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भू-अधिग्रहण के कायदे

पानाचंद जैन जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: हाल ही में राजस्थान भू-अधिग्रहण अधिनियम, 2014 विधेयक राज्य विधानसभा में पेश किया गया। लेकिन इससे पहले ही राज्य के विभिन्न किसान संगठनों, स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहे अनेक बुद्धिजीवियों ने इस विधेयक की प्रक्रिया और प्रावधानों पर कई बुनियादी सवाल खड़े किए हैं और […]
Author October 22, 2014 09:48 am

पानाचंद जैन

जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: हाल ही में राजस्थान भू-अधिग्रहण अधिनियम, 2014 विधेयक राज्य विधानसभा में पेश किया गया। लेकिन इससे पहले ही राज्य के विभिन्न किसान संगठनों, स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहे अनेक बुद्धिजीवियों ने इस विधेयक की प्रक्रिया और प्रावधानों पर कई बुनियादी सवाल खड़े किए हैं और अपना विरोध दर्ज कराया है। अगर इन आधारभूत सवालों की अवहेलना करते हुए विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में विधानसभा से पारित होकर लागू हो गया तो आमजन, किसान, मजदूर और गांवों में गुजर-बसर कर रहे अन्य लोगों के लिए यह बहुत निराशाजनक होगा।

 

देश में आजादी से पहले से भू-अधिग्रहण अधिनियम, 1894 लागू था। लेकिन संविधान लागू होने के बाद से ही यह अधिनियम आलोचना का विषय रहा है। किसी भी काम को सार्वजनिक हित का बता कर भूमि ले ली जाती थी और नगण्य-सा मुआवजा देकर किसी व्यक्ति और उसके परिवार को विस्थापित कर भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता था। इस कानून को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया कितनी प्रतिकूल रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। दरअसल, यह कानून किसान-विरोधी था।

 

भूमि अधिग्रहण और संबंधित विस्थापितों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल एक अधिनियम लाया गया, जिसे ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुन:स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013’ नाम दिया गया। ध्यान रखने की बात है कि यह अधिनियम कई जन-संघर्षों और आंदोलनों के फलस्वरूप वजूद में आ सका। संसद में सभी राजनीतिक दलों की सहमति से यह विधेयक पारित हुआ और इसे एक अप्रैल, 2014 से पूरे देश में लागू किया गया।

 

किसी भी कानून की सार्थकता उसकी उद््देशिका से परखी जाती है। यह उस कानून को समझने की कुंजी भी होती है। भारतीय संसद ने शायद पहली बार भू-अधिग्रहण की वजह से विस्थापित होने वाले लोगों की समस्याओं को गहराई से समझा और उन्हें 2013 के इस अधिनियम के माध्यम से देश के विकास में भागीदारी का अवसर देने का फैसला किया। कानून की उद््देशिका में यह बताया गया है कि इसे लाने का मकसद क्या है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में संविधान के तहत स्थापित स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और ग्रामसभाओं से परामर्श किया जाए और संबंधित जमीन के मालिकों और अन्य प्रभावित परिवारों को कम से कम नुकसान या बाधा पहुंचे। औद्योगीकरण और ढांचागत सुविधाओं के लिए जिनकी भूमि का अधिग्रहण होना है, उन्हें न केवल न्यायोचित मुआवजा प्राप्त हो, बल्कि उनके पुनर्वास के लिए होने वाले भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया सहभागितापूर्ण और पूरी तरह पारदर्शी हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि प्रभावित व्यक्ति विकास में भागीदार बनें और भू-अधिग्रहण के बाद उनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में टिकाऊ सुधार हो।

 

यानी अधिनियम, 2013 की उद्देशिका में एक मानवीय दृष्टिकोण दिखाई पड़ता है। लेकिन राजस्थान सरकार की ओर से लाए जा रहे भू-अधिग्रहण कानून में यह संवेदनशीलता नहीं दिखती। इस प्रस्तावित कानून में केवल भूमि अधिग्रहण के काम को शीघ्रता से संपन्न करने के अलावा उचित और पर्याप्त मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था पर जोर है। अपनी जमीन से विस्थापित व्यक्ति या परिवार के प्रति सरकार का यह नजरिया गैर-जिम्मेदाराना दिखता है। जो व्यक्ति अपनी जमीन से दूर हुआ है, उसकी तकलीफ और समस्या को केवल अर्थ या मुद्रा से नहीं आंका जाना चाहिए। अपनी जड़ों से विस्थापित होने का मतलब सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आधार का बिखर जाना भी है। जब तक इन तीनों आधारों की पुन:संरचना की मजबूत व्यवस्था नहीं होगी, तब तक इस अधिनियम की कोई सार्थकता नहीं हो सकती।

