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बचपन पर मंडराते खतरे

इतिहास साक्षी है कि बाल कविताओं व कहानियों ने बच्चों को बौद्धिक व संवेदनात्मक रूप से संस्कारित किया है।
Author नई दिल्ली | November 14, 2016 02:28 am
बचपन।

रोहित कौशक 

इस समय भारत समेत दुनिया भर के बच्चों पर तमाम तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। अब जलवायु परिवर्तन भी उन्हें अपना शिकार बना रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 2.3 अरब बच्चों में से लगभग 69 करोड़ बच्चे जलवायु परिवर्तन के सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिसके चलते उन्हें उच्च मृत्यु दर, गरीबी और बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। लगभग तिरपन करोड़ बच्चे बाढ़ और उष्णकटिबंधीय तूफानों से सर्वाधिक प्रभावित देशों में रहते हैं। गौरतलब है कि इनमें से ज्यादातर देश एशिया में हैं। करीब सोलह करोड़ बच्चे सूखे से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में पल-बढ़ रहे हैं। इन क्षेत्रों में से ज्यादातर अफ्रीका में हैं।

बच्चे किसी भी समाज या राष्ट्र का भविष्य होते हैं। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां बचपन बचाने की चिंता खोखले आदर्शवाद के दायरे में ही सिमट कर रह गई है। आज बचपन पर छाई धुंध और गहराती जा रही है। आज एक ओर विभिन्न चैनलों द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता से बचपन असुरक्षित होता जा रहा है तो वहीं हिंसापूर्ण फिल्में बाल भावनाओं को विकृत कर रही हैं। कहीं बस्तों के बोझ से बचपन दब गया है तो कहीं शिक्षा के अभाव में बच्चे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हंै। एक ओर बच्चे अत्याचार से पीड़ि़त हैं तो दूसरी ओर पारिवारिक विघटन का असर उन पर पड़ रहा है। आज बच्चों से संबंधित ऐसे ही अनेक प्रश्नों पर गंभीरता से पुनर्विचार की आवश्यकता है।

कुछ समय पूर्व ‘सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि टीवी पर दिखाई जाने वाली हिंसा से बच्चों के दिलो-दिमाग पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक आज अनेक बच्चे भूत और किसी अन्य भटकती आत्मा के भय से घिरे रहते हंै। पांच शहरों में कराए गए इस सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष सामने आया कि हिंसा और भय वाले कार्यक्रमों के कारण बच्चों के दिलोदिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों से बच्चों पर गहरा भावनात्मक असर पड़ता है जो आगे चलकर उनके भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इस सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला गया कि पचहत्तर फीसद टीवी कार्यक्रम ऐसे हैं जिनमें किसी न किसी तरह की हिंसा जरूर दिखाई जाती है। सस्पेंस, थ्रिलर, हॉरर शो और सोप ओपेरा देखने वाले बच्चे जटिल मनोवैज्ञानिक समस्याओं के शिकार हो जाते हैं।

आज यह भी देखने में आ रहा है कि हम अक्सर बच्चों के मन को समझे बिना अपनी इच्छाएं उन पर थोप देते हैं। ऐसे में बच्चे जिस अंतर्द्वन्द्व से गुजरते हंै वह अंतत: अनेक समस्याओं को जन्म देता है। यहां यह कहा जा सकता है कि यदि बच्चों की इच्छाओं के समक्ष घुटने टेक दिए जाएंगे तो उनके और जिद््दी बनने तथा गलत रास्ते पर चलने की संभावना बढ़ जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम बच्चों की इच्छाओं को कोई महत्त्व ही न दें। अमूमन होता यह है कि हम शुरू में बच्चे को बहुत अधिक प्यार करते हंै। ऐसे में माता-पिता से बच्चे की अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं। अपनी इन्हीं अपेक्षाओं के अनुरूप जब बच्चा अपनी इच्छाएं माता-पिता से बताता है तो वे उसे डांट-फटकार कर चुप कर देते हैं। माता-पिता का यह व्यवहार ही बच्चों को विद्रोही व चिड़चिड़ा बना देता है। होना यह चाहिए कि हम प्रारंभ से ही बच्चों के साथ एक संतुलित रवैया अपनाएं। उन्हें ठीक ढंग से समझने के लिए हमें अपने अंदर एक मनोवैज्ञानिक दृष्टि भी विकसित करनी होगी। उनकी इच्छाओं व भावनाओं को महत्त्व देते हुए हमें यह समझने की कोशिश करनी होगी कि वास्तव में वे चाहते क्या हैं। यदि बच्चे अपनी गलत जिद पर अड़े हुए हैं तो हमें मात्र डांट-फटकार का रास्ता न अपना कर विवेक व प्यार का रास्ता अपनाना होगा। हमें कोशिश करनी होगी कि बच्चों को विश्वास में ले सकें।इसके लिए हमें बहुत छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हुए अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाना होगा।

