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राजनीतिः गैरसंचारी बीमारियों का घर बनता भारत

‘कार्डियो-लॉजिकल सोसायटी आॅफ इंडिया’ का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि देश में हृदयाघात से होने वाली मौतों में लगातार वृद्धि हो रही है।
Author October 27, 2017 01:50 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिजीत मोहन

भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है। बीमारियों पर नियंत्रण नहीं लगा तो वह दिन दूर नहीं जब विश्व में भारत की पहचान एक बीमारू देश के रूप में होगी। जनवरी 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खुलासा किया था कि विश्व में गैरसंक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोगों की कैंसर, मधुमेह और हृदयाघात जैसे गैरसंक्रामक रोगों की वजह से समय से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है।

‘कार्डियो-लॉजिकल सोसायटी आॅफ इंडिया’ का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि देश में हृदयाघात से होने वाली मौतों में लगातार वृद्धि हो रही है। अगर उच्च रक्तचाप, खराब जीवन शैली, मधुमेह, शराब के सेवन पर अंकुश नहीं लगा तो फिर हृदयाघात से होने वाली मौतों को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा। सर्वेक्षण बताता है कि इस समय देश में 54 लाख लोग हृदयरोग से पीड़ित हैं और हर वर्ष दिल के मरीजों की तादाद बढ़ रही है। हृदयाघात की बीमारी कई अन्य गैरसंचारी बीमारियों को भी जन्म दे रही है। एक और अध्ययन में पता चला कि भारत की आधी से अधिक आबादी सांस संबंधी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त है। यह निष्कर्ष 880 शहरों में व्यापक अध्ययन के बाद निकाला गया है।

अध्ययन में पाया गया कि देश की आबादी का 21 प्रतिशत हिस्सा हृदय रोगों, उच्च तनाव और उच्च रक्तचाप की चपेट में है। फेफड़े की बीमारियों के अलावा दमा जैसी घातक बीमारियों के मरीजों की तादाद बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक रिपोर्ट से यह भी उद्घाटित हो चुका है कि असंक्रामक बीमारियों (हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर) की वजह से आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। यह रिपोर्ट शहरी आबादी के स्वास्थ्य से विकास पर पड़ने वाले असर पर आधारित है। शहरीकरण और वहां काम तथा जीवन शैली की स्थितियां ही इन बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं। देश में सालाना होने वाली कुल मौतों में से छह प्रतिशत कैंसर से होती हैं। यह दुनिया भर में कैंसर से होने वाली कुल मौतों का आठ प्रतिशत है।

भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है । बीमारियों पर नियंत्रण नहीं लगा तो वह दिन दूर नहीं जब विश्व में भारत की पहचान एक बीमारू देश के रूप में होगी। जनवरी 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खुलासा किया था कि विश्व में गैरसंक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोगों की कैंसर, मधुमेह और हृदयाघात जैसे गैरसंक्रामक रोगों की वजह से समय से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है। भारत में गैरसंक्रामक रोगों से 30 से 70 साल के बीच मरने वाले लोगों की संख्या 26.1 से बढ़कर 26.2 प्रतिशत से भी अधिक हो गई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि गैरसंक्रामक बीमारियों में कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी संबंधी प्रमुख चार बीमारियां हैं। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा लोगों के स्वस्थ जीवनशैली में सुधार लाने के लिए व्यापक समझौते पर सहमति बनी तो उम्मीद बंधी कि गैरसंचारी रोगों का जोखिम कम होगा। लेकिन इस दिशा में अभी तक ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर गैरसंचारी रोगों पर नियंत्रण की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो 2020 के अंत तक मरने वाले लोगों की तादाद छह करोड़ के पार पहुंच सकती है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का मानना है कि गैरसंचारी रोगों पर नियंत्रण लगाना सबसे बड़ी चुनौती है। तेजी से बदल रही जीवनशैली, खानपान और शारीरिक कसरत की कमी के कारण आज जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। इन भयंकर रोगों से लाखों लोग काल के गाल में समा रहे हैं। आज गैरसंक्रामक रोगों की वजह से विश्व की एक तिहाई आबादी की जिंदगी समय से पहले खत्म हो जा रही है। कैंसर, मधुमेह, हृदय, सांस और मानसिक रोगों जैसे गैरसंक्रामक रोगों से बेहतर तरीके से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं।

हालांकि इस दिशा में पार्टनरशिप टू फाइट क्रॉनिक डिजीज (पीएॅसीडी) ने हाल ही में ‘संकल्प, दिशा: स्वस्थ भारत’ नाम से एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत के संकल्प को हासिल करने में सहयोग देना है। भारत में गैरसंक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है लिहाजा, ऐसे में इस दस्तावेज से राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। विडंबना यह है कि हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्काघात से मरने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या भारत में ही है। हालांकि भारत सरकार गैरसंक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही है लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं। अगर इन बीमारियों पर शीघ्र नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया तो ये राष्ट्रीय आपदा का रूप ग्रहण कर सकती हैं जिससे निपटना फिर आसान नहीं होगा। सरकार की कोशिश यह है कि तीस वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में गैरसंचारी रोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता पैदा की जाए और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण किया जाए। निस्संदेह यह एक सार्थक पहल है। लेकिन जानकर हैरानी होगी कि बीते वर्ष सरकार ने तीस वर्ष से अधिक आयु के सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनाई लेकिन अभी तक उस दिशा में दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है।

अगर इस योजना को आकार दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी।
भारत के महापंजीयक द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 35 से 64 वर्ष आयु वर्ग के लोगों में 42 प्रतिशत मौतों की वजह गैरसंचारी रोग हंै। आज देश में कैंसर रोगियों की संख्या तकरीबन पैंतीस लाख से ऊपर पहुंच चुकी है। चिंता वाली बात यह है कि लाख अनुसंधानों के बावजूद यह रोग अभी भी लाइलाज बना हुआ है। अगर इस रोग के लक्षणों को समझ लिया जाए तो इस पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी। ऐसा माना जाता है कि कैंसर के रोगी का जितना जल्दी इलाज शुरू होगा, वह उतना ही लाभकारी होगा। पिछले सालों में कैंसर रोगियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं। लेकिन ये दवाइयां इतनी ज्यादा महंगी हैं कि आमलोगों की पहुंच से बाहर हैं। सरकार को चाहिए कि इन दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए ताकि कैंसर जैसी बीमारी से ग्रस्त आम आदमी अपना इलाज करा सके। इसके अलावा सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए अपना फोकस शहरों के साथ ही गांवों की ओर भी करना होगा। इसलिए और भी, कि गैरसंचारी रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में ही है। आज गांवों में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। गांव में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डॉक्टर हैं और न ही दवाइयां। ऐसी स्थिति में भला गैरसंक्रामक रोगों से कैसे निपटा जा सकता है!

विडंबना यह है कि गांव के लोगों को तब तक गैरसंचारी रोगों के बारे में जानकारी नहीं होती जब तक कि वे पूरी तरह चपेट में नहीं आ जाते हैं। जब उन्हें जानकारी मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। गांवों में इलाज की सुविधा नहीं होती है लिहाजा उन्हें शहर की ओर रुख करना पड़ता है। आज जरूरत तो इस बात की है कि भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गैरसंचारी रोगों से निपटने के लिए समन्वित रूप से असरकारक कार्यक्रम तैयार करें। गैरसंक्रामक रोगों का बढ़ता दायरा न सिर्फ जिंदगी को मौत में बदल रहा है बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी चुनौती है।

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