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संस्कृतियां और विध्वंसक प्रवृत्तियां

आतंकवादी संगठन आइएस की कू्ररता और दूसरे मजहबों, संस्कृतियों, सभ्यताओं को नष्ट करने की उसकी सोच को बार-बार स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। सीरिया के ऐतिहासिक पलमयरा शहर के साथ जिस तरह की विनाशलीला वह कर रहा है, उसे सहन करना मुश्किल है। पहले खबर आई थी कि उसने पलमयरा स्थित एक विशाल प्राचीन […]
Author नई दिल्ली | September 3, 2015 08:06 am

आतंकवादी संगठन आइएस की कू्ररता और दूसरे मजहबों, संस्कृतियों, सभ्यताओं को नष्ट करने की उसकी सोच को बार-बार स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। सीरिया के ऐतिहासिक पलमयरा शहर के साथ जिस तरह की विनाशलीला वह कर रहा है, उसे सहन करना मुश्किल है।

पहले खबर आई थी कि उसने पलमयरा स्थित एक विशाल प्राचीन मंदिर को विस्फोट से उड़ा दिया है। जब विस्फोट होगा तो वहां के लोग मरेंगे, घायल होंगे, जो बच जाएंगे वे भयभीत होंगे, चीखेंगे-चिल्लाएंगे, जान बचा कर भागने की कोशिश करेंगे। यह हर विस्फोट में होता है और वहां भी हुआ। इन सबसे कठोर व्यक्ति का भी दिल दहल जाएगा।

धीरे-धीरे खबर आ रही है कि केवल मंदिर उसके निशाने पर नहीं था, वहां की पूरी प्राचीन विरासत उसकी विध्वंस योजना के निशाने पर थी। आइएस आतंकवादियों ने जिस मंदिर को नष्ट किया उसे बाल शमीन यानी स्वर्ग का देवता का कहा जाता है।

यह केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, प्राचीन धरोहर भी था। उसे देखने दुनिया भर से लोग आते थे। पूरी दुनिया के पुरातत्त्ववेत्ताओं, प्राचीन इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए वह आकर्षण का केंद्र था और जितने अवशेष उसके बचे हैं, वे रहेंगे। इसलिए दुनिया भर के इस तरह के लोग इस घटना पर एक साथ दुख व्यक्त कर रहे हैं।

पिछले काफी समय से पलमयरा शहर पर आइएस के कब्जे और वहां विनाशलीला मचाने की छिटपुट खबरें आती रही हैं। जाहिर है, यह आशंका तो थी ही कि आतंकवादियों ने उस सांस्कृतिक महत्त्व के शहर को ऐसा बना दिया होगा, जिससे उसकी पहचान पूरी तरह नष्ट हो जाए। उस शहर के उन लोगों को भी निशाना बनाया होगा, जो इस सांस्कृतिक शहर के संरक्षक, सर्जक रहे होंगे। जितनी सूचनाएं आ रही हैं उनसे इसकी पुष्टि हो रही है।

ब्रिटेन स्थित ‘सीरियन आॅब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स’ ने इस शहर के नष्ट होने की काफी जानकारी दी है। पलमयरा छोड़ कर भागे लोगों से कुछ पत्रकारों और मानवाधिकार संस्थाओं ने जो सूचनाएं एकत्र कीं उनसे पता चला है कि शहर पर कब्जे के बाद आइएस आतंकवादियों ने जितना हो सका विनाश किया।

आखिर ऐसे स्थलों का ध्वंस कर आतंकवादी क्या पाना चाहते हैं? इनसे उनका कौन-सा मकसद पूरा होगा? किसी शहर पर कब्जा ही उनके लिए पर्याप्त क्यों नहीं हो सकता? वास्तव में पलमयरा उनकी दुष्ट सोच का साकार प्रतीक बन कर सामने आया है। अगर हम पलमयरा को थोड़ा ठीक से जान लें तो इन प्रश्नों का उत्तर ज्यादा स्पष्ट हो जाएगा। पलमयरा शहर अपने-आप में प्राचीन विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्रों में से एक माना जाता है। सीरिया प्राचीन सभ्यता का एक प्रमुख केंद्र है। वहां मजहब बदले, उससे काफी अंतर आए, पर बहुत सारे अवशेष अक्षुण्ण रहे। यह सीरिया शासन प्रणाली की उदारता का प्रमाण था।

