December 09, 2016

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हवा के आपातकाल का जिम्मेवार कौन

वायु प्रदूषण में इजाफा करने वाले सूक्ष्म कणों की बढ़ती मौजूदगी के कुछ कारण और हैं।

धुंध और धुएं से बचने के लिए मास्क लगाए युवक। (PTI Photo)

देश की राजधानी के डेढ़ दशक के इतिहास में 4 नवंबर को ऐसा पहली बार हुआ कि जहरीली धुंध ने पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए और दिल्ली-एनसीआर के कई स्कूलों को कुछ दिनों के लिए इसलिए बंद करना पड़ा ताकि बच्चों को इसके कहर से बचाया जा सके। यह देखते हुए कि दिल्ली में जितनी खुली जगह और हरियाली है उतनी देश के किसी भी महानगर में नहीं है, इसके बावजूद वायु प्रदूषण के मामले में इमरजेंसी जैसे हालात किसी को भी हैरान कर सकते हैं।
दिल्ली समेत हमारे देश के ज्यादातर शहरों में हवा किस हद तक खराब हो गई है, इसका एक अंदाजा यूनिवर्सिटी आॅफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थशास्त्रियों ने अपने अध्ययन के जरिये लगाया है। अध्ययन के मुताबिक भारत में करोड़ों लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां की हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर) का प्रदूषण इस देश के ही सुरक्षित मानकों से ऊपर है। इन अर्थशास्त्रियों ने सुझाव दिया था कि अगर भारत वायु प्रदूषण के मानकों को पूरा करने के लिए आंकड़ों को उलट दे तो इतने भर से 66 करोड़ लोगों की जिंदगी में तीन साल का इजाफा हो जाएगा।

यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के प्रत्येक सात में से एक बच्चा उन क्षेत्रों में रह रहा है जहां घर से बाहर (आउटडोर) वायु प्रदूषण बेहद गंभीर स्थिति में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ष 2014 के एक सर्वे में यह भी बता चुका है कि दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों में से तेरह शहर भारत में हैं। डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा था कि वायु प्रदूषण भारत में अकाल मौतों की प्रमुख वजहों में एक है। इससे संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल छह लाख बीस हजार लोगों की मौतें भारत में होती हैं। जहरीली हवा में सांस लेने का पहला मतलब श्वास की बीमारियों को न्योता देना है क्योंकि यह हवा हमारे फेफड़ों पर सीधा असर डालती है। लेकिन इसके आगे दिल के रोग और आंखों की बीमारियां भी इसी हवा की देन मानी जाती हैं।

जो लोग अपने घरों-वाहनों में एयर प्यूरीफायर जैसे इंतजाम नहीं कर सकते और जिनके लिए घर से बाहर निकल कर सड़कों पर आना मजबूरी है, उन्हें प्रदूषित हवा में सांस लेते हुए इन बीमारियों का शिकार बनना ही पड़ता है। इस बारे में डब्ल्यूएचओ का कहना है कि भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसी प्रदूषित हवा में सांस लेने को बाध्य है, जो सुरक्षा मानकों के हिसाब से कम से कम ढाई गुना अधिक प्रदूषित है। इन्हीं वजहों से वर्ष 2012 में वायु प्रदूषण की चपेट में आकर करीब सैंतीस लाख मौतों का विश्वव्यापी अनुमान लगाया गया था। इससे जुड़ा एक आंकड़ा एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स का है, जिसमें प्रकाशित एक शोध के अनुसार वायु प्रदूषण से हर साल करीब छब्बीस लाख लोग असमय मृत्यु के शिकार हो रहे हैं। दुनिया में जो लगभग 4 लाख 70 हजार औद्योगिक इकाइयां हैं, वे इतना धुआं उगल रही हैं कि अकेले उन्हीं के कारण इक्कीस लाख मौतें हो रही हैं।

