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गाजा के गुनहगार

अजेय कुमार जनसत्ता 23 सितंबर, 2014: इजराइल की सरकार किस तरह अपनी जनता के शक्तिशाली वर्गों के बीच फिलस्तीनियों के प्रति नफरत फैलाती रही है, इसका एक उदाहरण इजराइली संसद (नेसेट) में डिप्टी स्पीकर मोशे फिगलिन का बयान है, ‘‘इससे पहले कि हम गाजा में अपनी सेना भेजें, हमें सबसे पहले उनकी बिजली बंद कर […]
Author September 23, 2014 10:23 am

अजेय कुमार

जनसत्ता 23 सितंबर, 2014: इजराइल की सरकार किस तरह अपनी जनता के शक्तिशाली वर्गों के बीच फिलस्तीनियों के प्रति नफरत फैलाती रही है, इसका एक उदाहरण इजराइली संसद (नेसेट) में डिप्टी स्पीकर मोशे फिगलिन का बयान है, ‘‘इससे पहले कि हम गाजा में अपनी सेना भेजें, हमें सबसे पहले उनकी बिजली बंद कर देनी चाहिए।’’ यानी फिलस्तीनी नागरिकों की मूलभूत सेवाओं को नष्ट करने का आह्वान इजराइल की संसद से किया गया। जुलाई के आखिरी सप्ताह में गाजा के एकमात्र बिजलीघर को इजराइल ने नष्ट कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि गाजा पट्टी में जलशोधन संयंत्र और जल-मल पंपिंग स्टेशन भी ठप हो गए। जबकि गाजा में पीने लायक पानी का एक यही स्रोत है। एक अनुमान के अनुसार, ध्वस्त हुए बिजलीघर को फिर से चालू होने में कम से कम एक वर्ष लग जाएगा।

अफसोस है कि अनेक इजराइली इन हमलों की सफलता पर गाल बजा रहे हैं। एक सर्वेक्षण में पता चला कि यहूदीवादी राज्य की पचासी फीसद आबादी युद्धविराम नहीं चाहती। इजराइली नागरिकों के फेसबुक पृष्ठों को देखें तो पता चलता है कि वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल फिलस्तीनियों के प्रति नफरत फैलाने में कर रहे हैं। ऐसे ही एक ब्लॉग की भाषा देखें, जिसे यहूदी होम पार्टी की एक सांसद अयेलेत शाकेद ने लिखा है, ‘‘फिलस्तीनी मांओं का खून करने का, मैं आह्वान करती हूं ताकि वे ‘छोटे सांपों’ को जन्म न दे सकें। …उन्हें मरना ही होगा, उनके घरों को भी गिराना होगा ताकि वे आतंकवादियों (फिलस्तीनियों) को जन्म न दे सकें। वे सब हमारी दुश्मन हैं और हमारे हाथ उनके खून से रंगे होने चाहिए। यह मृत आतंकवादियों की माताओं पर भी लागू करना होगा।’’

बार इलान विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, डॉ मोरदेचाई केदार, जो अरबी साहित्य पढ़ाते हैं, का मानना है कि फिलस्तीनी ‘आतंकवादियों’ की मांओं और बहनों का बलात्कार करना चाहिए। वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, उनका कहना है, ‘जिन आतंकवादियों ने लड़कों को अगवा किया और बाद में मारा (यानी 12 जून को पश्चिमी तट पर) उन्हें केवल एक चीज रोक सकती है कि उनकी बहनों और मांओं के साथ बलात्कार किया जाएगा।’’
ऐसे बयान पर भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्राध्यापक पर कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि उसके बचाव में आया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रेस वक्तव्य में कहा, ‘‘उनका उद्देश्य आतंकवादी संगठनों की मौत की संस्कृति का परिचय देना था। डॉ केदार ने मध्यपूर्व की कड़वी सच्चाई को ही अपने शब्दों में कहा और साथ में आत्मघाती बमधारियों के आतंक से लड़ने में एक न्यायप्रिय देश की अक्षमता का जिक्र किया।’’
दो देशों के बीच युद्ध होना कोई असामान्य घटना नहीं होती। पर जिस तरह इजराइल गाजा की जनता के रोजमर्रा के जीवन में बाधाएं पैदा करता है वह सचमुच असामान्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इजराइली जहाजों ने गाजा शहर के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में स्थित दो कुओं को हमले का निशाना बनाया। इन कुओं से लगभग सत्ताईस हजार लोग रोज पानी पीते थे। इसके अलावा पानी की तीन लाइनों को भी बमबारी से नष्ट किया गया जिनसे लगभग इक्कीस हजार लोग अपनी पानी की आपूर्ति करते थे। रमजान के महीने में मुसलमानों के लिए पानी का ही सबसे अधिक महत्त्व होता है। उसे इजराइल ने बंद कर दिया।