 

राजस्थान सरकार द्वारा यह भू-अधिग्रहण अधिनियम बनाने से पहले जरूरी था कि जन-संगठनों, किसान संगठनों और इस मसले पर काम करने वाले बुद्धिजीवियों के बीच इसके मसौदों पर विस्तृत चर्चा और बहस के माध्यम से लोगों को इस प्रक्रिया से जोड़ा जाता। लेकिन दुर्भाग्यवश सरकार द्वारा इसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई। हम जानते हैं कि दूरदराज के गांवों में बैठे किसान आमतौर पर इंटरनेट जैसे आधुनिक संचार माध्यमों से नहीं जुडेÞ हैं। अगर कुछ किसानों के पास यह सुविधा है भी तो वे वेबसाइट पर अंगरेजी में डाले गए प्रारूप को समझने में सक्षम नहीं हैं। इस तथ्य से वाकिफ होते हुए भी सरकार ने इस अधिनियम के प्रारूप को अंगरेजी भाषा में राजस्व विभाग की वेबसाइट पर डाला और राज्य की जनता को सुझाव देने के लिए केवल दस दिन दिए। यह इस बात का संकेत है कि खुद सरकार की मंशा इस विधेयक पर अधिक चर्चा या बहस करवाने की नहीं रही।
अब अगर राजस्थान के इस प्रस्तावित कानून और केंद्र सरकार के 2013 के अधिनियम की तुलना करें तो कई अहम बातें सामने आती हैं। पहला, 2013 के कानून में जहां ग्रामसभा और स्थानीय स्वशासी निकाय से परामर्श सुनिश्चित करने का निर्देश है, वहीं राज्य के प्रस्तावित कानून में ऐसा कोई भी उल्लेख नहीं है। दूसरे, 2013 के अधिनियम में पुनर्वास (रिसेटलमेंट) के लिए पांचवें अध्याय में अवार्ड देने, छठे अध्याय में प्रक्रिया और आठवें अध्याय में इन मामलों में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का निपटारा करने के मकसद से प्राधिकरण की स्थापना करने का उल्लेख है। वहीं राज्य के कानून में उचित और न्यायोचित प्रतिकार, यानी मुआवजा देने की बात दर्ज है, मगर मूल कानून में इस संबंध में किए गए प्रावधानों में कोई जान नहीं है। पुनर्वास के तौर पर नगण्य-से मुआवजे की राशि की अदायगी की बात कर उसके दायरे को संकुचित कर दिया गया है। 2013 के कानून में विस्थापितों को फिर से बसाने के लिए सड़क, पीने का पानी, डाकघर, चरागाह, आंगनबाड़ी, सफाई और शौच आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, जबकि राजस्थान के प्रस्तावित कानून में बुनियादी ढांचे से संबंधित परियोजना में कुल मुआवजे में सिर्फ दस प्रतिशत भूमि देने का प्रावधान है। निजी कंपनी की बाबत भू-अधिग्रहण पर यह विकल्प जमीन के मालिक को दिया गया है।

 

तीसरे, 2013 के कानून का लाभ प्रभावित परिवार को दिए जाने का उल्लेख है, जिसमें जमीन के मालिक के अलावा वे सब श्रमिक और काश्तकार-बंटाईदार शामिल हैं, जिनकी जीविका कृषिभूमि पर निर्भर है। जबकि राज्य के प्रस्तावित कानून में प्रभावित व्यक्ति उसे माना गया है जो मुआवजे में लाभार्थी है।

 

चौथे, 2013 के अधिनियम में प्रभावित व्यक्ति को विकास में भागीदार बनाया गया है और उसकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति में सुधार करने की बात कही गई है। जबकि राजस्थान के प्रस्तावित कानून में मुआवजे के अतिरिक्त उसके लिए किसी भी तरह के लाभ की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा, इस कानून में धारा-13 के मुताबिक मुआवजे की राशि बाजार भाव के आधार पर दिए जाने की व्यवस्था है। यानी शहरी क्षेत्र में बाजार मूल्य के बराबर। ग्रामीण क्षेत्र में अगर भूमि पांच किलोमीटर के दायरे में है, तो अधिग्रहण पर मुआवजा सवा गुना से ढाई गुना होगा। जबकि 2013 के अधिनियम में शहरी क्षेत्रों में मुआवजे की राशि को बाजार-मूल्य से दो गुना और ग्रामीण क्षेत्र में चार गुना दिए जाने की व्यवस्था है।

 

पांचवें, राजस्थान के प्रस्तावित कानून में भूमि अधिग्रहण से पहले विकास परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव के अध्ययन का उल्लेख तक नहीं है, जबकि अधिनियम, 2013 में यह व्यवस्था की गई है कि भूमि अधिग्रहण का कुलपरिणाम ऐसा हो जो प्रभावित लोगों के लिए गरिमामय जीवन का रास्ता तैयार कर सके। इस मकसद से भू-अवाप्ति सेपहले परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव के आकलन का स्पष्ट प्रावधान है।
छठे, 2013 के केंद्र के अधिनियम में यह व्यवस्था है कि बहुत जरूरी मामलों में अवार्ड से पूर्व धारा 21 के तहत नोटिस जारी होने के तीस दिन के भीतर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी किसी योजना और प्राकृतिक आपदा की सूरत में कब्जा लिया जा सकता है। लेकिन राज्य के प्रस्तावित कानून में केवल अत्यंत आवश्यकता (अर्जेंसी) की दलील देकर ही जमीन का अधिग्रहण कर लिया जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि इस मामले में राज्य को अपरिमित और अमर्यादित अधिकार दिए गए हैं।

 

सातवें, अधिनियम, 2013 में अनुसूचित जाति-जनजाति की जमीन का अधिग्रहण, जहां तक संभव है, निषेध किया गया है, लेकिन राज्य के प्रस्तावित कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यह राज्य में सामाजिक न्याय की घोर उपेक्षा का ही उदाहरण है।

 

आठवें, 2013 के अधिनियम की धारा चौरासी और पचासी में कुछ परिस्थितियों और कृत्यों को अपराध बताया गया है और उनके लिए सजा का प्रावधान है। यह स्पष्ट किया गया है कि कोई व्यक्ति झूठी या गलत सूचना देता है, फर्जी दस्तावेज पेश करता है, या फिर मुआवजा हासिल करने के लिए कोई गलत काम करता है तो उसे सजा दी जा सकती है। लेकिन राजस्थान के आने वाले कानून में केवल यह व्यवस्था है कि अगर कोई व्यक्ति भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई में दखल देता है तो उसे सजा दी जा सकती है। राज्य के कानून का यह प्रावधान एक तरह से 1894 के अधिनियम की नकल है, जिसे उसी रूप में इस कानून पर चिपका दिया गया है।

 

संविधान में अनुच्छेद-254 यह स्पष्ट करता है कि अगर केंद्र के कानून और राज्य की विधानसभा से पारित कानून में असंगति हो और राज्य का कानून केंद्र के कानून के विरुद्ध हो तो राज्य का कानून मान्य नहीं समझा जाएगा। जमीन के अधिग्रहण का विषय समवर्ती सूची का है। इसलिए राज्य केंद्र के कानून में संशोधन तो कर सकता है, लेकिन अगर दोनों कानूनों में साम्य नहीं है तो वह तभी वैधानिक होगा, जब राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति प्रदान कर दें। राज्य का प्रस्तावित भू-अधिग्रहण अधिनियम केंद्र के 2013 में बनेकानून से असंगत बैठता है, दोनों में सारभूत विरोधाभास दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में राज्य के कानून का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

 

लेकिन अगर राज्य स्तर पर सरकार कानून लाना ही चाहती है तो उसे प्रभावित वर्ग के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए और राज्य के भू-अधिग्रहण अधिनियम में ऐसे प्रावधान करने चाहिए, जिनसे यह स्पष्ट हो कि राज्य का अधिनियम केंद्र सरकार के कानून से बेहतर है। तभी इस प्रस्तावित अधिनियम की सार्थकता होगी।

 

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