December 10, 2016

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जलवायु परिवर्तन पर जुबानी जमाखर्च

वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है।

Author November 23, 2016 03:39 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में करीब दो सौ देशों ने एक स्वर में मराकेश कार्य-घोषणा पर अपनी मुहर लगाई है और यह संकल्प भी पारित किया कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा। सम्मेलन ने पेरिस समझौते, इसके तेजी से क्रियान्वयन, महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों, समावेशी प्रकृति और समान व साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और अपनी-अपनी क्षमताओं के साथ जलवायु परिवर्तन से होने वाले जोखिम से निपटने के लिए कार्रवाई करने की रणनीति को अंतिम रूप दिया है। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हुए सम्मेलन ने वर्ष 2018 तक पेरिस जलवायु करार को लागू करने की कार्ययोजना को पारित कर एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक पहल उस वक्त की गई है जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस करार से अमेरिका के अलग हो जाने का इरादा जताया है।  जलवायु शिखर सम्मेलन में इस जोर दिया गया कि विकसित देश क्योटो प्रोटोकाल में तय अपनी-अपनी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप उत्सर्जन कम करने के लिए जल्द और जरूरी कदम उठाएं। क्योटो प्रोटोकाल वर्ष 2020 में समाप्त होगा। मराकेश सम्मेलन का इरादा तो निश्चित रूप से नेक है लेकिन कई अहम मुद््दों पर कामयाबी न मिलना दुखद है। मराकेश सम्मेलन में कृषि, वित्त अनुकूलन व वर्ष 2020 से पहले के सुझावों सहित कई महत्त्वपूर्ण मुद््दों पर ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद तक पहुंच- वर्ष 2020 से पहले और वर्ष 2020 के बाद- दोनों अवधियों में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गई है। यह बात भारत को भी कुरेद रही है।

दरअसल, नई वैश्विक ऊर्जा रणनीति के बगैर, जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन उत्सर्जन बढ़ता ही रहेगा और वैज्ञानिकों की मानें तो इसका प्रभाव दस हजार वर्षों तक रहेगा। मराकेश जलवायु सम्मेलन में शोधकर्ताओं की इस नई चेतावनी पर जरूर चर्चा हुई जिसमें कहा गया है कि बढ़ते वैश्विक ताप, बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्री जलस्तर का बढ़ना, जलवायु परिवर्तन के उन परिणामों में शामिल है जिससे कि आखिरकार समुद्रतटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे। समुद्रतटीय क्षेत्रों में एक करोड़ तीन लाख लोग रह रहे हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन में ‘सोलर अलायंस’ पर हस्ताक्षर हो गए। लेकिन बड़े देशों की उदासीनता से कई सवाल भी अब खड़े हो गए हैं। सोलर अलायंस का मकसद सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और इसका उत्पादन बढ़ा कर इसकी कीमत कम करना है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस गठजोड़ या करार की उपयोगिता जाहिर है। लेकिन विशेषज्ञों की बातों पर गौर किया जाए तो इस अलायंस को लेकर सबसे बड़ी चिंता धन और तकनीक को लेकर बनी हुई है। असल में सोलर अलायंस को लेकर अब तक फंड की कोई रूपरेखा भी तैयार नहीं हुई है। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बड़े विकासशील देश इसका हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक फंड की दिक्कत बनी रहेगी। यहां यह बताना भी जरूरी है कि बहुत-से गरीब देश इस अलायंस में केवल मदद की उम्मीद से शामिल हुए हैं। भारत का भी इस बारे में स्पष्ट पक्ष है कि नई तकनीक और नए अनुसंधान की जरूरत पड़ेगी और इसके लिए पर्याप्त पैसा चाहिए। यह काम अकेले भारत के लिए कतई संभव नहीं है; वह तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है। धन के अभाव में कई बड़े-बड़े संस्थान रोजाना ही अपना रोना रोते रहते हैं।

लिहाजा, धरती को गर्म होने से रोकने की मुहिम में धन की कमी आड़े आ सकती है। पेरिस समझौते के तहत एक हरित जलवायु कोष बनना है, जिससे हर साल गरीब और विकासशील देशों को करीब सौ अरब डॉलर देने का प्रस्ताव है। सबसे बड़ी दिक्कत यह आ सकती है कि कहीं अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी तरह का अंशदान करने से इनकार न कर दें। अमेरिका को वर्ष 2020 तक इस महत्त्वपूर्ण फंड में तीन अरब डॉलर देना है। अगर वह नहीं देता है तो इस बड़ी पहल को जोरदार झटका लग सकता है।
दो सबसे महत्त्वपूर्ण बातों पर पूरे विश्व को ध्यान देना होगा। एक तो यानों के उड़ान द्वारा होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, और दूसरा, मांट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन, जिसमें शक्तिशली ग्रीनहाउस को हटाना विशेष रूप से शामिल है। अहम बात यह है कि पेरिस समझौते के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य- 1.5 डिग्री तापमान की सीमा- को दरकिनार कर दिया गया है। इसके संपूर्ण क्रियान्वयन को 2.7 डिग्री तापमान की वृद्धि से जोड़ा गया है। सवाल यह है कि अब कोई भी देश 1.5 डिग्री तापमान की सीमा के लक्ष्य से कैसे आगे बढ़ सकता है। वर्ष 2018 में जब इसकी समीक्षा होगी तब वास्तविक स्थिति का आकलन संभव है। वर्ष 2018 में ही पेरिस समझौते की भी समीक्षा होनी है। लेकिन पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की जानकारी के लिए अब तक कोई एकल व्यवस्था नहीं बन पाई है। जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पूरी दुनिया लगातार बढ़ते तापमान, समुद्र जलस्तर में होती वृद्धि, सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों के दूर जाने, हिमखंडों के पिघलने के रूप में देख रही है।

विकासशील देशों को उत्सर्जन कम करने व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को क्षीण करने के प्रयासों के लिए आवश्यक धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में कहा गया था कि अमीर देश प्रत्येक वर्ष 2020 तक दस करोड़ डॉलर इस मकसद के लिए देंगे। इसे पूरे दशक भर आर्थिक सहायता के लिए उपयोग किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।मराकेश सम्मलेन में भी यही बात कही गई कि अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए और उन्हें गरीब देशों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वे ही करते आए हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन के दौरान ही विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट भी आई, जिसमें कहा गया है कि रूस और भारत में रिकार्ड गर्मी का उदाहरण दिया गया है। राजस्थान में इस साल 19 मई को 52 डिग्री तापमान दर्ज किया गया। विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट में यह दर्ज भी है। बढ़ते तापमान के कई नए रिकार्ड बने हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है। उनके मुताबिक 2 डिग्री तापमान से अधिक बढ़ना विनाशकारी हो सकता है। मराकेश में चर्चा के दौरान कहा गया कि भारत में प्रतिव्यक्ति बिजली उपभोग एक हजार किलोवाट हावर वार्षिक से बहुत कम है, जबकि अमेरिका व यूरोप में विद्युत उपयोग बारह हजार-तेरह हजार किलोवाट हावर है। सबसे खास बात जलवायु सम्मेलन में इस बार यह रही कि ‘कांन्फें्रस आॅफ पार्टीज’ (सीओपी-22) में भारत की ओर से जेबी पंत इंस्टीट्यूट आॅफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट की ओर से पर्वतीय देशों के समक्ष हिमालय की अहमियत और जलवायु परिवर्तन का ब्योरा पेश किया गया। इस तरह पर्वतीय देशों के वैश्विक एजेंडे में पहली बार हिमालय को शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय के अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में शामिल हो जाने से जलवायु परिवर्तन को समझने व खास नीति बनाने में काफी मदद पहुंचेगी। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर पहाड़ों पर पड़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए पूरी दुनिया एक मंच पर आ गई है, लेकिन वायुमंडल में पहले से मौजूद कार्बन को कैसे कम किया जाए, इस समस्या का सटीक उपाय न ही पेरिस और न ही मराकेश सम्मेलन में देखने को मिला।

 

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First Published on November 23, 2016 3:39 am

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