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महिला सुरक्षा की चुनौतियां

साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान मुसलिम औरतों से बलात्कार के काफी मामले सामने आए।
निर्भया गैंग रेप केस: इस केस में कुल छह लोग दोषी थे।

देश को हिला देने वाले 16 दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले में दोषियों की अपील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए फांसी की सजा को बरकरार रखा है। इस गैंगरेप के चार दोषियों को साकेत की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी, जिस पर 14 मार्च 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मुहर लगा दी। दोषियों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पर रोक लगा दी थी। मगर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में फांसी की सजा बहाल कर दी।  16 दिसंबर 2012 ऐसा दिन था जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। सवाल है कि पूरे भारत को विचलित कर देने वाले इस कांड के बाद क्या महिला सुरक्षा के मामले में हमारे देश का परिदृश्य सुधरा है? कहा गया कि अब कड़ा कानून बन गया है, अब ऐसे कुकृत्य बंद हो जाएंगे। लेकिन क्या ऐसा हुआ है? क्या देश भर में महिलाएं अपने आपको अब सुरक्षित मान रही हैं?

देश की राजधानी दिल्ली और अनेक राज्यों से बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की खबरें लगातार आती रही हैं। पुलिस और प्रशासन ऐसी वारदातों को रोकने में नाकाम रहे हैं। बेटियों के सशक्तीकरण की जिम्मेदारी परिवार की होती है और उनकी रक्षा का जिम्मा कानून के साथ-साथ हम सब का। लेकिन लगता है कि इस कोशिश में हम असफल रहे हैं। निर्भया कांड के कई वर्ष बाद भी समाज में महिला सुरक्षा का विषय जस का तस है। दिल्ली के अतिरिक्त राजस्थान, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बालिग-नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार की कई घटनाएं हुर्इं। यहां तक कि छोटी बच्चियां भी इस तरह की हैवानियत से बच नहीं पार्इं। पिछले वर्षों में जो कुछ मामले सामने आए उनमें सबसे दर्दनाक है मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग का मामला। अरुणा जिस अस्पताल में काम करती थीं वहां के क्लीनर ने उनके साथ गुदा मैथुन किया, जंजीर से उनका गला घोंटने की कोशिश की और फिर उन्हें बुरी हालत में छोड़ कर चला गया। अरुणा के जीवन पर किताब लिख चुकीं लेखिका पिंकी विरानी कहती हैं, ‘उस व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार का मामला भी दर्ज नहीं किया गया।’ नतीजा यह हुआ कि वाल्मीकि को लूटपाट और हत्या के प्रयास के लिए सात साल की कैद हुई। पिंकी विरानी कहती हैं कि उन्होंने वाल्मीकि को ढूंढ़ने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पार्इं।

मणिपुर में साल 2004 में असम राइफल्स के जवान मनोरमा नाम की महिला को उसके घर से यह कह कर ले गए कि वह चरमपंथियों की मदद कर रही है। कुछ घंटों के बाद उसका क्षत-विक्षत शरीर सड़क के किनारे मिला। उसके कूल्हों के पास की जगहों पर गोलियां मारी गई थीं। साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान मुसलिम औरतों से बलात्कार के काफी मामले सामने आए। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों का कहना है कि कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सुरक्षाबल इसे पूरे समुदाय को सजा देने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। कश्मीर के शोपियां में कुछ वर्ष पहले पुलिस पर दो औरतों के बलात्कार और हत्या का आरोप लगा, फिर सैंतालीस दिनों तक कश्मीर बंद रहा था। हालांकि तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने बीबीसी को भेजे गए एक बयान में कहा था कि सीबीआई जांच में पाया गया कि दोनों महिलाओं की मौत डूबने की वजह से हुई। बयान में यह भी कहा गया कि जांच के मुताबिक इनका बलात्कार नहीं किया गया था और न ही हत्या हुई थी।

छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी नाम की आदिवासी महिला को पुलिस ने अक्टूबर 2011 में माओवादियों की संदेशवाहक होने के आरोप में बंद कर दिया। सोरी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि पुलिस हिरासत में उनके साथ बलात्कार किया गया और उनके गुप्तांगों में पत्थर की टुकड़ियां घुसेड़ी गर्इं। ये और इन जैसे बहुत-से पीड़ित न्याय मिलने का इंतजार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। कई बार अपराधियों को मामूली सजा देकर ही अदालतें संतुष्ट हो जाती हैं। कई मामलों में अदालतें हल्की सजा देते हुए इस तर्क को मान लेती हैं कि अपराध करते समय अपराधी नशे में थे या लंबे समय से परिवार से दूर रह रहा था। कई बार तो दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में यह मान लिया जाता है कि अभियुक्त ऊंची जाति से ताल्लुक रखता है और वह किसी दलित औरत का बलात्कार कर ही नहीं सकता। दूसरी तरफ हमारी न्याय व्यवस्था बहुत धीमी है। अधिकतर मामलों में अपराधियों को सजा नहीं हो पाती। बहुत सारे मामले पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं क्योंकि बलात्कार को लेकर समाज में एक खास किस्म की मानसिकता है जिसकी वजह से पीड़ित को शर्म का अहसास कराया जाता है, उसे बेहद अपमानित किया जाता है। इतना ही नहीं, लोग ऐसे मामलों में घृणित रूप से रस लेते हैं। पीड़िता के साथ उसके परिजनों और संबंधियों तथा सहानुभूति रखने वालों को भी अपमानित किया जाता है।

निर्भया कांड के बाद देश भर में उभरे जन आंदोलन का एक असर यह हुआ कि यौनहिंसा संबंधी कानूनों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। समिति की सिफारिशों के आधार पर यौनहिंसा संबंधी कानूनों को और कठोर बनाया गया? लेकिन हालात जस के तस हैं। इससे एक बात तो जाहिर है, वह यह कि सिर्फ कानून को और सख्त बना देने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। स्त्री-सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और समाज की मानसिकता में भी बदलाव लाना होगा।
हालांकि निर्भया मामले में त्वरित न्याय प्रक्रिया अपनाई गई। जल्दी निर्णय हुआ। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला काफी उछला। मीडिया की इसमें विशेष भूमिका थी। सरकार, न्यायालय, पुलिस और प्रशासन ने खूब अपनी पीठ थपथपाई, जैसे कि यही एकमात्र यौन क्रूरता का मामला भारत में हुआ हो। न भूतो न भविष्यति। सब अपने इस कर्तव्य निर्वाह से पूर्णरूपेण संतुष्ट हो गए। न पहले से चल रहे लाखों मामलों की किसी को चिंता रही न आगे के लिए न्याय प्रक्रिया को त्वरित बनाया गया। इससे क्या प्रमाणित होता है? सरकार, पुलिस और प्रशासन संवेदनशील हो गए हैं, या अपने उदासीन रवैए को पूर्ववत कायम रखे हुए हैं? निर्भया मामले में फैसला होने पर तालियां तो बजीं लेकिन महिलाओं पर लगातार हो रहे यौन अपराधों के विरोध में कोई सक्रिय आंदोलन नहीं दिखाई दिया।

आखिर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? यदि अपराध रुक नहीं रहे हैं तो उसके लिए क्या सिर्फ अपराधी दोषी हैं या व्यवस्था की भी कोई भूमिका है, जवाबदेही है? अपराधियों को बेलगाम किसने कर रखा है? अगर देश भर में महिलाएं अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं, तो क्या यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नहीं है? क्या यह प्रशासनिक संवेदनहीनता नहीं है? पुलिस किसके इशारों पर दबंग या रसूख वाले आरोपियों को छोड़ देती है, उनके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती, या दर्ज करने के बाद सबूतों को लचर बना देती है? क्यों अपराधों पर उन्नत सूचना तकनीक द्वारा निगरानी नहीं रखी जाती? क्यों हो-हल्ला और शोर-शराबा होने पर ही सरकार और प्रशासन की नींद खुलती है? इन प्रश्नों पर भी सोचना जरूरी है।

 

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