June 27, 2017

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उप्र में भाजपा की जबर्दस्त जीत के सबब- मोदी का करिश्मा, अमित शाह की संगठनात्मक प्रतिभा, स्थानीय पार्टी-ढांचा, आकांक्षी मतदाता

भाजपा के उत्तर प्रदेश मॉडल को पंचतत्त्व मॉडल कहा जा सकता है- पांच भुजाओं वाला एक आदर्श मॉडल, जिसमें प्रत्येक भुजा दूसरी भुजाओं के साथ पूरे तालमेल से काम करती है। इस मॉडल का पहला तत्त्व एकदम जाहिर है, नरेंद्र मोदी का करिश्मा। उत्तर प्रदेश ने कुछ मायनों में यह भी दृढ़ता से स्थापित किया है कि लोगों को मोदी की कौन-सी खूबी सबसे ज्यादा भाती है- राष्ट्रीय हित के मामलों में उनका दोटूकपन।

Author March 15, 2017 05:09 am
जीत का जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता। ( Photo Source: PTI)

अनील बलूनी

कैसा रहा यह चुनाव। उत्तर प्रदेश में भाजपा को 310 से ज्यादा सीटें मिलीं। क्या किसी ने इस परिदृश्य की कल्पना की थी? ऐसे चुनाव परिणाम अमूमन एक पीढ़ी को एक बार से ज्यादा देखने को नहीं मिलते, जैसा कि खासकर उत्तर प्रदेश में हुआ, जो कि भारतीय राजनीति की नई परिघटना है। नई परिघटना यह है कि भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐतिहासिक नेतृत्व और अमित शाह की संगठनात्मक महारत के बल पर खुद को भारत की सर्वप्रमुख पार्टी के रूप में स्थापित कर लिया है- एक ऐसी पार्टी जो भारतीयों के हर वर्ग की आकांक्षाओं का खयाल रखती है। हालांकि हर राज्य के चुनाव का समान महत्त्व है, पर उत्तर प्रदेश के नतीजे खास अहमियत रखते हैं, अगर किसी और कारण से नहीं, तो नितांत इसी कारण कि विधायिका में इसका संख्याबल राष्ट्रीय राजनीति में इस राज्य को जो स्थान देता है- जिसके पास लोकसभा की अस्सी और राज्यसभा की इकतीस सीटें हैं और जिसका मत राष्ट्रपति के चुनाव में बहुत मायने रखता है। लेकिन सवाल है कि भाजपा ने ऐसा क्या किया कि उत्तर प्रदेश पूरी तरह भगवा रंग में रंग गया? याद करें, जब राममंदिर आंदोलन परवान पर था तब भी उत्तर प्रदेश ने इतने निर्णायक ढंग से और इतनी मजबूती से भाजपा के पक्ष में वोट नहीं दिया था। क्या भाजपा के उत्तर प्रदेश मॉडल में कुछ ऐसा है, जो एक सांचे की तरह काम करता है?

भाजपा के उत्तर प्रदेश मॉडल को पंचतत्त्व मॉडल कहा जा सकता है- पांच भुजाओं वाला एक आदर्श मॉडल, जिसमें प्रत्येक भुजा दूसरी भुजाओं के साथ पूरी तालमेल से काम करती है- और एक ऐसा मॉडल पेश करती है जो अनुसरण के काबिल है।इस मॉडल का पहला तत्त्व एकदम जाहिर है- नरेंद्र मोदी का करिश्मा। इसके बिना यह कैसे संभव था कि चुनाव नतीजों से बस कुछ महीने पहले एक नेता, दूसरों के विपरीत, यह कहे कि मैं कोई लोकलुभावन निर्णय नहीं लूंगा, बल्कि मैं देश की छियासी फीसद मुद्रा को विमुद्रीकृत कर दूंगा, जिससे आपको असुविधा होगी, और फिर भी लोग उसे वोट दें, इस तरह जैसे उन्होंने पहले किसी को न दिया हो? उत्तर प्रदेश ने कुछ मायनों में यह भी दृढ़ता से स्थापित किया है कि लोगों को मोदी की कौन-सी खूबी सबसे ज्यादा भाती है- राष्ट्रीय हित के मामलों में उनका दोटूकपन। चाहे यह उनका अपनी टीम से चौबीसों घंटे काम लेना हो, एक साल से भी कम समय में तकरीबन दो करोड़ रसोई गैस कनेक्शन देना हो, देश में काले धन पर कड़ा प्रहार करना हो, या सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए यह मिसाल पेश करना हो कि आतंकी हमलों का भारत कैसा जवाब देगा- मोदी ने यह दिखाया है कि जब राष्ट्रीय हित का मामला हो तो वे निर्णायक कदम उठाते हैं।

वाराणसी में मोदी को जैसा समर्थन मिला- जहां वे चुनाव प्रचार में लगातार तीन दिन रहे- उससे इस पहलू की पुष्टि ही हुई है- कि मोदी कभी पीछे की सीट पर नहीं रहते, वे ऐसे सेनापति नहीं हैं जो खुद बैरक में सुरक्षित छिपे रहें और अपनी सेना को लड़ने के लिए छोड़ दें। इसके बजाय मोदी ऐसे सेनापति हैं जो मोर्चे पर रह कर अगुआई करते हैं।दूसरा तत्त्व है अमित शाह की संगठनात्मक महारत और प्रतिभा को पहचानने की उनकी काबिलियत। यह उन्होंने 2014 में ही साबित कर दिखाया था जब वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। 2017 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने अपनी कामयाबी के पिछले मॉडल को न सिर्फ और मजबूत किया है बल्कि यह भी दिखाया है कि वे हरेक अनुभव से सीखते हैं। 2014 से, तीन साल से भी कम समय में, बारह लाख से भी ज्यादा नए सदस्य भाजपा से जुड़े, जिससे पूरे राज्य में उसके सामाजिक आधार में इजाफा हुआ। पर भाजपा की चुनाव मशीनरी में शाह का सबसे टिकाऊ योगदान है बूथ प्रबंध के महत्त्व को स्थापित करना। 2013 में शाह को उत्तर प्रदेश भेजने से पहले, चुनावी रणनीति के तफसील से प्रबंध के तौर पर बूथ समितियों की भूमिका, एक ऐसी अवधारणा थी जिसे राज्य में पार्टी तब तक ठीक से समझ और सीख नहीं पाई थी।

