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चार धाम यात्रा के बहाने

चार धाम यात्रा के लिए सड़कों की मरम्मत का काम पूरा कर दिया गया है और यात्रियों की सुरक्षा के वास्ते सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद हैं।
Author May 10, 2017 05:05 am
केदारनाथ मंदिर का एक दृश्य। (Express photo by Oinam Anand. August 2015)

व्योमेश चंद्र जुगरान

उत्तराखंड की प्राणरेखा कही जाने वाली चार धाम यात्रा शुरू हो चुकी है। मई के प्रथम सप्ताह अलग-अलग तिथियों पर पूर्ण धार्मिक और परंपरागत अनुष्ठान के साथ बदरी-केदार-गंगोत्री-यमुनोत्री के कपाट श्रद्धालुओं के वास्ते खोल दिए गए। नए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इन दिनों मीडिया में चार धाम यात्रा का प्रचार करते नजर आते हैं। वे कह रहे हैं कि चार धाम यात्रा के लिए सड़कों की मरम्मत का काम पूरा कर दिया गया है और यात्रियों की सुरक्षा के वास्ते सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद हैं। मुख्यमंत्री के इस प्रचार के बीच ही पिछले सप्ताह यात्रा मार्ग के प्रमुख जिले रुद्रप्रयाग में आठ लोग सड़क हादसे का शिकार हो गए। बीते एक माह से भी कम समय में उत्तराखंड के विभिन्न मार्गों पर अस्सी से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवा चुके हैं।

यात्रा सीजन वाहन दुर्घटनाओं की दुखद याद लेकर न बीते, ऐसा सुनिश्चित करने के ठोस उपाय कभी नहीं दिखाई देते। देश में सबसे अधिक जोखिम भरी पहाड़ की परिवहन व्यवस्था को शासकीय और गैरशासकीय दोनों स्तरों पर बेहद हलके ढंग से लिया जाता रहा है और इसे पहली प्राथमिकता कभी नहीं बनाया गया। अधिकतर सड़क हादसों की जांच फाइलों के अंबार में दम तोड़ देती है। सरकार इसे ही सबसे बड़ी उपलब्धि मान कर अपनी पीठ आप ठोंकती रहती है कि यात्रियों की संख्या इस साल कितनी बढ़ी और कितना अधिक चढ़ावा चढ़ा। यात्रियों की आमद के आंकड़ों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है। लेकिन सरकार की प्रचार पत्रिकाओं में यह आंकड़ा ढूंढेÞ नहीं मिलता कि इस साल कितने तीर्थयात्रियों को जान गंवानी पड़ी। राज्य सरकार समय-समय पर चारधाम यात्रा के बहाने केंद्र से मोटी रकम ऐंठने की जुगत भिड़ाए रहती है। उसे इस यात्रा के बहाने सरकारी-गैरसरकारी अध्ययनों और सम्मेलनों-सेमिनारों पर पैसा लुटाना होता है। नई-नई योजनाएं बनानी पड़ती हैं। कभी तय होता है कि यात्रा की अवधि बढ़ाई जाएगी यानी शीतकाल में भी इसे जारी रखा जाएगा, कभी इसे पर्यटन सर्किटों से जोड़ कर मॉडर्न लुक देने की बातें की जाती हैं। कभी महोत्सवों के नाम पर तो कभी प्रचार-प्रसार के हाइटेक तरीकों के बहाने खजाने में खूब सेंध लगाई जाती है। कंसल्टेंसी के नाम पर बड़े-बड़े इजारों को मोटा पैसा देकर रिपोर्ट तैयार कराने और सिंगापुर की तर्ज पर पर्यटन विकास के लिए उच्चस्तरीय पर्यटन परिषद बनाए जाने के धन-खसोटू दृष्टांत सामने हैं।

सब कुछ होता है, बस यही काम नहीं हो पाता कि यातायात के सार्वजनिक साधनों के अभाव में हरिद्वार-ऋषिकेश में कई-कई दिन तक इंतजार करते लोग मौके का फायदा उठाने वाले मोटर एजेंटों के चंगुल से कैसे बचे रहें और जेबें गरम करती सीजनल/पर्यटन पुलिस को कैसे कसा जाए? कैसे श्रद्धालुओं के शुचिमय खान-पान व स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाए और सरकार का कौन-सा महकमा इनकी शिकायतें सुने व दिक्कतें दूर करे। पाखंडियों के फेर, कमाई के साधन में तब्दील होती धर्मशालाएं, भोजन-पानी की दुकानों के मनमाने रेट, शौचालयों की तलाश में भटकते तीर्थयात्री और मौत से सामना करातीं असुरक्षित सड़कें आदि मुश्किलों को अगली अप्रैल में पुन: होने वाली समीक्षा बैठक के लिए फाइल में टैग कर दिया जाता है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि बदरीनाथ के कपाट खुलते वक्त राष्ट्रपति और केदारनाथ के कपाट खुलते वक्त प्रधानमंत्री की मौजूदगी से पूरे विश्व में इन तीर्थों के प्रति बहुत सकारात्मक संदेश गया है। बेशक गया हो, पर उन्हें आए दिन सामने आने वाले नकारात्मक संदेशों के प्रति भी सावधान होना होगा। अभी चार रोज पहले ही पुणे से आए तीर्थयात्रियों के जत्थे को केदारनाथ के सफर का सपना अधूरा छोड़ कर गौरीकुंड से वापस लौटना पड़ा क्योंकि वहां से आगे चढ़ाई के लिए उन्हें साधन मुहैया कराने की कोई व्यवस्था नहीं थी। उनकी शिकायत सुनने को भी कोई अधिकारी मौजूद नहीं था। मुख्यमंत्री के औपचारिक वक्तव्यों से इतर देखें तो यह दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड के पहाड़ पर्यटन के नजरिए से सिर्फ संभावना और सराहना से आगे व्यावहारिक गति को कभी प्राप्त नहीं हो सके। बदरीनाथ में चले जाएं, एक उपनगर का स्वरूप ले चुके इस धाम में आपको कोई ऐसा स्थल नहीं मिलेगा जहां दूर से मंदिर की भव्यता निहारी जा सके। कंकरीट के बहुमंजिला निर्माण के बीच यह भव्यता कहीं लुप्त होकर रह गई है।

निश्चित ही उत्तराखंड की चार धाम यात्रा एक प्राचीन परंपरा है जो भारत में तीर्थ परंपरा की पवित्रता और आध्यात्मिक-धार्मिक महत्त्व को ऊंचा उठाती है। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह यात्रा देश की धरोहर भी है। ऐसे में इस चार धाम यात्रा की केंद्रीय धुरी से इतर हम पहाड़ के पर्यटन का कोई और चेहरा तलाश ही नहीं सकते, भले ही कितने भी मेगा पर्यटन सर्किटों का नक्शा बना लिया जाए। पर्यटन विकास के नाम पर स्विट्जरलैंड के सपने और सर्किटों की रट छोड़नी होगी क्योंकि इस पर पहले ही खूब पैसा बहाया जा चुका है। इसके बजाय सरकार को चाहिए कि वह राज्य के समग्र ढांचागत विकास पर जोर दे। प्रदेश भर में सड़कें बेहतर होंगी और चुनिंदा स्थानों पर ठहरने-खाने के उचित इंतजाम होंगे तो सर्किट खुद-ब-खुद विकसित होते चले जाएंगे। उत्तराखंड जाने वाले पर्यटकों में 98 फीसद तीर्थयात्री होते हैं। लिहाजा, राज्य सरकार को चार धाम सर्किट पर होमवर्क करने की सबसे अधिक जरूरत है। इधर केंद्र सरकार ने चार धामों के लिए साढ़े दस हजार करोड़ की लागत से ‘आॅल वेदर रोड’ का एलान किया है। कर्णप्रयाग तक रेल के लिए भी संजीदा कोशिश हो रही है। देखना होगा कि राज्य सरकार इस दिशा में अपनी सक्रियता को कितना बढ़ा पाती है।

सबसे अधिक जरूरत या यों कहें कि चुनौती इन संवेदनशील तीर्थस्थलों पर बढ़ते मानवीय दबाव को नियंत्रित करने की है। इसके लिए बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अपनी नियमावली बनाए और सुविधाजनक यात्रा सुनिश्चित करे। बदरीनाथ में हैरान करने वाली निजी वाहनों की आपाधापी को रोकने के माकूल इंतजाम किए जाने चाहिए। इसके लिए एक निश्चित पड़ाव से आगे पर्वतीय मार्गों पर सुरक्षित समझी जाने वाली बेहतर और आरामदायक बसों का इंतजाम हो, जिन पर जत्थों की शक्ल में यात्री यात्रा करें। इस क्रम में यह सुनिश्चित किया जाए कि उतने ही यात्री बदरीनाथ पहुंचें, जितनी कि वहां व्यवस्था हो। यह भी व्यवस्था रहे कि कोई यात्री अगर चाहे तो एक ही दिन में बदरीनाथ के दर्शन कर वापस प्रतीक्षालय लौट सके और यदि एक रात रुकना चाहे तो रहने के लिए बेहतर धर्मशालाएं हों। उत्तराखंड की पिछली सरकारें भी चारधाम यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर सेवा के आवेदनों की संख्या से ही गदगद होती आई हैं। केदारनाथ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पंद्रह हेलीपैड पहले ही मौजूद हैं। नए तीन और बनाए गए हैं। इन उड़नखटोलों का क्या करें! आकाश मार्ग से आमदरफ्त बढ़ जाने से पहाड़ के जमीनी आदमी को क्या लाभ? सरकारों को बहुत समझाया जा चुका है कि पर्यावरण के लिहाज से इन संवेदनशील पहाड़ों के लिए हेलीकॉप्टरों का शोर बहुत खतरनाक है। इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। वैसे भी हेलीकॉप्टर से आने वाला तो डिब्बाबंद भोजन व चाय से भरे थर्मस भी साथ लेकर आएगा। ऐसे में बीए पास उस पहाड़ी ‘बीरू’ का क्या होगा जिसने चार पैसा कमाने के लिए सड़क किनारे चूल्हे पर चाय की केतली चढ़ा रखी है। क्या उसके नसीब में वह कचरा साफ करना ही बंधा है जो हेलीकॉप्टर से उतरा साहब झाड़ कर चला गया है!

 

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