December 07, 2016

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सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी

जापान को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलने की बात इस कारण भी नहीं सोची जा सकती कि चीन यह कभी पसंद नहीं करेगा।

Author November 17, 2016 01:29 am
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की कोशिशों को मिली बड़ी सफलता (फोटो: एजंसी)

महेंद्र राजा जैन

पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद में सुधार और उसमें भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई सदस्य देशों ने समर्थन किया। इन देशों ने जोर दिया कि विश्व संस्था की शीर्ष इकाई को निश्चित तौर पर ऐसा होना चाहिए कि जो नई वैश्विक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करे। पर प्रश्न है कि क्या ऐसा होना संभव है? 1945 में द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया भर के देशों ने मिल कर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की, जो आने वाली पीढ़ियों को महायुद्ध ही नहीं, देशों के बीच युद्ध की विभीषिका से बचाएगा। पर देखा जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र के सर्वाधिक शक्तिशाली अंग- सुरक्षा परिषद- को ऐसे अवसरों पर लकवा-सा मार जाता है और वह कुछ नहीं कर पाता। अगर कभी कुछ करता भी है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए इस समय लोगों की रुचि इस बात में है कि सुरक्षा परिषद, जो संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख अंग है, उसमें सुधार कैसे किया जाए। इसका कारण बताया जाता है कि वर्तमान में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को ‘वीटो’ (निषेधाधिकार) का अधिकार प्राप्त है। ये सदस्य देश हैं- ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका। इनमें से किसी एक का भी वीटो बाकी चार के बहुमत को अप्रभावी कर देता है। पिछले कुछ वर्षों में वीटो के इस अधिकार का सदस्य देशों ने दुरुपयोग भी किया है, जिसके कारण कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न अनसुलझे रह गए या उन पर त्वरित निर्णय नहीं किया जा सका।

इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ देशों ने सुझाव दिया है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा दी जाए या वीटो के अधिकार में संशोधन किया जाए या फिर वीटो का अधिकार ही पूर्णत: समाप्त कर दिया जाए। ये तीनों विकल्प भले एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ें, पर इनसे संयुक्त राष्ट्र के शक्ति-संतुलन में निश्चित ही नाटकीय परिवर्तन हो सकेगा और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र, जो वर्तमान में एक प्रकार से अप्रभावी-सा है, बहुत कुछ प्रभावी हो सकेगा। पर इन तीनों में से कोई भी प्रस्ताव पास होना तो दूर, संयुक्त राष्ट्र की बैठक में विचारार्थ लाया भी जा सकेगा, कहना मुश्किल है। इस स्थिति के लिए स्वयं संयुक्त राष्ट्र जिम्मेदार है। 1945 में सभी मित्र देशों ने आपस में तय करके एक-दूसरे को वीटो का अधिकार दे दिया और उसके बाद इस अधिकार को विधान सम्मत रूप से एक प्रकार से संरक्षित कर आपस में यह भी तय कर लिया कि कोई भी सदस्य इसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में इन पांच स्थायी सदस्यों के अधिकारों या शक्ति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने या स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की कोशिश तभी सफल हो सकती है, जब वर्तमान सदस्यों में से कोई भी ऐसे किसी प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग न करे, क्योंकि स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य वीटो का प्रयोग कर बाकी चारों सदस्यों द्वारा पास किए गए किसी भी प्रकार के परिवर्तन के किसी भी प्रस्ताव पर ‘पूर्ण विराम’ लगा सकता है।
फासिस्ट शक्तियों के आक्रमण रोकने में लीग आफ नेशंस की विफलता और महायुद्ध के अनुभवों से मित्र राष्ट्र समझ गए थे कि अंतरराष्ट्रीय अराजकतावाद और आतंकवाद के चलते बेल्जियम, फिनलैंड और थाईलैंड जैसे छोटे देशों पर अगर उनका कोई बड़ा पड़ोसी देश आक्रमण करे तो वे अपनी सुरक्षा नहीं कर पाएंगे। ये सभी राष्ट्र सुरक्षा देने वाले थे, इसलिए नहीं कि वे इसे अपना कर्तव्य या उत्तरदायित्व मानते थे, बल्कि इसलिए कि वे स्वयं अपने को इतना शक्तिशाली समझते थे कि भावी आक्रमणकारियों का सामना कर सकें। दरअसल, इन देशों ने जर्मनी और जापान को पंद्रह-बीस वर्ष बाद की सैनिक शक्ति के सक्रियकरण पर गंभीरता से विचार किया था। भविष्य में किसी भी प्रकार के आक्रमण से निपटने के लिए अमेरिका, रूस और ब्रिटेन ही जिम्मेदार माने जाते थे। इसी कारण आवश्यक समझा गया कि इन देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट तो मिले ही, युद्ध और शांति के लिए जिम्मेदार संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन पर इन्हें वीटो का अधिकार भी मिले।

इस संबंध में अमेरिका और रूस को संयुक्त राष्ट्र में रखना आवश्यक था। दरअसल, यह लीग आफ नेशंस की निष्क्रियता का परिणाम था। अमेरिका लीग आफ नेशंस का सदस्य कभी नहीं रहा। सोवियत रूस 1930 में सदस्य था, पर जब 1940 में उसने फिनलैंड पर आक्रमण किया, तो उसे निकाल दिया गया। जब रूस फिर सदस्य बना तो जापान, जर्मनी और इटली ने सदस्यता वापस ले ली। लेकिन अगर अमेरिका और रूस को इस टेंट में रहना था तो वे इस बात से भी आश्वस्त होना चाहते थे कि अगर संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव या कार्य से उनके स्वार्थ पर किसी भी प्रकार की आंच आने की आशंका हो, तो वे उसे रोक सकें। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में वीटो के अधिकार का प्रावधान किया गया।

