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भ्रष्टाचार से कौन लड़ेगा

पेट भरने की भूख नहीं बल्कि अपने लिए अधिक से अधिक वैभव और सुविधाएं जुटाने की भूख व्यक्तिको भ्रष्ट आचरण की तरफ धकेलती है। जिम्मेदार लोगों का यह भ्रष्ट आचरण ही हमारे लोकतांत्रिक जीवन की सबसे बड़ी विसंगति बन गया है।
Author September 12, 2017 04:47 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

अतुल कनक

पिछले दिनों आए एक सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने हर संवेदनशील भारतीय को शर्मसार किया है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अर्थात ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ एशिया महाद्वीप में सबसे भ्रष्ट पाया गया है। एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत दुनिया के 175 प्रमुख देशों में भ्रष्टाचार की दृष्टि से 79वें पायदान पर है। इस सर्वेक्षण के अनुसार सोमालिया दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश है। लेकिन भारत के संदर्भ में भ्रष्टाचार के प्रकरणों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि यहां तो भ्रष्टाचार भरे-पेट लोगों के कारण फला-फूला है। जिस देश में राष्ट्रप्रेम पर सर्वस्व बलिदान कर देने की परंपरा हो, जहां राजकुमारों के सामने घास की रोटी देख कर विचलित हुआ राणा एक कवि के संबोधन के बाद आजादी की जंग को अपने जीवन का सर्वोच्च उपादान मान कर जीवन जीता हो- उस देश में भूख किसी को राष्ट्रहित से समझौता करने पर बाध्य कर दे- यह सहज प्रतीत नहीं होता। दरअसल, पेट भरने की भूख नहीं बल्कि अपने लिए अधिक से अधिक वैभव और सुविधाएं जुटाने की भूख व्यक्तिको भ्रष्ट आचरण की तरफ धकेलती है। जिम्मेदार लोगों का यह भ्रष्ट आचरण ही हमारे लोकतांत्रिक जीवन की सबसे बड़ी विसंगति बन गया है।

ऐसा भी नहीं है कि सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की देन है। अच्छी और बुरी प्रवृत्तियां हर युग में रही हैं और अपना उल्लू सीधा करने के लिए सामर्थ्यवान लोगों ने दूसरों के लालच का दोहन हर युग में किया है। महाभारत काल में प्रयुक्त हुए शब्द ‘उत्कोच’ का अर्थ प्रलोभन ही है जो अपने मूल में भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा देता है। चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु चाणक्य ने तो अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में भ्रष्टाचार के चालीस रूपों का वर्णन करते हुए इस बात की विशद चर्चा की है कि भ्रष्टाचार विशेषकर राज्य व्यवस्था से संबद्ध कार्मिकों के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए क्या-क्या उपाय किए जाने चाहिए और किसी व्यक्ति को कड़े प्रतिबंधों के बावजूद यदि दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कितनी सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ प्राचीन भारत में राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे प्रामाणिक दस्तावेजों में एक माना जाता है और यदि उसमें राजकीय कर्मचारियों (भृतकों) के भ्रष्टाचार पर विशद चर्चा की गई है तो यही जाहिर होता है कि सदियों पहले भी भ्रष्टाचार नीति नियामकों के लिए एक बड़ा सिरदर्द था। हां, तब से लेकर अब तक एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि हमारे दौर में नीति नियंता तंत्र से जुड़े कई जिम्मेदार लोग भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं। अर्थात जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो फिर आम आदमी किससे उम्मीद करे? पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए राजनीतिकों, न्याय-प्रशासन-पुलिस व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों, पत्रकारों, खूबसूरत मॉडलों और उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार को संरक्षण देते या भ्रष्टाचार में लिप्त होते पाया गया है उसे देख कर लोगों को चाणक्य की कही यह बात याद आ जाती है कि आसमान में उड़ती हुई चिड़िया की उड़ान के रास्ते का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है लेकिन लोगों के भ्रष्ट आचरण के तरीकों का पूर्वानुमान बहुत कठिन है। दरअसल, पेट की भूख से भी अधिक खतरनाक होती है धन और शरीर की भूख। ज्यादा से ज्यादा धन जोड़ने की लालसा में अनेक चतुर सुजान स्त्री के शरीर के प्रति पुरुष की आदिम भूख का इस्तेमाल करते पाए गए हैं। अनेक स्त्रियों ने भी प्रकृति द्वारा प्रदत्त सौंदर्य की शक्ति का उपयोग अपना या अपने आकाओं का उल्लू सीधा करने के लिए किया है। यह महज दुर्योग नहीं है कि बाबाओं से लेकर जिम्मेदार अफसरों और राजनीतिकों तक के कार्यव्यवहार पर इस जादुई डंडे के असर के ढेरों किस्से हैं। चाणक्य ने इसीलिए भृतकों के चारित्रिक व्यवहार के अध्ययन पर बहुत जोर दिया है। चाणक्य तो उच्चाधिकारियों के घनिष्ठ संपर्कों वाले परिवारों या व्यक्तियों तक के व्यवहार और अनुशीलन पर बारीक नजर रखने के पक्षधर थे। चाणक्य का कहना था कि प्रजा का सुख ही राजा का सुख होना चाहिए और प्रजा का हित ही राजा का हित- जो प्रजा को प्रिय न हो वह राजा को प्रिय हो ही नहीं सकता।

