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विचारधारा, पार्टियां और संविधान

संविधान के अनुसार पार्टियां उसके सदस्यों की ऐसी वैचारिक अभिव्यक्तियां मात्र हैं जो संविधान के दायरे के भीतर हैं। इतनी ही स्वतंत्रता इन वैचारिक अभिव्यक्तियों को प्राप्त है।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 05:46 am
संसद भवन के बाहर सांसदों की गाड़‍ियां। (एक्‍सप्रेस फाइल फोटो)

रामेश्वर मिश्र पंकज

समकालीन भारत का बौद्धिक परिवेश पहली नजर में अत्यंत मनोरंजक लगता है। गहराई से सोचने पर वह एक गहरी उदासी देता है। इन दिनों शिक्षा और संचार के क्षेत्रों में अनेक ऐसी शब्दावली, अवधारणाएं और मान्यताएं सर्वमान्य रूप में प्रचलित हो गई हैं, जिनके मूल स्वरूप और जिनके बीच के आपसी टकरावों और विरोधों की कभी कोई चर्चा तक नहीं होती। इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है- संविधान की महिमा। भारत का ऐसा कोई महत्त्वपूर्ण राजनैतिक और बौद्धिक समूह नहीं है, जो संविधान की महिमा नहीं गाता। पर उसके साथ ही संविधान में जिन बातों का कोई विशेष स्थान नहीं है, अथवा जिनके विषय में तनिक भी स्पष्टता नहीं है, या कि फिर जिन बातों का अभी के अनेक राजनैतिक प्रचलनों से सीधा टकराव है, उनकी भी खूब महिमा गाई जाती रहती है। उदाहरण के लिए, संविधान के भाग-5 का अध्याय-1 भारत शासन की कार्यपालिका के विषय में है और दूसरा अध्याय संसद के विषय में। भारत शासन की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और वे इसका प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेंगे। अनुच्छेद-77 के अनुसार, भारत शासन के कार्य का संचालन भारत के राष्ट्रपति के नाम से होगा। अनुच्छेद-74 और 75 के अनुसार, राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसके प्रधान होंगे- भारत के प्रधानमंत्री, तथा राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने कार्यों को संपन्न करेंगे।

मंत्रिपरिषद इस रूप में सलाहकार की हैसियत से अधीनस्थ है, पर वास्तविक अधीनस्थ तो शासकीय अफसर हैं। यह एक बड़ा पेच है, क्योंकि कार्यपालिका के शीर्ष पर राष्ट्रपति हैं और कैबिनेट सचिव कार्यपालिका का प्रमुख है। इस प्रकार भारत के शीर्ष अफसरों के पास शासन की बहुत अधिक शक्तियां हैं। जबकि अफसरों के चयन, प्रशिक्षण एवं अनुशासन तथा प्रशासन में भारत के नागरिकों की वस्तुत: लगभग कोई भूमिका नहीं है। अमूर्तन के स्तर की बात अलग है। भाग-14, अनुच्छेद-309 विधायिका को सेवा-नियम बनाने की शक्ति देता है, पर उसी अनुच्छेद में राष्ट्रपति के अधीनस्थ अफसरों को भी लगभग वे ही शक्तियां प्राप्त हैं। व्यवहार में आज तक होता यही आया है कि शीर्ष अफसर ही अफसरों के सेवा-नियमों का मूलभूत स्वरूप तय करते आए हैं। इस प्रकार कार्यपालिका के व्यावहारिक स्वामी अफसर लोग ही हैं।

इसमें एक और पेच है। अफसरों की नियुक्ति उनके सेवा-काल पर्यन्त होती है, जो लगभग पैंतीस वर्ष तक की अवधि होती है (27वें से 62वें वर्ष की उम्र तक)। राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद की नियुक्ति पांच वर्षों के लिए ही होती है। इस प्रकार स्थायी कार्यपालिका तो अफसर ही हैं, जिनकी नियुक्ति एवं सेवा-नियम भी अफसर ही निश्चित करते हैं। इस प्रकार तथ्य यह है कि भारत शासन की कार्यपालिका के स्वरूप-निर्धारण व दैनंदिन कामकाज में भारत के मतदाता नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि ‘हम भारत के लोगों’ ने इस कार्यपालिका के ढांचे की न तो रचना की है, न ही इस पर उनका प्रभावी नियंत्रण है। यही बात न्यायपालिका पर भी लागू होती है, जिसके जूडिशियल अफसर ही वास्तविक स्वामी हैं। भारतीय नागरिकों की अपनी किसी परंपरा या समझ से यह न्यायिक ढांचा नहीं निकला है और अपनी परंपरा तथा समझ से कोई ढांचा बनाने का अधिकार भी नागरिकों को व्यवहार में प्राप्त नहीं है।
अनुच्छेद-122 (भाग-5, अध्याय-2) के अनुसार, संसद की किसी भी कार्यवाही की विधि मान्यता को किसी भी न्यायालय द्वारा जांच का विषय नहीं बनाया जा सकता। इसी प्रकार अनुच्छेद-121 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश के कर्तव्य पालन के क्रम में किए जा रहे आचरण पर तब तक कोई चर्चा नहीं हो सकती, जब तक उन्हें हटाने की प्रार्थना राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने का कोई प्रस्ताव न लाया जाए।

परंपरा है कि राष्ट्रपति संसद में बहुमत-प्राप्त समूह के नेता को सामान्यत: अपनी सलाह के लिए प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करते हैं, ताकि कानून बनाने की जो शक्ति संविधान के आधारभूत ढांचे के भीतर संसद में निहित है, उस शक्ति का भलीभांति सदुपयोग होता रहे। यहां यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है कि संपूर्ण संविधान में अभी भारत में जिस प्रकार के राजनैतिक दल हैं, वैसे किसी भी दल के विषय में कोई भी स्पष्ट प्रावधान या विवेचना नहीं है। संविधान मानता है कि भारत का शासन भारत के राष्ट्रपति चलाएंगे और वे परंपरा के अनुसार अपनी सलाह के लिए सोच-विचार कर प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेंगे तथा प्रधानमंत्री की सलाह से मंत्रिपरिषद की नियुक्ति करेंगे।

यहां सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस ‘राजनैतिक विचारधारा’ नामक परिकल्पना की चर्चा शिक्षित भारतीयों के बीच रात-दिन होती है, उसका कोई संज्ञान भारत के संविधान में नहीं है। अर्थात ‘आइडियालॉजी’ नामक वस्तु संविधान के लिए विचार का विषय नहीं है। इसके स्थान पर भारत का संविधान मूल अधिकारों के अंतर्गत सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समता का अधिकार देता है (अनुच्छेद-14 एवं 15) तथा राज्य के किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति के लिए सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता देता है, अर्थात कोई नागरिक किस ‘आइडियालॉजी’ को मानता है, इसका भारत के संविधान में राज्य के अधीन किसी भी पद के लिए नियोजन या नियुक्ति के संदर्भ में कोई भी अर्थ नहीं। साथ ही अनुच्छेद-19 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को वाणी की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सम्मेलन और संगम या संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि दी गई हैं।

इस प्रकार जिन्हें राजनैतिक दल कहते हैं, वे वस्तुत: इसी अनुच्छेद-19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण संगम का एक रूप हैं, इससे अधिक उस रूप के विषय में भारत का संविधान किसी प्रकार का प्रावधान नहीं करता। यदि भारत के सभी नागरिकों को वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, तो फिर कुछ व्यक्तियों का एक समूह स्वयं को पार्टी कह कर अन्य व्यक्तियों पर कोई विशेष अधिकार नहीं पा जाता। पर भारत में संचार माध्यमों ने कुछ ऐसा बौद्धिक परिवेश बना दिया है कि मानो भारत में जो दस-बारह या बीस-पच्चीस प्रमुख पार्टियां हैं, वे ही समस्त भारतीय नागरिकों के विचारों और वाणी की अभिव्यक्ति की प्रमुख प्रतिनिधि हैं। इतना ही नहीं, प्रत्येक पार्टी स्वयं के राजनैतिक मतवाद को मानो निसर्गजात श्रेष्ठता से संपन्न दर्शाती है।

संविधान के अनुसार पार्टियां उसके सदस्यों की ऐसी वैचारिक अभिव्यक्तियां मात्र हैं जो संविधान के दायरे के भीतर हैं। इतनी ही स्वतंत्रता इन वैचारिक अभिव्यक्तियों को प्राप्त है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि कोई भी पार्टी पंथ, जाति, मजहब, वर्ग, वर्ण, लिंग, भाषा आदि किसी भी आधार पर भारत के नागरिकों के बीच समता का निषेध नहीं कर सकती और विषमता की पैरवी नहीं कर सकती। इस तरह आधारभूत विचाराधारा तो स्वयं संविधान में अंकित है। कोई भी पार्टी उस विचारधारा का उल्लंघन नहीं कर सकती। इस आधारभूत तथ्य के मौजूद होते हुए पार्टियां किस वैचारिक संघर्ष की बात करती हैं! वस्तुत: ‘विचारधाराओं का संघर्ष’ एक कम्युनिस्ट मुहावरा है, जिसका संदर्भ द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी चिंतन है। सबसे ज्यादा रोचक तथ्य यह है कि भारत में केवल कम्युनिस्ट वैचारिक संघर्ष की बात नहीं करते, कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, मुसलिम लीग, जमाते इस्लामी, सिमी, विविध ईसाई मिशनरियां आदि सभी वैचारिक संघर्ष की ही बात करते हैं। वे जिन राजनैतिक लक्ष्यों के लिए रणनीतिक रूप से इस मुहावरे का प्रयोग करते हैं, वह तो स्पष्ट है, पर संचार माध्यमों को ऐसी क्या परेशानी है कि वे इस सामान्य तथ्य को कभी भी प्रस्तुत नहीं करते कि ‘वैचारिक संघर्ष’ की सारी मुहावरेबाजी और नारेबाजी भारतीय संविधान के आधारभूत तत्त्वों के विरुद्ध है।

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