ताज़ा खबर
 

संवैधानिक मूल्यों में विश्वास की जरूरत

यह न तो स्वर्ण जयंती है, न हीरक जयंती, पर तारीख के साथ परिस्थितियां बहुत अहम होती हैं। अब छियासठ साल हो चुके हैं, जब भारत ने अपना संविधान अंगीकार यानी स्वीकार किया था।

यह न तो स्वर्ण जयंती है, न हीरक जयंती, पर तारीख के साथ परिस्थितियां बहुत अहम होती हैं। अब छियासठ साल हो चुके हैं, जब भारत ने अपना संविधान अंगीकार यानी स्वीकार किया था। वर्ष 1949 में आज ही के दिन यानी 26 नवंबर को संविधान सभा में इसे लिखने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले बाबा साहेब आंबेडकर ने एक बात कही थी कि ‘‘आज इस संविधान की अच्छाइयां गिनाने का कोई खास मतलब नहीं है। संविधान कितना ही अच्छा हो, अगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे, तो यह बुरा साबित होगा। अगर संविधान बुरा है, पर उसका इतेमाल करने वाले अच्छे होंगे तो फिर भी संविधान अच्छा साबित होगा। जनता और राजनीतिक दलों की भूमिका को संदर्भ में लाए बिना संविधान पर टिप्पणी करना व्यर्थ होगा।’’

वास्तव में आज की सबसे बड़ी जरूरत है कि हम, भारत के लोग, संविधान को पढ़ें, जानें और उसमें अपना विश्वास प्रगाढ़ करें। इसे भूल जाने का परिणाम है कि हम एक हिंसक, गैर-बराबर और असंवेदनशील परिस्थिति में आकार फंस गए हैं। सिवाय शपथ ग्रहण के कुछ पलों के अलावा हमें वास्तव में कब अपने संविधान के स्वतंत्र और जीवित होने का अहसास होता है, जरा सोचिएगा! कभी अपने बच्चों से पूछिए कि क्या वे भारत के संविधान को पहचानते हैं?

यह महज एक किताब नहीं है, यह एक तस्सवुर है कि हम बर्तानिया उपनिवेशवाद यानी गुलामी और गरीबी, जातिवाद से मुक्त होकर किस तरह का मुल्क बनाना चाहते हैं! दृष्टि यह थी कि देश का निर्माण समाजवाद, पंथ निरपेक्षता, लोकतांत्रिक, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, मानवीय गरिमा और अवसरों के समान बंटवारे से होगा। विकास को नापने के यही पैमाने होंगे। आज के माहौल में हमें अपनी खुद की व्यवस्था पर भी संदेह होने लगा है। अक्सर यह सवाल कौंधता है कि वास्तव में हमारी सरकार किसके प्रति प्रतिबद्ध है?

अब जरा आसपास के माहौल पर नजर डालिए। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय इसका केंद्र है। यह कहता है कि दुकान, मंदिर, मनोरंजन के स्थानों, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों, मिलने-जुलने के स्थानों पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा। आजादी के अड़सठ सालों के बाद भी ऊंची जाति-नीची जाति का भेद जारी है। आखिर प्रमाण सामने होते हुए भी सरकार में यह संविधान लागू करने की मंशा कमजोर क्यों रही?
यही संविधान, जिसे उन दो सौ दस प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया था, जो हिंदू, मुसलिम, सिख, पारसी, अनुसूचित जाति, ईसाई, एंग्लो इंडियन, रियासतों और पिछड़े तबके से संबंध रखते थे और बदलाव का सपना लिए हुए थे। उन्होंने ही माना था कि दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण अनिवार्य है। रोजगार में समानता का अधिकार तभी लागू हो सकता है, जब आरक्षण को सही मंशा के साथ लागू किया जाता।

विश्व गुरु होने का दावा करने वाले अपने भारत में असहमति और आलोचना का जवाब असहिष्णु व्यवहार से दिया जाता है। जो जातिवाद के खिलाफ और अंधविश्वास के खिलाफ बोलता है, उसका जीवन छीन लिया जाता है। आखिर संविधान के मूल अधिकारों के अनुच्छेद 19 को छीना ही जा रहा है। इसके मुताबिक हमें अधिकार है कि लोग अपनी बात को अभिव्यक्त कर सकें, शांतिपूर्ण तरीके से सम्मलेन कर सकें, संगठित हो सकें; इस अधिकार को क्रिया में सबसे ज्यादा आघात पंहुचाया जा रहा है। केवल कानून के जरिए नहीं, कानूनों को लागू करने की कार्यशैली के जरिए उनके खिलाफ पुलिस मामले दर्ज करती है, जो धार्मिक-राजनीतिक-आर्थिक सत्ताधारियों से असहमति रखते या उनकी तार्किक आलोचना करते हैं।