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बहरहाल, जब हालात इतने विकट हों तो सवाल उठना लाजिमी है कि इसके लिए जिम्मेवार कौन है और किस वजह से हवा में इतनी खराबी पैदा हो रही है। खुद जनता का एक बड़ा वर्ग इसके लिए जिम्मेवार है। पर अपनी ओर उंगली कौन उठाए! देश का वह विशाल मध्यवर्ग, जो आज कारों का शौकीन है और हर पर्व-त्योहार को धूम-धड़ाके से मनाता है, जब दीपावली पर हजारों करोड़ के पटाखे फूंकता है और छोटी-सी छोटी दूरी भी कार्बन डाइआॅक्साइड उगलने वाली कारों से तय करता है तो यह नहीं देखता कि उसके ये शौक पर्यावरण की कैसी और कितनी बड़ी बलि लेते हैं।

वायु प्रदूषण में इजाफा करने वाले सूक्ष्म कणों की बढ़ती मौजूदगी के कुछ कारण और हैं। जैसे, पिछले कई सालों में यह पता चला है कि दिल्ली से सटे पड़ोसी राज्यों में र्इंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाला बायोमास (गोबर के उपले-कंडे), कोयला, लकड़ी, कृषि कचरा यानी पराली जलने के बाद जो धुआं और कार्बन डाइआॅक्साइड वायुमंडल में पैदा करते हैं, उनसे दूषित हवा की मारक क्षमता और बढ़ जाती है। कोढ़ में खाज वाले हालात देश में धुआंधार ढंग से हो रहे निर्माण-कार्यों की वजह से भी पैदा होते हैं। सड़कें-राजमार्ग बन रहे हैं, जिनसे भारी मात्रा में धूल पैदा हो रही है। आवासीय इमारतें खड़ी हो रही हैं, जिनसे भारी गर्द हवा में पैठ रही है। इसके बाद सीमेंट-रेत-बजरी आदि के रूप में तमाम तरह का कंस्ट्रक्शन कबाड़ है, जिसे यहां से वहां ले जाकर पहुंचाने या ठिकाने लगाने में सूक्ष्म कणों की मात्रा हवा में खतरनाक ढंग से बढ़ जाती है। कोई बिल्डिंग बनाते और गिराते वक्त वातावरण में बहुत ज्यादा धूल पैदा होती है जो सीमेंट और रेत आदि से बनती है। यह धूल हवा में घुल जाती है, और बारिश न हो तो लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती है।

इन चीजों के असर को मापने के लिए पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी ने वायु गुणवत्ता सूचकांक (एयर क्वॉलिटी इंडेक्स) शुरू किया था, पर इससे सबक लेकर हवा को दूषित होने से रोकने का कोई बड़ा इंतजाम होते दिखाई नहीं दे रहा है। और कुछ नहीं तो इतना ही कर लिया जाता कि नगर निगमों को निर्माण एवं ध्वंस कचरा प्रबंधन नियमावली (कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलेशन वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स) के तहत यह व्यवस्था कराने के लिए बाध्य किया जाता कि जिन जगहों पर निर्माण-कार्य चल रहे हैं, वहां सीमेंट-रेत-बजरी पहुंचाने और वहां से कचरा उठाने का काम अनिवार्य रूप से बंद कंटेनरों वाले ट्रकों से ही हो। इसी तरह जो लोग भोजन पकाने के लिए लकड़ी या गोबर के उपलों (कंडों) का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें र्इंधन के स्वच्छ विकल्प मुहैया कराने चाहिए। सर्दियों में सरकारी महकमे गरीबों के लिए जो अलाव जलाते हैं, उसे एक अच्छे काम की श्रेणी में गिना जाता है, पर यह सदाशयता भी वायुमंडलीय हवा को धुंधला व जहरीला बनाने में मददगार है।