लेकिन लोकतंत्र के अनुभव अपने सत्ताधीशों की प्राथमिकता कुछ और पाते हैं। यदि किसी मुख्यमंत्री को पशुओं के चारे की खरीद में घोटाले का दोषी पाया गया है (लालू प्रसाद), तो किसी नेता को किसी शिक्षण संस्थान में आबंटित सीटों में प्रवेश के प्रकरण में अवांछित व्यवहार का दोषी पाया गया और उसे न केवल सजा सुनाई गई बल्कि राज्यसभा की सदस्यता से भी निलंबित कर दिया गया (राशिद मसूद)। कोई विधायक आय से अधिक संपत्ति के मामले में तीन साल की सजा सुनाए जाने के बाद विधानसभा की सदस्यता से वंचित किया गया (बबन राव घोलप/ महाराष्ट्र) तो बहुचर्चित कोयला घोटाले में तत्कालीन मुख्य आॅडिटर जनरल भी एक आरोपी हैं। बोफर्स घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, 2010 का राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला, कोयला खान आबंटन घोटाला, कर्नाटक का खनन घोटाला…. आजादी के बाद के घोटालों की गणना करें तो ऐसे अनगिनत नाम जनता की स्मृति में कौंधेंगे, लेकिन कितने आरोपियों को वैसी सजा हुई जैसी सजा की संस्तुति चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में सैकड़ों साल पहले कर दी थी।

बहुधा लोग तब तक ही जिम्मेदार बने रहते हैं जब तक कि उन्हें भ्रष्ट होने का मौका नहीं मिलता। यदि कोई सामान्य व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल को तोड़ कर अपनी मोटर साइकिल भगा लेकर ले जाता है तो कानून की दृष्टि में यह भी अपराध है। लेकिन हममें से कितने लोग जाने-अनजाने कानून की अवहेलना कर देते हैं। कानूनन राजस्थान में पॉलीथिन की थैलियों पर प्रतिबंध है लेकिन लोगोंं को उनके उपयोग की ऐसी आदत हो गई है कि पॉलीथिन जीवन की अनिवार्यता प्रतीत होता है और समझाए जाने पर यह तर्क सामने आता है कि बड़े-बड़े कानूनों की ही पालना नहीं हो रही तो इस कानून के उल्लंघन से क्या फर्क पड़ता है! यह ‘क्या फर्क पड़ता है’ वाली मानसिकता ही हमारे सामाजिक आचरण में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती जाती है। लोग सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को कोसते हैं लेकिन अपने मकान या दुकान के बाहर ‘इतना तो चलता है’ कह कर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर लेते हैं। 1990 के दशक में साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत हुई राजस्थानी भाषा के कवि प्रेमजी प्रेम की पुस्तक ‘म्हारी कवितावां’ (मेरी कविताएं) की एक कविता है- ‘भ्रष्टाचार/ कठी छै भ्रष्टाचार?/ बता तो दूं/ पण प्हैली पांच रूप्या ला।’ (भ्रष्टाचार?/ कहां है भ्रष्टाचार?/ बता तो दूं/ लेकिन पहले पांच रुपए दे।) यह कविता बहुत संजीदगी से उस मानसिकता की पोल खोलती है जिसमें लोगों को दूसरों का अवांछित व्यवहार तो भ्रष्टाचार लगता है लेकिन अपने उसी किस्म के व्यवहार के पक्ष में उनके पास बहुत ‘तर्क’ होते हैं।

चाणक्य का कहना है कि जिस तरह इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है कि किसी नदी में तैर रही मछली कितना पानी पी जाती है ठीक उसी तरह कोई भ्रष्ट व्यक्ति कितना पतन को प्राप्त हो सकता है, यह अनुमान लगाना भी कठिन है। हालांकि चाणक्य ने यह बात सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले गबन के संबंध में कही थी लेकिन सभी श्रेणियों के भ्रष्ट आचरण पर यह बात लागू होती है। यह हमारे सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में चतुर्दिक नैतिक पतन का ही परिणाम है कि आज हमें एशिया में सबसे भ्रष्ट देश होने का तमगा मिला है।

 

 

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