उस समय भले वीटो का अधिकार आवश्यक और उचित समझा गया हो, पर आज स्पष्ट देखा जा रहा है कि उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक है। कई बार देखा गया है कि किसी देश में आंतरिक संघर्ष और नागरिक अधिकारों के दुरुपयोग के संबंध में संयुक्त राष्ट्र चाह कर भी इसलिए कुछ नहीं कर पाता कि उसके विरोध में सुरक्षा परिषद के पांचों सदस्यों में से कोई भी वीटो के अधिकार का प्रयोग न कर बैठे। वैसे देखा जाए तो भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए। इसके विपरीत इस सुविधा के आलोचकों का कहना है कि ब्रिटेन और फ्रांस की शुरू से चली आ रही स्थायी सदस्यता कालदोष है।

इसके साथ ही सिंगापुर जैसे स्वतंत्र और बहुत कुछ निष्पक्ष देशों का यह भी कहना है कि बड़े देशों को वीटो का अधिकार दिया जाना अपने आप में एक प्रकार से अन्याय है। पांच देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन के किसी कार्य को ठप कर देना ही क्या पर्याप्त बुरा नहीं है कि इसके सदस्यों की संख्या बढ़ा कर अब आठ या दस कर दी जाए! तब फिर इस पद्धति को कैसे बदला जाए। केवल इसके घोषणापत्र में संशोधन से ऐसा किया जा सकता है, यानी जब संयुक्त राष्ट्र की आमसभा के दो तिहाई सदस्य इसके पक्ष में मत दें और पांचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी सदस्य विरोध न करे। ऐसी स्थिति में यह सोचना ही व्यर्थ है कि ब्रिटेन और फ्रांस अपना विशेषाधिकार छोड़ने को तैयार होंगे।

जापान को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलने की बात इस कारण भी नहीं सोची जा सकती कि चीन यह कभी पसंद नहीं करेगा। जर्मनी को इतने अधिक देशों के मत मिल ही नहीं सकते कि वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन सके। ब्राजील को भी इस कारण स्थायी सदस्य बनाने का अवसर नहीं है कि कई दक्षिण अमेरिकी देश उसका समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में स्थायी सदस्यता के लिए सबसे प्रबल दावेदार भारत ही बचता है। देश की विशालता, उसकी जनसंख्या, उसकी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था, शांति-प्रयासों के लिए संयुक्त राष्ट्र के कार्यों में उसका योगदान और अन्य सभी क्षेत्रों में भी उसकी सुदृढ़ स्थिति और इन सभी के साथ उसके पक्ष में एक बात यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में भी पर्याप्त देशों के वोट उसे मिल सकते हैं। ऐसी स्थिति में सुरक्षा परिषद के पांचों सदस्यों में से कौन उसके विरुद्ध वीटो का प्रयोग करेगा? चीन भी ऐसा करने में कुछ हिचकेगा।

भारत की सुदृढ़ स्थिति के बावजूद इस बात की संभावना बहुत कम जान पड़ती है कि सुरक्षा परिषद के वर्तमान ढांचे में कोई परिवर्तन होगा। पर ऐसा कुछ अवश्य किया जा सकता है, जिससे सुरक्षा परिषद वर्तमान की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय और तर्कसंगत प्रतीत हो। जिस समय सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों की संख्या दस निश्चित की गई थी, उस समय संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में कुल पचहत्तर सदस्य देश थे। तब से अब तक यह संख्या बढ़ कर एक सौ तिरानबे हो गई है और निकट भविष्य में कुछ और बढ़ सकती है। ऐसे में अगर अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा कर दस से अठारह कर दी जाए तो पांच स्थायी सदस्य मिलाकर कुल संख्या तेईस हो जाएगी। इसके साथ ही सुरक्षा परिषद के इस नियम पर भी विचार किया जा सकता है कि सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता केवल दो वर्ष तक रह सकती है।

अगर ऐसा कुछ हो सका तो अधिक देशों को सुरक्षा परिषद की कार्य प्रणाली से परिचित होने का अवसर मिलेगा और दो वर्ष का नियम बना देने से जिन सदस्य देशों का शांति प्रयासों का रिकार्ड अच्छा रहेगा, जैसे भारत और ब्राजील, उन्हें फिर से सदस्य बने रहने का मौका मिल सकेगा। इसके साथ ही यह बात भी विचारणीय है कि पिछले साठ वर्षों में संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में कोई संशोधन नहीं हुआ है। वर्तमान स्थितियों को देखते हुए कुछ संशोधन कर देने से लोगों को यह मानने में भी सुविधा होगी कि संयुक्त राष्ट्र का संविधान पत्थर की लकीर नहीं है। इसके बावजूद आलोचकों को यह कहने को रहेगा ही कि पांचों बड़े (अगर भारत भी सदस्य बन गया तो छह) स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार तो रहेगा ही। फिर भी हमें मानना पड़ेगा कि वीटो का प्रश्न इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है और न ही इससे सुरक्षा परिषद की उपयोगिता या महत्त्व में कोई कमी आती है।

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First Published on November 17, 2016 1:29 am

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