गाजा के चार मुख्य अस्पतालों पर बमबारी करके इजराइल ने घायलों को बचाने के सभी रास्ते बंद कर दिए। अस्पतालों में भी इलेक्ट्रिक जेनरेटरों पर पहले निशाना साधा गया। बिजलीघर पहले ही तबाह किए गए थे।

इस तरह गाजा की जनता को इलाज से मरहूम रखा गया, जिनमें से अधिकतर को बचाया न जा सका। बुजुर्गों के लिए विशेष सुविधाओं से लैस अल-वफा अस्पताल को ग्रेनेडों से तबाह किया गया। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, उनके पास पचहत्तर एंबुलेंस में से केवल पैंतीस काम कर रही हैं। शेष को तबाह कर दिया गया।

इसके विपरीत, जब हमास इजराइल पर अपने राकेट छोड़ता था, अमेरिका की दी हुई अत्याधुनिक मिसाइल-विरोधी तोपों से उनमें से अधिकतर को गिरा दिया जाता था। अधिक से अधिक यह होता था कि सायरन की आवाज सुनकर इजराइली लोग कुछ देर के लिए बंकरों में छिप जाते थे। हां, इतना जरूर हुआ कि अमेरिका ने चार दिनों के लिए ‘अमेरिकन एअरलाइंस’ की उड़ानें तेल-अवीव के हवाई अड््डे से बंद कर दीं, जिससे इजराइल सरकार में थोड़ा रोष अवश्य पैदा हुआ।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध में 8 जुलाई से लेकर 28 अगस्त तक, जहां 67 इजराइली सैनिकों की मौत हुई है, वहीं 1965 फिलस्तीनी, जिनमें 458 बच्चे थे, मारे जा चुके हैं। यह संख्या हर दिन बढ़ रही है क्योंकि बहुत-से मृत, स्कूलों, घरों और अस्पतालों के मलबे के नीचे दबे हुए हैं। इसी रिपोर्ट में, जो ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में छपी है, यह भी बताया गया है कि 741 एकड़ कृषियोग्य भूमि तबाह कर दी गई है जिससे खाद्यान्न की समस्या बढ़ गई है।

जिस तरह गुजरात में राज्य प्रायोजित जनसंहार का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ा और जिस तरह वहां औरतें सबसे अधिक हिंसा का शिकार हुर्इं, लगभग उसी तरह गाजा में अस्पतालों, स्कूलों और राहत शिविरों पर अंधाधुंध बमबारी से, विशेषकर उन बच्चों पर मानसिक आघात पहुंचा है जिन्होंने अपने करीबी जनों विशेषकर मांओं और बहनों को अपनी आंखों के सामने आखिरी सांस लेते देखा।
युद्ध विराम के बाद कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, विशेषकर गैर-सरकारी स्वैच्छिक संस्थाएं गाजा में औरतों और बच्चों के साक्षात्कार लेने में जुट गई हैं ताकि वे आंकड़ों सहित अपनी रिपोर्टें अपने आकाओं को दे सकें। बच्चों और स्त्रियों की मानसिक दशा का पता लगाना कोई बुरी बात नहीं, पर ज्यादा जरूरत उनके घर संवारने की है, उन्हें उस डर और आतंक से उबारने की है जिसके साए में वे दशकों से जी रही हैं। जिस मां को यह न पता हो कि उसका बच्चा स्कूल से सुरक्षित घर लौट पाएगा या नहीं, या जिसे यह अंदेशा लगा रहता हो कि उसका पति काम पर जाते हुए किसी बमबारी का शिकार तो नहीं हो जाएगा, उसकी दहशत का अनुमान लगाना कठिन नहीं। गुजरात में जनसंहार के दौरान और उसके बाद कई महीनों तक मुसलिम औरतें इसी तरह की दहशत के माहौल में रह रही थीं। राहत शिविरों में भी वे सुरक्षित नहीं थीं।

मोदी सरकार ने संसद में गाजा पर किसी बहस या प्रस्ताव की अनुमति नहीं दी तो इसके पीछे केवल इतना भर नहीं कि वह देश के हित में फिलस्तीन और इजराइल से समान दूरी बनाए रखना चाहती है, बल्कि भाजपा और विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सोच मुसलिम-विरोधी होने के कारण ये दोनों संगठन अपने को इजराइल और इजराइलवासियों के आम प्रतिक्रियावादी सोच के अधिक नजदीक पाते हैं। इजराइल जब फिलस्तीन को नेस्तनाबूद करने के इरादे से बार-बार लगभग हर वर्ष किसी न किसी बहाने से बमबारी करता है और इस तरह मुसलिम आबादी को अपना निशाना बनाता है, तो जाहिर है इससे आरएसएस के बहुप्रचारित सोच को बल मिलता है कि मुसलमान इसी लायक हैं।
दुनिया में जहां कहीं भी मुसलमानों को नुकसान पहुंचे, आरएसएस बेशक मिठाइयां न बांटे, पर उसके नेताओं के चेहरे खिल उठते हैं। बिल्कुल उसी तरह, जैसे इजराइली अपने इलाकों में ऊंची-ऊंची इमारतों की छतों पर खड़े होकर शाम के वक्त रसरंजन करते हुए दूरबीनों से गाजा पर हो रही बमबारी और उससे उठते हुए धुएं और आग की लपटों को देख कर खुशी से फूले नहीं समाते। इसे वहां ‘दर्शक-खेल’ कहा जाता है। गुजरात में जनसंहार के दौरान कई बजरंगियों ने मुसलमान औरतों के साथ हो रहे बलात्कार की वीडियो फिल्में बनार्इं और उन्हें कई जगह खुलेआम क्लबों में दिखाया गया। ‘दर्शक-खेल’ उनके यहां भी लोकप्रिय है।

इस तरह हम पाते हैं कि इजराइलियों और भाजपाइयों की प्रतिक्रियावादी वैचारिक समानताएं मोदी सरकार के इस फैसले के मूल में हैं जो उसने संसद में गाजा पर कोई प्रस्ताव लाने से मना कर दिया। यह अकारण नहीं कि जब भी फिलस्तीन पर हमला होता है, ऐसा कभी नहीं हुआ कि भाजपा या उसके किसी संगठन ने इजराइली दूतावास पर हुए विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया हो।

सोवियत संघ के पतन के बाद नई विश्व-परिस्थिति में फिलस्तीनी मुक्ति संगठन ने सैन्य संघर्ष के रास्ते को त्याग दिया और इजराइल के साथ शांति वार्ताएं प्रारंभ कीं। ओस्लो समझौता, कैंप डेविड समझौता और अनेकानेक वार्ताएं हुर्इं जिनमें कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर एक सहमति भी बनी थी। इनमें से एक बात यह थी कि अंतरिम दौर अनिश्चित काल तक नहीं चलेगा, दूसरी बात यह थी कि अंतिम रूप में जो समझौता होगा, सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 242 और 334 के पालन तक ले जाएगा। इन प्रस्तावों के अनुसार किसी भी इलाके को बलपूर्वक नहीं हथियाया जा सकता और इजराइल को कब्जाए गए इलाकों से अपनी फौजें हटानी होंगी।
पर इजराइल ने न सिर्फ इन सब प्रस्तावों का उल्लंघन किया बल्कि पश्चिमी तट के साठ फीसद भूभाग पर और उसके साठ फीसद जल-संसाधनों पर भी कब्जा कर लिया है। गाजा के नाम पर जो जमीन की एक पतली-सी पट््टी फिलस्तीनियों के लिए बची है, वह तीन तरफ से तो इजराइल से घिरी है और उसके चौथी तरफ भूमध्य सागर है। गाजा लगभग एक जेल बन कर रह गया है जहां इजराइली अधिकारियों की अनुमति के बिना न कुछ जा सकता है न वहां से कुछ आ सकता है। ऐसे में, अगर किसी शांति वार्ता का पालन न हो रहा हो तो गाजा की जनता कट्टर लेकिन जुझारू संगठन हमास को न चुने तो किसे चुने!

हाल ही में फिलस्तीनियों की ओर से फिलस्तीन अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने हार्दिक अपील की है जो गौर करने लायक है। उन्होंने कहा, ‘‘अब वक्त आ गया है कि हम सभी अपनी आवाज उठाएं और हत्या व विनाश की इजराइली मशीन के सामने, स्पष्ट रूप से तथा बलपूर्वक अपनी आवाज उठाएं।’’

 

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  1. गौरव
    Nov 9, 2016 at 1:25 pm
    जनसत्ता वाले मित्र को सिर्फ गुजरात दंगा याद रहता है, पर वो भूल जाते हैं कि कश्मीर में हिंदुओं के साथ क्या हुआ था। भाई "सेलेक्टिव सेकुलरिज्म सिंड्रोम" से पीड़ित हैं। get well soon brother । भगवान आपको आधी के वजाय पूरा सच देखने की ताकत दे। यहुदिओं के खिलाफ मुस्लिमो में कैसी मानसिकता है उसकी भी बात करते तो ये आर्टिकल अच्छा हो सकता था।
    Reply
  2. Y
    yogesh sharma
    Sep 23, 2014 at 4:40 pm
    जनसत्ता वालों कभी इराकी यज़ीदी और शिया मुस्लिम के बारे मैं भी लिख दो एक तरफ बायस्ड होकर लिखना आपकी सेक्युलर मानसिकता का परिचायक है l
    Reply
  3. S
    suresh k
    Sep 24, 2014 at 4:45 am
    अजय कुमार जी को किसी बहाने गुजरात को याद दिलाना था ? लेकिन वो गोधरा को भूल जाते है ? कश्मीर में आतंकवादियों से कैसा व्यवहार करना चाहिए जरा यहे भी बताये ? मच्छरों को मरने के लिए कीटनाशको का प्रयोग किया जाता है |
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