कानून का दुरुपयोग करके संगठनों-संस्थाओं को खत्म किया जा रहा है। वास्तव में एक संस्था का खत्म किया जाना, संविधान में दर्ज मौलिक अधिकार को खत्म किए जाने के बराबर है। यह सही है कि अगर कोई देश के खिलाफ या देश के मूल्यों के खिलाफ अपराध करता है, तो कानून को पूरी शिद्दत से अपनी भूमिका निभानी और कार्रवाई करनी चाहिए। पर सरकार को यह तो साबित करना चाहिए कि अपराध क्या है? नीतियों और कार्यशैली की आलोचनात्मक समीक्षा करना संवैधानिक अधिकार है, यह अपराध नहीं है।

हमारी पूरी शिक्षा नीति संविधान की भावना के खिलाफ है। संविधान तो कहता है कि हर समूह को अपनी विशेष भाषा, लिपि, संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है। क्या भील आदिवासी को भीली और बुंदेलखंड की छात्रा को भोपाल में बुंदेलखंडी बोलने का अधिकार मिलता है। उनकी बोलियों का उपहास उड़ा कर हम उनके अधिकार समाप्त करते हैं। शिक्षा का माध्यम अंगरेजी या हिंदी तय कर देने का क्या मतलब है? वास्तव में उपनिवेशवाद को खत्म करने के मकसद से बना था भारत का संविधान। वह लागू नहीं हुआ, इसका मतलब उपनिवेशवाद बरकरार है।

हमारी वित्तीय व्यवस्था का स्वरूप भी संविधान से निकल कर आता है। रेल के किराए में बढ़ोतरी या किसी कर को लगाने का प्रस्ताव संसद में पारित होना चाहिए, पर पिछले दस सालों में हमने देखा है कि सरकार कर लगाने या शुल्क बढ़ाने के लिए संसद की प्रक्रिया का पालन नहीं करती है और साल में कभी भी कर लगा देती या किराया बढ़ा देती है। तर्क यह है कि अब हमारी अर्थव्यवस्था खुली हुई है और बाजार के हवाले है, इसलिए बजट या संसद के सत्र का इंतजार करना असंभव है। इसका साफ मतलब है कि मौजूदा आर्थिक नीतियां संवैधानिक वित्तीय व्यवस्था के सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं।

हम खाद्य सुरक्षा कानून बनाते हैं या रोजगार गारंटी कानून लागू करते हैं, तो समाज और राजनीति का एक वर्ग इन कानूनों का विरोध करता है। वह कहता है कि ये ‘करदाताओं’ के धन का दुरुपयोग है; पर यह सच नहीं है। रोजगार, जमीन, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्याय वास्तव में उनका संवैधानिक अधिकार हैं, कोई भीख नहीं। संविधान तय करता है कि राज्य आय की गैर-बराबरी को कम करने, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को खत्म करने का प्रयास करेगा।

भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित की सुरक्षा हो। जरा सोचिए कि पिछले अड़सठ सालों में जिस तरह सवा करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा है, जिस तरह से गांव के गांव बदहाली में पलायन कर रहे हैं, पंचायतें नौकरशाही की गुलाम हैं, इससे क्या पता चलता? मुझे लगता है कि संविधान को कहीं कैद कर दिया गया है।
संविधान कहता है कि कर्मकारों को शिष्ट जीवन स्तर पाने के लिए जीवन निर्वाह के लायक मजदूरी मिलनी चाहिए। भारत के वेतन आयोग हर बार सरकारी नुमाइंदों के वेतन दो गुने कर देते हैं। आज एक अफसर के प्रतिदिन के वेतन और एक मजदूर के वेतन में सत्रह गुना का फासला है। क्यों? क्योंकि संविधान कहीं कैद है? सबसे अहम बात यह है कि अगर एक मजदूर को वास्तव में मिलने वाली मजदूरी को मापें, तो यह अंतर सौ गुने का है।

संविधान सभा की मंशा ऐसा भारत बनाने की तो नहीं थी! विकास का मतलब है मध्यवर्ग को मिलने वाली सुविधाएं मिलना; पर अक्सर यह कहा जाता है कि भले पैसा ले लो, पानी दो; भले पैसा ले लो, बिजली दो; भले पैसा ले लो, पर अस्पताल बनाओ! यह मध्यवर्ग कभी नहीं सोचता कि देश के पचहत्तर फीसद लोग इन सेवाओं का ‘भुगतान’ नहीं कर सकते हैं। बस यहीं से ‘टारगेटिंग’ शुरू हो जाती। जो गरीब हैं या तो उन्हें सेवाएं नहीं मिलतीं या पूरी व्यवस्था भ्रष्ट बना दी जाती है। लोग बीमारी से नहीं मरते हैं, इलाज के अभाव में मरते हैं। बच्चे अकाल के कारण नहीं मरते हैं, बल्कि इसलिए मरते हैं, क्योंकि अनाज के गोदामों में ताला बंद रहते हैं।