2014 के चुनाव तक, अहम बूथों में से सैंतीस फीसद पर ही भाजपा के पास बूथ समितियां थीं। 2017 के चुनाव तक यह संख्या बढ़ कर 87 फीसद हो गई। इसके अलावा, पूरे राज्य को 82 जिला इकाइयों, 1,463 मंडलों और 9,933 सेक्टरों में बांटा गया था। बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुख की अवधारणा को शाह पहले ही मनवा चुके थे- इस बार उन्होंने एक नया प्रयोग जोड़ा- बूथ रक्षक। उनका काम था हर लिहाज से बूथ की रक्षा करना। सुनियोजित चुनाव प्रचार बूथ स्तर पर सुनिश्चित करने और वहां की सूचनाएं ऊपर के नेतृत्व को भेजने से लेकर बूथ रक्षकों ने बूथ को संभालने का काम जी-जान से किया।भाजपा की मशीनरी का तीसरा तत्त्व है स्थानीय सांगठनिक ढांचा। 403 विधानसभा क्षेत्रों में से एक भी क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां पार्टी के कम से कम दो मुख्य स्टार प्रचारक न गए हों। दूसरे, यह भी सुनिश्चित किया गया कि राज्य का समस्त पार्टी नेतृत्व एक होकर काम करे। पहला तकाजा, होशियारी से बनाई गई परिवर्तन यात्राओं के जरिए पूरा किया गया। ये यात्राएं राज्य के कोने-कोने में गर्इं, इनसे कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने तथा दूरदराज तक लोगों से संपर्क साधने में मदद मिली। और भाजपा ने दूसरा तकाजा कैसे पूरा किया- मजे की बात है कि मुख्यमंत्री पद के अपने प्रत्याशी की घोषणा न करके। वास्तव में उत्तर प्रदेश ने इस धारणा को पलीता लगा दिया है कि मुख्यमंत्री पद की खातिर चेहरे की पहले से घोषणा किए बगैर किसी बड़े राज्य का चुनाव नहीं जीता जा सकता। इसकी जगह भाजपा ने यह स्थापित किया है कि ऐसे राज्य में जहां सर्वोच्च पद के लिए कई दावेदार हों, और सभी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से इस स्थिति तक पहुंचे हों, न कि वंशानुगत उत्तराधिकार से, वहां पहले से कोई चेहरा पेश न करना मददगार ही साबित होता है। ऐसा पहले महाराष्ट्र और हरियाणा में हुआ, और अब शानदार ढंग से उत्तर प्रदेश में।

इस सारे जमीनी काम में पूरक बना- चौथा तत्त्व- एक व्यापक विजन। भाजपा का घोषणापत्र न केवल व्यापक और आगे की तरफ देखना वाला था, बल्कि भाजपा के नए नेतृत्व के तहत ये सारी नई चीजें आकर्षक भाषा में तैयार और पेश की गर्इं। यह कोई नीरस, उबाऊ दस्तावेज नहीं था, जो कोई कागजी काम पूरा करने भर के लिए जारी कर दिया गया हो। इसके बजाय, लखनऊ और दिल्ली में पार्टी के आला दिमागों ने इसके पहले मसविदे की बारीकी से पड़ताल की और तब इसे अंतिम रूप दिया और पेश किया गया। यही नहीं, भाजपा की नई कार्यविधि के अनुरूप, उत्तर प्रदेश की जनता से भी सुझाव मांगे गए, और तीस लाख से ज्यादा सुझाव आए।भाजपा मॉडल का पांचवां और अंतिम तत्त्व शायद सबसे प्रभावी और काफी टिकाऊ है- इसने भाजपा के मतदाताओं का एक ‘वर्ग’ तैयार किया है, जबकि अन्य दल जाति या मजहब के आधार पर मिलने वाले वोटों के लिए एक दूसरे से होड़ करते हैं। भाजपा की अपील सीधी है- अगर आप अपने या अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं, तो जाति, इलाका या धर्म का खयाल न कर हमें वोट दें। उत्तर प्रदेश के पार्टी नेतृत्व ने भी इस वर्ग का मॉडल स्थापित किया है- राजनाथ सिंह से लेकर कलराज मिश्र, केशव प्रसाद मौर्य और योगी आदित्यनाथ तक। वे राज्य की आबादी के विस्तृत फलक का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर 2014 ने मोदी युग की शुरुआत की, तो ताजा चुनाव नतीजों के बाद निस्संदेह कहा जा सकता है कि यह युग न केवल आरंभ हुआ है बल्कि इसका एक लंबा और सुनहरा भविष्य है, न सिर्फ भाजपा के लिए बल्कि देश के लिए भी।
लेखक भाजपा से संबद्ध हैं।

 

 

 

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First Published on March 15, 2017 5:09 am

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