यह प्राचीन सीरियाई सभ्यता का ऐसा शहर है जिसका कम से कम ढाई हजार साल का इतिहास उपलब्ध है। दुनिया भर से संस्कृतिकर्मी, प्राचीन इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले, शोध करने वाले पर्यटक वहां जाते रहे हैं। कुल मिलाकर वह शहर ही अपने-आप में धरोहर है। पलमयरा में आपको प्राचीन रोमन थियेटर से लेकर संवाद स्थल आदि बहुत सारे स्मारक मिलते हैं, जिनसे संस्कृतियों-सभ्यताओं के समागम और सृजन की प्रेरणा मिलती है। यह एक साथ रोमन सभ्यता, बेबीलोन सभ्यता का सम्मिलन स्थल है।

प्राचीन रोमन सभ्यता के अवशेष होने के कारण इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। ऐसे स्थल आतंकवादियों की पूरी सोच को बिना किसी हथियार और मुकाबले के चुनौती देते हैं। जिस मंदिर को उड़ाया गया वह एक प्रसिद्ध रोमन थियेटर से कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर को भी बहुत बड़े विस्फोट से एक महीना पहले ही उड़ा दिया गया। वह विस्फोट इतना तगड़ा था कि उसके पास का दूसरा बेला मंदिर भी क्षतिग्रस्त हो गया। हालांकि उसकी जिंदगी भी कितने दिनों तक की होगी, नहीं कह सकते। या वह बचा ही होगा इसकी भी गारंटी नहीं।

आइएस का पिछली मई में पलमयरा पर लगभग कब्जा हो गया था। फिर उनको रोकने वाला कौन है। धीरे-धीरे आतंकवादियों ने शहर की पुरानी इमारतों और स्मारकों को नष्ट करना आरंभ कर दिया। आइएस का कहना है कि ये सारे स्मारक बुतपरस्ती को बढ़ावा देते हैं, जो इस्लाम के खिलाफ है। यह उनकी सोच का एक अंश है। वे जो सभ्यता स्थापित करना चाहते हैं उसका खाका इसी सोच से निकलता है।

यह सोच ऐसे किसी स्थल को नहीं झेल सकती, जो सभ्यता संस्कृतियों के समागम का प्रतीक हो या वे जहां से सभ्यता का उदय मानते हों वहां से पीछे के काल का द्योतक हो। वह ऐसे हर स्थल को नष्ट करेगा, जो उनकी एकल सभ्यता की स्थापना के मार्ग में बाधा हो। वे जिस ढंग से विरोधी मान कर लोगों की जान से खेलते हैं वैसे ही इन निर्जीव किंतु साकार संदेश देने वाले स्थलों की इहलीला भी समाप्त करते हैं।

कोई भी सांस्कृतिक केंद्र केवल उस देश की नहीं, पूरे विश्व की साझा धरोहर होता है। पलमयरा शहर प्राचीन विश्व की ऐसी ही ऐतिहासिक विरासत है। ऐसे स्थानों का आतंकवादी समूहों की सोच में एक ही हश्र है- उसे नष्ट कर देना। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये जिस मजहबी सभ्यता की स्थापना और उसके विश्व वर्चस्व के नासमझ उद्देश्य से खून और विध्वंस मचा रहे हैं, उसमें मिली-जुली संस्कृति या ऐसी सभ्यता के अवशेष या फिर धार्मिक स्थान बाधा हैं।

यह बात भी बार-बार कही जा चुकी है कि आतंकवादी संगठन दुनिया में जान-बूझ कर धार्मिक संघर्ष की स्थिति पैदा करना चाहता है। इसलिए वे उन स्थानों को नष्ट करेंगे, जिनसे दूसरे धार्मिक या सांप्रदायिक समूहों के अंदर उत्तेजना पैदा हो और वे भी ऐसे ही जवाबी हमले करने की कोशिश क२रें। यह विश्व समुदाय का विवेक है कि इसमें आज तक उन्हें सफलता नहीं मिली। लेकिन उनकी कोशिशें तो जारी हैं।

हम अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा नष्ट की गई धरोहरों को नहीं भूल सकते। बामियान में बुद्ध की प्रतिमा और उसके आसपास के निर्माणों का विनाश तो केवल एक उदाहरण था। आप कंधार से लेकर अफगानिस्तान के दूसरे शहरों की ऐसी इमारतों, प्रतिमाओं, धार्मिक स्थलों की सूची बनाएं, तो कलेजा मुंह को आ जाएगा। पाकिस्तान में प्राचीन धरोहरों, मंदिरों को इसी तरह नष्ट किया जा रहा है। भारत और चीन के बाद पश्चिम एशिया विश्व की प्रचाीन सभ्यताआें का केंद्र रहा है।