हमारी शिक्षा व्यवस्था उन्हें विज्ञान, वाणिज्य, प्रबंधन पढ़ाती है, संविधान नहीं पढ़ाती। शायद यही कारण है कि उन्हें यह भी नहीं पता कि अनुच्छेद 51 के मुताबिक संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों पर चलना हर नागरिक का ‘मूल कर्तव्य’ है। लोग ‘राष्ट्रभक्त’ का तमगा इसलिए लटकाए घूम रहे हैं, क्योंकि वे खुद को ‘हिंदू’ कहते हैं। क्या हम जानते हैं कि संविधान के मूल कर्तव्यों में उल्लेख है कि हर नागरिक देश की रक्षा करे, राष्ट्र सेवा करे, भेदभाव दूर करे, स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ होने वाली हर प्रथा का त्याग करे।

सभी को अपना धर्म मानने का अधिकार है, पर संविधान यह भी कहता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानववाद की भावना का विकास करना भी नागरिकों का मूल कर्तव्य है। अगर कहीं खनन या कारखाने के कारण पर्यावरण और जैव-विविधता का विनाश हो तो हमें क्या करना चाहिए?

संविधान के हिसाब से तो प्राकृतिक पर्यावरण, वन, झील, नदी, वन्य जीव की रक्षा करना भी नागरिकों का ‘मूल कर्तव्य’ है, पर आज अगर कोई इसका पालन करे, तो उसे विकास-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी की उपमा दी जाती है और वह सलाखों के पीछे भेजा जा सकता है। कारण? संविधान कहीं कैद में है? मैं मानता हूं कि ऐसा कोई भी विकास भारत का भला नहीं कर सकता, जिसकी नीतियां संविधान की मूल भावनाओं और इसके प्रावधानों के खिलाफ गढ़ी गई हों।

हमें यह मानना होगा कि सांप्रदायिकता का क्षरण, आर्थिक-सामाजिक गैर-बराबरी का खात्मा और मानवीय विकास की प्रक्रिया का सहज होना, तभी संभव है जब हम मूल्य आधारित समाज व्यवस्था में विश्वास रखेंगे और सरकारें उसके मुताबिक नीतियां बनाएंगी, अन्यथा बेहतर समाज कभी नहीं बन पाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. B
    B.UPADHYAY
    Nov 25, 2015 at 11:25 pm
    जागो----जागो-----जागो--८-देश पर 1947 के बाद से सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेता , भारतीय प्रशासनिक -पूलिस -फोरेस्ट - राजस्व अधिकारियो , न्याय की कुर्सी पर बैठे हुए सभी को सोचना चाहिए की देश मे ''सत्य और न्याय'' को दल-दल मे धकेलने का ज़िम्मेदार कौन है ? सत्य और न्याय समाप्त प्राय: हो चुका है . श्री गंगानगर का हथियार लाइसेंस कांड , सेक्स सकेंडल कांड . मध्य प्रदेश का व्यापमा,पीएमटी घोटाला .ईमानदारो के दफ़न के कांड ,कीसानो की आत्महत्याओ के कांड
    (0)(0)
    Reply
    1. B
      B.UPADHYAY
      Nov 25, 2015 at 11:20 pm
      भरषटाचार के पैसो का गंदा खेल. --------------8------------------------------ 1- इंसान को इंसान न समझे. 2-औलाद बिगड़े. 3- बुढ़ापे मे खुद की आत्मा धिक्कारे. 4-गंदे शौक (आदते) . 5- घर मे संसकारो का ख़ात्मा. 6-न्याय खरीद-फ़रोक्त. 7-नोकारियो मे अयोग्य लोकसेवको की भर्ती. 8-न्याय के बिकने से नक्सलियो का जन्म. 9-गंदे नेताओ का व्यवस्थपिका मे बहुमत. 10-इह लोक के साथ-साथ अगले जन्म के लिए नारकीय जीवन पर्चेज. सत्य और न्याय के िक की ज़य हो.
      (0)(0)
      Reply
      1. R
        rajkumar
        Nov 26, 2015 at 11:54 am
        अंतर १९४७ से प्राइवेट नौकरी वालो लोगो के जयादा है कोा देखना वाला नहीं है अंग्रेज आज भी है
        (0)(0)
        Reply