माता-पिता द्वारा बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपने के अनेक रूप हो सकते हैं। अक्सर यह देखने में आया है कि माता-पिता स्वयं जिस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाते हैं वे उस लक्ष्य तक अपने बच्चों को पहुंचाने की कोशिश करते हंै। वे इस जुनून में यह भी परवाह नहीं करते कि वास्तव में बच्चे की अपनी इच्छा क्या है। वे यह भी जानने की कोशिश नहीं करते कि बच्चे में उस लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता है भी या नहीं। बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न देखना और उस स्वप्न को साकार करने का प्रयास करना गलत नहीं है, लेकिन यह सब यथार्थ के धरातल पर होना चाहिए। बच्चों की क्षमता को न देखते हुए किसी एक ही कैरियर का जुनून पालना गलत तो है ही, बच्चों के प्रति भी अन्याय है। अमूमन होता यह है कि माता-पिता बच्चे के स्तर से अधिक की आशा रखते हंै। ऐसे में आशानुरूप परिणाम न मिलने के कारण माता-पिता के डर से अनेक बच्चे आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हंै। इस तरह की अनेक घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं।

आज की महानगरीय जीवन शैली में माता और पिता दोनों ही अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते हंै। ऐसे में भी बच्चों की उचित व संपूर्ण देखभाल प्रभावित होती है। बच्चों को आया या नौकर के सहारे छोड़ दिया जाता है। व्यावसायिकता के इस दौर में किड गार्डन संस्कृति भी खूब फल-फूल रही हैं। नौकर व किड गार्डन कुछ समय तक तो बच्चों की देखभाल कर सकते हैं लेकिन समस्या तब आती है जब अत्यधिक व्यस्तता के कारण माता-पिता बच्चों को मात्र इस व्यवस्था के सहारे ही छोड़ देते हैं।  संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं और एकल परिवारों का जन्म हो रहा है। एकल परिवारों में बच्चों को दादा-दादी का साथ नहीं मिल पा रहा है। पहले संयुक्त परिवार में दादा-दादी बच्चों को अनेक पौराणिक व शिक्षाप्रद कहानियां सुनाया करते थे, जिससे प्रारंभ से ही बच्चों के सामने कुछ आदर्श रहते थे। ऐसे में बच्चों में संस्कारों का पनपना स्वाभाविक था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। व्यावसायिकता के इस दौर में बच्चों को टीवी ही अपना एकमात्र साथी दिखाई देता है। हालांकि बच्चे टीवी के माध्यम से अनेक जानकारी भी ग्रहण करते हैं। लेकिन वे परियों की कहानियां सुनने के बजाय अश्लीलता देखने में रुचि लेने लगते हैं। बच्चा कच्ची मिट्टी के समान होता है। बचपन में उसे जिस सांचे में भी ढाला जाए वह उसी सांचे में ढल जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम एक ओर बचपन बचाने की चिंता कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में बच्चों से नैतिकता के मार्ग पर चलने की आशा रखना खोखला आदर्शवाद नहीं तो और क्या है?

गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बस्तों को बोझ बढ़ता जा रहा है। पढ़ाई और बस्ते के बोझ से बचपन दबकर रह गया है। बचपन के आंगन में भी अब चिंता ने अपने पैर पसार लिए हंै। दरअसल, आज बच्चों के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश ही नहीं की जा रही है और हम सतही तौर पर बचपन बचाने की बात कह रहे हैं।  आज बच्चे अच्छे साहित्य से लगातार दूर होते जा रहे हंै, क्योंकि उन्हें साहित्य से जोड़ने की कोशिश ही नहीं की जा रही है। आज कितने माता-पिता ऐसे हैं जो अपने बच्चों को बाल साहित्य की पुस्तकें खरीद कर देते हैं? यह विडंबना ही है कि सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में माता-पिता को बाल साहित्य की पुस्तकें कूड़ा नजर आती हैं। यह सही है कि आज सूचना-प्रधान पुस्तकों की मांग व जरूरत ज्यादा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाल साहित्य की पुस्तकों को फिजूल की चीज मान लिया जाए। इतिहास साक्षी है कि बाल कविताओं व कहानियों ने बच्चों को बौद्धिक व संवेदनात्मक रूप से संस्कारित किया है। आजादी से पहले बडे़-बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए लिखा। देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम की रचनाओं ने उस पीढ़ी को सच्चे अर्थों में देशभक्त बनाया।
इसके विपरीत दिशाहीनता के इस माहौल में आज बच्चे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं कि वे किसे अपना आदर्श मानें और किस रास्ते पर चलें? आज अभिजात्य वर्ग के अभिभावक अपने बच्चों को हैरी पॉटर श्रृंखला की महंगी पुस्तकें तो खरीद कर दे देते हैं लेकिन बाल साहित्य की भारतीय लेखकों की पुस्तकें खरीदने में वे कोई दिलचस्पी नहीं लेते। भारत में हैैरी पॉटर श्रंखला की आश्चर्यजनक बिक्री ने यह सिद्ध कर दिया है कि बच्चे हिंसा और अंधविश्वास से जुड़ी पुस्तकें ही अधिक पसंद करते हैं। इस तरह की पुस्तकें बाल भावनाओं को जल्दी ही विकृत कर देती हैं।

आज बच्चों में अच्छा बाल साहित्य पढ़ने की आदत कम होती जा रही है और वे अपनी संस्कृति से विमुख हो रहे है। जब बच्चे अपनी जमीन से नहीं जुड़ पाते है तो उनमें बहुत-सी विसंगतियां जन्म ले लेती हैं। दुर्भाग्य यह है कि बचपन का खात्मा करने में हम सब भागीदार हंै। यदि बच्चों को सही दिशा नहीं मिल पाई तो कल के भारत को सही दिशा कैसे मिल पाएगी?

 

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