वैसे तो दिल्ली सरकार अपने यहां से होकर आने-जाने वाले ट्रकों से अब हरित टैक्स की वसूली करने लगी है, जिसका इस्तेमाल पर्यावरण सुधार में किया जा सकता है, पर यह काम जब होगा, तब होगा। फिलहाल तो दिल्ली आने-जाने वाले पच्चीस हजार ट्रक और बस जैसे भारी वाहन डीजल से चल रहे हैं और वाहनों से होने वाले कुल पच्चीस फीसद वायु प्रदूषण में काफी बड़ा योगदान दे रहे हैं। कारें तो खैर लगातार शहरों की छाती पर काबिज हो रही हैं जो ट्रैफिक जाम के साथ-साथ हवा की सेहत बिगाड़ने का काम लगातार कर रही हैं। एक खतरा बड़ी फैक्ट्रियों और उद्योग-धंधों में कोयले व खनिज तेल का उपयोग बढ़ना है। इस प्रकार के र्इंधनों के जलने से सल्फर डाइआॅक्साइड निकलती है जो हम इंसानों के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है।

कुल मिलाकर इन सारी वजहों से वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषित कण इंसानों में कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं। जैसे सल्फर डाइआॅक्साइड से फेफड़े, कैडमियम पदार्थों से हृदय रोग और कार्बन मोनोआक्साइड से कैंसर और श्वास संबंधी रोग होते हैं। हवा का यही प्रदूषण जब बादलों तक पहुंचता है तो अम्ल वर्षा के रूप में धरती पर वापस लौटता है। इससे खेती को नुकसान होता है और मनुष्यों व जानवरों में त्वचा संबंधी विकार पैदा होते हैं। इन सारी बातों के बाद एक अफसोस यह है कि जब भी वायु प्रदूषण के बारे में कोई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आती है, तो रोकथाम के उपायों पर गंभीर चर्चा कर इंतजाम करने के बजाय उस रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लगाने की कोशिश होती है। एक उदाहरण डब्ल्युएचओ की वर्ष 2014 की रिपोर्ट का ही है। इस रिपोर्ट में जब दुनिया के सोलह सौ शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति दर्शाते हुए दिल्ली को सर्वाधिक प्रदूषित बताया गया और धुंध के लिए बदनाम रहे बेजिंग को सूची में 77वें स्थान पर रखा गया, तो रिपोर्ट को ही संदिग्ध कहा गया। भारत सरकार से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि रिपोर्ट में दिल्ली की हवा का प्रदूषण बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया, जबकि बेजिंग के मामले में उसे कम दिखाया गया।

इस बारे में एक आपत्ति ‘सिस्टम आॅफ एयर क्वॉलिटी वेदर फोरकॉस्टिंग ऐंड रिसर्च’ (सफर) के मुख्य प्रोजेक्ट वैज्ञानिक गुफरान बेग ने की थी। उनके मुताबिक दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर तो बढ़ा है लेकिन हालात इतने गंभीर नहीं हैं। ‘सफर’ की रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2014 के बीच दिल्ली की हवा में प्रदूषण दस से बीस फीसद बढ़ा। यानी इस दौरान यहां के वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी लगातार भले हुई है, लेकिन वह एक अनुपात में हो रही थी। अचानक इसका स्तर बहुत ज्यादा बढ़ना या घटना तर्कसंगत नहीं लगता। पर इस साल दीपावली के इर्दगिर्द धुंध और धुएं के गुबार अचानक ही उठे हैं। साफ है कि समय रहते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के कदम न उठाए गए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जा सकती है। यों दिल्ली सरकार ने सड़कों को वैक्यूम क्लीनर से साफ करने, शहर के कुछ इलाकों में विशालकाय एयर प्यूरीफायर लगाने का एलान किया है। पर ये उपाय तभी कारगर हो सकते हैं जब जनता हवा के प्रदूषण को कम करने में अपना योगदान दे।

 

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First Published on November 9, 2016 5:47 am

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