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किधर जा रहा है बांग्लादेश

धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में वजूद में आया बांग्लादेश सन 1988 से एक इस्लामी राष्ट्र बना हुआ है।
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना (एपी फाइल फोटो)

इसे समय की विडंबना ही कहेंगे कि जिस बांग्लादेश को आज से साढ़े चार दशक पहले भारत ने पाकिस्तान से स्वतंत्र करा कर उस पर खुद अधिकार जमाने के बजाय उसे अपना अस्तित्व कायम करने का अवसर दिया था, उसी बांग्लादेश में आज हिंदुओं के धार्मिक स्थलों और उपासना प्रतीकों को क्षति पहुंचाना धीरे-धीरे आम होता जा रहा है। पिछले दिनों बांग्लादेश के नेत्रिकोना इलाके में कुछ अज्ञात लोगों ने एक मंदिर पर हमला करके न केवल मंदिर बल्कि देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी तोड़-फोड़ दिया। ‘ढाका ट्रिब्यून’ की खबर के मुताबिक गांव के लोग सुबह जब मंदिर गए तो उन्होंने मंदिर का दरवाजा खुला पाया। मंदिर का ढांचा टूटा हुआ पड़ा था जबकि तीन टूटी मूर्तियां मंदिर से छह सौ मीटर दूर पड़ी थीं। लोगों ने दो मूर्तियां देखीं जिनमें से एक देवी काली की और दूसरी प्रतिमा भगवान शंकर की थी। घटना के तत्काल बाद पुलिस को सूचित किया गया, जिसके बाद जांच शुरू हो गई है। इसके अलावा बांग्लादेश के पबना जिले में भी देवी काली की तीन मूर्तियों के नष्ट किए जाने और मंदिरों में तोड़-फोड़ की बात सामने आई है।

बांग्लादेश में मंदिरों पर यह कोई पहला हमला नहीं है, इससे पहले भी हाल के दिनों में ऐसे कई हमले हुए हैं। अभी पिछले महीने ही बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया जिले के नासिरनगर में कुछ उपद्रवियों ने न केवल मंदिरों पर बल्कि हिंदू समुदाय के लोगों पर भी हमला किया था। एक स्थानीय पत्रकार की मानें तो इस दौरान लगभग दस मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया। इस उपद्रव का कारण सिर्फ इतना सामने आया कि बांग्लादेश के एक हिंदू युवक ने फेसबुक पर कुछ इस्लाम-विरोधी लिख दिया था। इससे बांग्लादेश के बहुसंख्यक समुदाय का पारा इतना चढ़ गया कि मंदिरों और हिंदुओं को क्षति पहुंचा कर ही शांत हुआ। यह सही है कि किसी भी धर्म या मजहब के विरोध में कोई भी आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं होनी चाहिए, लेकिन अगर कोई ऐसा कर भी देता है तो उस पर मौजूदा कानून के हिसाब से कार्रवाई करने के बजाय इस तरह धार्मिक स्थलों को नष्ट करना और उस समुदाय के लोगों पर हमले करना, एक लोकतांत्रिक देश में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सन 1971 में जब पाकिस्तान से टूट कर एक अलग देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ, तो उसने स्वयं को पाकिस्तान से अलग राह पर चलते हुए एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था। संवैधानिक रूप से वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में बना रहा है। लेकिन वहां जनसंख्या में मुसलिम समुदाय का आधिक्य था, जिसे शायद धर्मनिरपेक्षता का यह बाना कभी पसंद नहीं आया। परिणामत: 1988 में बांग्लादेश के सैन्य शासक एचएम इरशाद जब सत्तारूढ़ हुए तो उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को धता बताते हुए संविधान संशोधन के जरिए इस्लाम को बांग्लादेश का राजकीय धर्म घोषित कर दिया। इसके विरोध में तब लगभग पंद्रह लोगों ने अदालत की शरण ली थी और इसे खत्म करने के लिए याचिका दाखिल की गई, मगर अंतत: वह याचिका लंबित हो गई और करते-धरते इस साल मार्च में उस याचिका को अदालत ने खारिज भी कर दिया।

इस तरह धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में वजूद में आया बांग्लादेश सन 1988 से एक इस्लामी राष्ट्र बना हुआ है। हालांकि वहां की सरकारें अब भी धर्मनिरपेक्षता की बात करती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि धर्मनिरपेक्षता अब न तो बांग्लादेश के संविधान में बची है और न ही वहां के बहुसंख्यक समुदाय के व्यवहार में ही उसके दर्शन होते हैं। अब वहां धीरे-धीरे सब कुछ उस इस्लामिक कट्टरपंथ जैसा रूप लेता जा रहा है, जिसमें इस्लाम के अतिरिक्त और किसी भी धर्म व विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं रह जाती। ढाका विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अजय राय कहते हैं कि और तो और, लड़कियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं भी होती रहती हैं। सिंदूर और बिंदी लगाने पर फिकरे कसे जाते हैं। भारत की घटनाओं का असर भी बांग्लादेश के हिंदू झेलते हैं। अल्पसंख्यकों की जमीन पर कब्जा कर लेने की समस्या लगातार बनी रहती है, क्योंकि वे कमजोर हैं और सरकार व प्रशासन का भी साथ उन्हें नहीं मिल पाता है।

पर समस्या यहीं तक सीमित नहीं है। यह कट्टरपंथ अब इतना विकराल रूप ले चुका है कि धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले कई लेखकों, ब्लॉगरों की हत्याएं इस विषय में और अधिक चिंता उत्पन्न करती हैं। अप्रैल 2016 में बांग्लादेश में एक के बाद एक तीन हत्याएं हुर्इं। चार हफ्तों के भीतर एक सेक्यूलर ब्लॉगर, समलैंगिकों की पत्रिका के संपादकऔर राजशाही यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर की हत्या हुई। और ऐसे लेखकों, ब्लागरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय बांग्लादेश की पुलिस उन्हें ‘सीमा में रहने’ की नसीहत दे रही है। बीते अगस्त में बांग्लादेश पुलिस के एक महानिदेशक ने कहा था कि धर्मनिरपेक्ष ब्लागर, लेखक, चिंतक लिखते समय अपनी सीमा में रहें और धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसा कुछ न लिखें। अब जिस देश में पुलिस ही इस सोच से चल रही हो, वहां धर्मनिरपेक्षता, उदारता और सामाजिक समरसता जैसे मूल्यों की बात करना बेमानी ही प्रतीत होता है।

दरअसल, बांग्लादेश ने पाकिस्तान के जिस तरह के जुल्मो-सितम से त्रस्त होकर अपनी मुक्ति की मांग शुरू की थी, वह यही था कि पश्चिमी पाकिस्तान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश की अस्मिता पर खुद का जबरन नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा था। परिणामत: बगावत हुई और फिर भारत के सहयोग से बांग्लादेश अस्तित्व में आया। लेकिन आज बांग्लादेश में भी तो धीरे-धीरे वही स्थिति पैदा होती जा रही है, बस लोग अलग हैं। आज बांग्लादेश का बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का कुप्रयास करता नजर आ रहा है, जिसको रोकने के लिए बांग्लादेशी हुकूमत द्वारा कुछ भी ठोस किया जाता नहीं दिख रहा। बांग्लादेशी हुकूमत को याद रखना चाहिए कि भारत ने बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन में उसका साथ दिया था, अगर बांग्लादेश में इसी तरह अल्पसंख्यकों का दमन होता रहा तो भारत एकदम चुप नहीं बैठेगा। सच पूछिए तो भारत को अब इंतजार करने की जरूरत नहीं है, उसे अब खामोशी तोड़नी चाहिए, कड़ाई के साथ बांग्लादेश पर इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि वह अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

पाकिस्तानी विचारधारा से अलग होने के कारण बांग्लादेश अस्तित्व में आया था, लेकिन वहां अल्पसंख्यकों की यह स्थिति धीरे-धीरे उसे भी दूसरा पाकिस्तान बनाने की तरफ बढ़ रही है। बांग्लादेश समझे कि कट्टरपंथ कभी भी किसी देश के हित में नहीं हो सकता, जो इसे अपनाता है देर-सबेर यह उसी के गले की फांस बन जाता है। पाकिस्तान का उदाहरण इस मामले में बांग्लादेश के सामने है। अत: उचित होगा कि बांग्लादेश की सरकार सबसे पहले बांग्लादेश को संवैधानिक रूप से उसके शुरुआती धर्मनिरपेक्ष रूप में लाए। फिर जमीनी स्तर पर भी कानून-व्यवस्था को इस तरह से चाक-चौबंद किया जाए कि बहुसंख्यक समुदाय का कोई संगठन या गुट अल्पसंख्यकों को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचा सके।
बांग्लादेश को अपने यहां पनप रहे मजहबी कट्टरपंथ को समय रहते जड़ से उखाड़ देना होगा, अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर वह दूसरा पाकिस्तान बन जाय। पाकिस्तान को कट््टरपंथ को प्रश्रय देने की क्या कीमत चुकानी पड़ रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। घरेलू मोर्चे पर तमाम तरह की समस्याओं से जूझने के अलावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच उसकी साख घटती गई है। क्या बांग्लादेश इससे सबक लेगा!

 

 

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