियन मास्टर इन टूरिज्म मैनेजमेंट के दीक्षांत समारोह में न सिर्फ शोकेस किए गए, बल्कि टूरिज्म की डिग्री के साथ छात्रों को बतौर प्रतीक चिह्न इनके बनाए कपड़े बांटे गए। ऐसे अनेक उदाहरण देश भर में हैं, पर यक्ष प्रश्न फिर वही है कि कब, समाज और परिवार महिलाओं के प्रति संवेदनशील नजरिया रखेगा। यह तय है कि आने वाले समय में महिला उद्यमियों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में उनकी राह आसान नहीं होगी।

 

 

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