मेसोपोटामिया से बेबीलोनिया तक प्राचीन सभ्यता का गौरवकालीन इतिहास उसी पश्चिम एशिया में तो था। इराक, सीरिया आदि देश उसके ही भाग थे। इराक के ऐसे स्थलों, संग्रहालयों को पहले से नष्ट किया जा रहा है। सीरिया में भी आइएस की यही कोशिशें जारी हैं।

ये उन स्थानों के साथ, उनसे जुड़े लोगों के साथ कितनी कू्ररता से पेश आते हैं इसका एक उदाहरण देखिए। पलमयरा के पुरातत्त्वविद बयासी वर्षीय खालिद असाद थे। वे पचास से भी ज्यादा वर्षों तक पलमयरा में पुरातत्त्व विभाग के प्रमुख रहे। उनका आतंकवादियों ने एक महीना पहले अपहरण किया।

उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दीं। उनसे पूछा कि तुम मजहब-विरोधी काम क्यों कर रहे थे? उन्होंने क्या उत्तर दिया, इसका किसी को पता नहीं, पर उनकी निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी। ऐसा ही व्यवहार कई अन्य लोगों के साथ भी हुआ है। पूरी खबर तो आने वाले वर्षों में ही सामने आएगी। कहा जा रहा है कि आरंभ में आतंकवादियों ने रोमन युग के स्मारकों को नष्ट करना शुरू किया था। उसे पूरा करने के बाद फिर रोमन युग के परे के भी धार्मिक-सांस्कृतिक स्मारकों को नष्ट करना आरंभ कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे शहर को नष्ट करके ही मानेंगे।

प्रश्न है कि आखिर विश्व कब तक अपने ऐसे प्राचीन अवशेषों को नष्ट होते देखता रहेगा? अफगानिस्तान से लेकर, इराक, सीरिया, लीबिया, मिस्र, ट्यूनीशिया, तुर्की…सब प्राचीन सभ्यताओं के देश रहे हैं। लोगों के मजहब बदले, लेकिन वे अवशेष काफी हद तक सुरक्षित रहे। वे सभ्यताओं के समागम, संस्कृतियों के समन्वय के प्रतीक रहे हैं। अगर उन सबको नष्ट कर दिया जाएगा तो फिर मानव सभ्यता के बारे में हमारी आने वाली पीढ़ी को साकार उदाहरण के रूप में क्या बताया जाएगा? आइएस तालिबान से भी आगे निकल गया है।

क्या दुनिया अपनी सभ्यताओं के समागम के अवशेषों, स्मारकों को बचाने के लिए एक होकर इनका मुकाबला करने आगे नहीं आ सकती? अमेरिका, इराक, सीरिया का संयुक्त अभियान इन्हें ऐसा करने से रोक नहीं पाया है। पलमयरा शहर नष्ट हो रहा है, उसकी केवल कुछ खबरें आ रहीं हैं, पर ऐसा लगता ही नहीं कि विश्व समुदाय को इससे कोई सरोकार हो। कुछ संस्कृतिकर्मियों या इतिहासवेत्ताओं को छोड़ दें तो सब निरपेक्ष भाव से खबरें सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं।

साफ है कि विश्व समुदाय अपने दायित्वों को या तो समझने के लिए तैयार नहीं है, या फिर समझ कर भी आंखें मूंद रहा है, यह सोचते हुए कि कौन जोखिम उठाने जाए। कौन इन उन्मादियों से लोहा लेकर अपनी शामत बुलाए। इसी कारण कुछ हजार लड़ाके मनमानी क्रूरता करने में सफल हो रहे हैं। तो क्या हम यों ही संस्कृतियों के महान अवशेषों को नष्ट होते देखते और उस पर आंसू बहाते रहेंगे?

अवधेश कुमार

 

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  1. A
    Arjun
    Sep 3, 2015 at 3:52 pm
    जिस बुत परस्‍ती के नाम पर प्राचीन सभ्‍यता के धरोहरों को आईएसआई नष्‍ट कर रहा है, उनकी सोच मे मस्जिद भी बुत परस्‍ती का प्रतीक होना चाहिए। वे जिन हथियारों के द्वारा लड रहे हैं क्‍या वे हथियार बुतपरस्‍तों के द्वारा नहीं बनाया गया है ?
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग