April 28, 2017

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प्यारे डिजिटल भारत वासियो

पांच साल पहले हम पश्चिमी देशों की ओर देखते और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में भारत के बेहद खराब बुनियादी ढांचे के बारे में शिकायत करते थे।

Author April 13, 2017 05:25 am
डिजिटल इंडिया।

पांच साल पहले हम पश्चिमी देशों की ओर देखते और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में भारत के बेहद खराब बुनियादी ढांचे के बारे में शिकायत करते थे। दो साल पहले हम फिक्की के ‘डिजिटल भारत’ विषय पर सेमिनार में इसी जगह पर मौजूद थे और हमने सरकार के डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्मार्ट सिटी कार्यक्रमों के सूक्ष्म-स्तरीय अवसरों को हैरानी भरी नजरों से देखा था। तमाम वाहवाही के बीच जब हम सचमुच दिल से ताली बजा रहे थे, तब हम किसी कोने से शक की आवाज भी सुन सकते थे, क्योंकि दुनिया भर में कोई भी सरकार जब किसी नए कार्यक्रम की घोषणा करती है तो आमतौर पर उसे शक की नजर से देखा जाता है।  हालांकि आज हम सब पीछे मुड़ कर देख सकते हैं और हमने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, उनकी तारीफ कर सकते हैं। हर राज्य खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की होड़ में है। आप चाहे गतिमान झारखंड में हों, उदीयमान आंध्र प्रदेश में या फिर आगे बढ़ते पंजाब में- सभी राज्य तकनीक पर आधारित उद्यमियों के स्वागत में लाल कालीन बिछा रहे हैं।

निश्चित रूप से सामान्य लोगों ने भी ढेर सारे फायदे देखे हैं। आज रेल टिकट से लेकर रसोई गैस सिलेंडर की बुकिंग तक सब कुछ आॅनलाइन है। आयकर विभाग आपको इ-मेल के जरिए अंतिम तारीख की याद दिलाता है और आपके शहर में यातायात पुलिस अपने फेसबुक पेज पर व्यस्त सड़कों से बचने की सलाह देती है। हम न सिर्फ इंटरनेट के इस्तेमाल में, बल्कि इसमें नई खोजों के मामले में भी सबसे आगे हैं। भारत के पास दुनिया में सबसे जीवंत और परिष्कृत भुगतान का ढांचा है। हमारे पास एक संपूर्ण तकनीकी व्यवस्था है, जो विकास के लिए इंटरनेट की ताकत का फायदा उठाती है। तो यह कहने में कोई दिक्कत नहीं कि डिजिटल इंडिया एक हकीकत है। लेकिन इस तरह का आयोजन एक अच्छा मौका है कि हम कुछ पल के लिए ठहरें और न सिर्फ यह सोचें कि डिजिटल इंडिया क्या है, बल्कि यह भी कि डिजिटल भारतीय कौन है। हकीकत यह है कि पैंतीस साल से नीचे के अस्सी करोड़ भारतीयों को पता भी नहीं है कि दुनिया आज बेहद ध्रुवीकृत हो चुकी है। ग्लोब को घुमाइए और अपनी पसंद के किसी भी देश पर अपनी अंगुली रखिए। विएतनाम, फिलिपींस, तुर्की, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, यहां तक कि भारत भी! थोड़े समय पहले तक सार्वजनिक बहसें या बातचीत इतनी विवादास्पद नहीं रही हैं। राजनीतिक तर्क-वितर्क अक्सर अपमानजनक झगड़ों में तब्दील हो जाते हैं और अपने से असहमत राय पर गौर भी नहीं किया जाता।

इसकी पहली वजह तो यही है कि हम अभी नहीं जानते कि इंटरनेट की तेज रफ्तार और व्यापक पैमाने पर फैली सूचनाओं का संचालन कैसे करें। संपादक के रूप में हमारे पास इसके संचालन की क्षमता नहीं है, जैसा कि हम पहले कभी सक्षम थे।मसलन, आज अगर आप जलवायु परिवर्तन पर डोनाल्ड ट्रंप के विचार का समर्थन करने वाला कोई लेख पढ़ते हैं, तो एक संपादक की स्वाभाविक सलाह होगी कि आप अगला लेख ऐसा पढ़ें जो उसकी आलोचना में हो, ताकि आप किसी विश्लेषण के दोनों पहलुओं को समझ सकें। हालांकि ‘कलन विधि’ के मुताबिक इस बात की ज्यादा संभावना है कि आप उसी अवधारणा का समर्थन करने वाला दूसरा लेख पढ़ें। इस रास्ते आपके भीतर वही विचार भरे जाते हैं, जो आपके नजरिए से सहमत दिखें। इस तरह, बीच में कोई नहीं मिलता, हम दोनों पक्षों की ओर से खींचे जाते हैं।  पहले के मुकाबले आज यह आप यानी पाठकों पर निर्भर है कि आप लगातार अपने पढ़ने के लिए क्या चुनते हैं। एक्सप्रेस समूह भारत की दूसरी सबसे बड़ी डिजिटल न्यूज मीडिया कंपनी है। हमारे ज्यादातर पाठक हमारी खबरें दूसरे मध्यस्थ मंचों के जरिए हासिल करते रहे हैं। ऐसे में हम ज्यादा समय तक आपको यह नहीं बता सकते कि आपको क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं। हम केवल सच लिख सकते हैं। लेकिन हम आपको यह नहीं कह सकते कि किस सच पर आप जरूर गौर करें। आप खुद अपनी पसंद तय करें। हमारा अखबार एक संपूर्ण खुराक है, क्योंकि एक ओर इसके लिए वेंकैया नायडू और तवलीन सिंह, तो दूसरी ओर पी चिदंबरम और क्रिस्टोफर जैफरलॉट भी लिखते हैं।

दो साल पहले हम यहां थे और हमने इस तथ्य पर खुशी जाहिर की थी कि अब कोई भी व्यक्ति आॅनलाइन अपनी खबरें प्रकाशित करके उसके पाठक खोज सकता है। हम इस नतीजे पर पहुंचे थे कि इंटरनेट सचमुच सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक माध्यम है।मैं उसमें थोड़ा सुधार करके कह रहा हूं कि इंटरनेट में दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक माध्यम होने की संभावना है, अगर लोग समझदारी से इसका उपयोग करें, अपनी सीमाओं को फैलाने, अपने विचारों को विस्तार देने और वैसे बनने के लिए जो लोग दुनिया को जरा अलग तरीके से देखते हैं।
हकीकत यह है कि इस डिजिटल दुनिया के ज्यादातर हिस्से का सफर इन चार ‘घोड़ों’ के बूते तय किया गया है- गूगल, अमेजन, फेसबुक और एप्पल। इस लिहाज से शक्तियों का अभूतपूर्व केंद्रीयकरण है।यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि इसका इस्तेमाल वाजिब तरीके से हो। और इंटरनेट का उपयोग करने वाले के रूप में यह हम पर निर्भर है कि हम इस माध्यम की ताकत को बढ़ाएं।  खुद से पूछिए: आखिरी बार कब आप किसी ऐसे सोशल मीडिया पर दिखे, जो फेसबुक के नियंत्रण में या उसके मालिकाने में नहीं था? कब आपने कोई वीडियो देखा जो यू-ट्यूब पर नहीं था? आपने कब किसी ऐसे लिंक पर क्लिक किया, जो गूगल के नतीजों के पहले पन्ने पर नहीं था?

हम हर हाल में अपनी सीमाओं को विस्तार दें और इसके लिए इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा है। आज की तरह पहले कभी भी दुनिया में इतनी ज्यादा पत्रकारिता होती नहीं दिखी। लोगों के पास आज पहले के मुकाबले ज्यादा जानकारी है। एक किशोर से बातचीत कीजिए और आप पाएंगे कि वह कितना तेज या हाजिरजवाब है। इस उम्र में आप इतने तेज नहीं थे।
इंटरनेट पर स्थानीय भारतीय भाषाओं की मौजूदगी के अध्ययन के लिए मैं फिक्की की पहल का स्वागत करता हूं। भारत की सबसे बड़ी मराठी वेबसाइट के प्रकाशक होने के नाते हम देखते हैं कि कैसे भारत की बड़ी ताकत इन भाषाओं में बसती है। हम भारत के ग्रामीण इलाकों में ब्रॉडबैंड की पहुंच की बात करते हैं, लेकिन हमारा मकसद अधूरा रह जाता है, जब उस भाषा में पर्याप्त सामग्री नहीं होती, जिसमें पाठक खुद को सहज पाते हैं। हमने हाल ही में आइइमलयालम डॉट कॉम की शुरुआत की है और इसी महीने के आखिर में हम एक अन्य भाषा में वेबसाइट शुरू करने जा रहे हैं। बराक ओबामा ने अपने विदाई भाषण में कहा था कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हममें से हरेक व्यक्ति मजबूत हो। इंटरनेट भी तभी लोकतांत्रिक होगा, जब हम ऐसा चाहेंगे।

पुनश्च: यह तथ्य है कि क्रिकेट की शुरुआत अंग्रेजों ने की थी, लेकिन उसमें तब्दीली या सुधार करने से भारत को उन्होंने कभी नहीं रोका। तो हम इंटरनेट में सुधार के लिए ज्यादा सक्रिय क्यों नहीं हो सकते? मुझे यह सुन कर खुशी हुई कि माननीय मंत्री ने इंटरनेट नीति-निर्धारक आइसीएएनएन बोर्ड में भारतीय प्रतिनिधित्व पर जोर दिया है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इंटरनेट के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से भी एक है। अगर यह सचमुच एक लोकतांत्रिक माध्यम बनना चाहता है, तो चूंकि हम अभी इसके विकास के शुरुआती दौर में हैं, इसलिए हमें इसके प्रशासन में भी नुमाइंदगी करनी होगी।

(लेखक द इंडियन एक्सप्रेस समूह के कार्यकारी निदेशक हैं। यह लेख नई दिल्ली में 5 अप्रैल को फिक्की और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इंडिया इंटरनेट कॉन्फ्रेंस में उनके संबोधन का हिस्सा है।)

 

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First Published on April 13, 2017 5:25 am

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