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उच्च शिक्षा की ढलान

शंकर शरण एक उच्चस्तरीय समिति दिल्ली विश्वविद्यालय के कार्यचालन पर विचार कर रही है। पर केवल एक विश्वविद्यालय के लिए क्यों? देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों की स्थिति पर विचार होता, जिससे मिले निष्कर्ष उनकी आम दशा-दिशा सुधारने के काम आ सकते। डॉ राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग’ (1948) की रिपोर्ट को आधार […]
Author December 1, 2014 11:53 am

शंकर शरण

एक उच्चस्तरीय समिति दिल्ली विश्वविद्यालय के कार्यचालन पर विचार कर रही है। पर केवल एक विश्वविद्यालय के लिए क्यों? देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों की स्थिति पर विचार होता, जिससे मिले निष्कर्ष उनकी आम दशा-दिशा सुधारने के काम आ सकते। डॉ राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग’ (1948) की रिपोर्ट को आधार मानें, तो हमारी चिंताओं में यही बात खो गई है कि विश्वविद्यालय का अर्थ क्या है, उसे किसलिए बनाया गया था? यह वही आयोग था, जिसकी अनुशंसाओं पर स्वतंत्र भारत के विश्वविद्यालयों की आधारशिला बनाई गई और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बना।

‘हायर एजुकेशन सेक्टर’, ‘फैकल्टी शॉर्टेज’, जैसी शब्दावली का चलन संकेत है कि विश्वविद्यालय किसी वाणिज्यिक, यांत्रिक गतिविधि चलाना जैसा मान लिया गया है। इस दोषपूर्ण स्थिति को शिक्षा की सामान्य परिभाषा से मिला कर भी देख सकते हैं। किसी सभ्यता में शिक्षा को रोजगार, उत्पादन आदि से जोड़ कर नहीं देखा गया। महान दार्शनिक रूसो ने कहा था, ‘मेरे लिए इसका कोई महत्त्व नहीं कि मेरा विद्यार्थी सैन्य सेवा में जाएगा, या चर्च, या कानून के क्षेत्र में। इससे पहले कि उसके माता-पिता उसके लिए कार्य-क्षेत्र तय करें, प्रकृति ने उसे पहले मनुष्य होने के लिए कहा है… अत: जब वह मुझसे शिक्षा प्राप्त करके जाएगा तो वह न मजिस्ट्रेट होगा न सिपाही न पादरी; वह एक मनुष्य होगा।’ हमारे कवि-दार्शनिक अज्ञेय ने भी लिखा था, ‘हमारे हाथ मुक्त हों, हमारा हृदय मुक्त हो, हमारी बुद्धि मुक्त हो: इससे बड़ी सफलता न हमारी शिक्षा हमें दे सकती है, न हम अपनी शिक्षा को दे सकते हैं।’ शिक्षा की सभी परिभाषाएं इसी तरह की मिलेंगी।

इसलिए हमें शिक्षा का अर्थ बदलने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन अगर ऐसा ही हो गया है तो इसलिए कि शिक्षा पर पूर्णत: भौतिकवादी दृष्टि छा गई है। यह मनुष्य को केवल शरीर समझती है। तभी लक्ष्य मात्र रोजगार हो गया और शुद्ध ज्ञान-चिंतन निरर्थक-सा मान लिया गया। लेकिन इसी कारण हम कई सामाजिक व्याधियों के सामने निरुत्तर भी हैं।

भगवद्गीता में कहा है, ‘इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन:। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:।’ अर्थात मनुष्य के शरीर से परे, अर्थात उच्च, उसकी इंद्रियां हैं। इंद्रियों के परे मन है। मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है। आइन्सटीन जैसे दार्शनिक-वैज्ञानिक ने भी ऐसी ही भावना व्यक्त की थी। इसलिए शिक्षा को मनुष्य के संपूर्ण आयाम को ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन यह आयाम हमारी संपूर्ण शिक्षा में पूरी तरह खो गया है।

यह कहना भूख को अध्यात्म से संतुष्ट करने की बात नहीं। वरन भूख के निदान के बाद आत्मिक, मानसिक, आध्यात्मिक आहार भी देने की बात है, जिसके अभाव में शिक्षा अधूरी रह जाती है। स्वामी विवेकानंद ने इसी पर कहा था, ‘पाश्चात्य सभ्यता की बुराइयों में से एक यह भी है कि वहां हृदय की परवाह न करते हुए केवल बौद्धिक शिक्षा दी जाती है। ऐसी शिक्षा मनुष्य को दस गुना स्वार्थी बना देती है।’ यह स्थिति किसी के लिए अच्छी नहीं।

फिर, सामाजिक ज्ञान और प्राकृतिक ज्ञान (साइंस) में एक मौलिक भेद भी है। प्राकृतिक-प्रायोगिक ज्ञान पूरी दुनिया में एक-से हो सकते हैं। लेकिन समाज-ज्ञान हर देश में अपना ही हो सकता है। तभी वह सार्थक, रचनात्मक होगा। ऐसा न होने के कारण ही हमारे विश्वविद्यालयों में पश्चिमी समाज विज्ञान एक बोझ है, जो युवाओं को मौलिक विचारों के लिए प्रेरित नहीं कर पाता।

अच्छा जीवन क्या है? अच्छी राज्य-व्यवस्था कौन-सी है? क्या ईश्वर का अस्तित्व है? संसार में मनुष्य का क्या काम है? क्या इस संसार से परे भी कोई संसार या अस्तित्व है? कहीं उचित और अनुचित का निर्णय करने का आधार क्या होना चाहिए? क्या कानून बनाना पर्याप्त है? लोक-हित, राज-हित और व्यक्ति-हित में क्या संबंध है? ऐसे कई मूल प्रश्न मानवता के साथ सदैव रहे हैं और इसीलिए शास्त्रीय ग्रंथों को सामान्य शिक्षा से कभी विलग नहीं करना चाहिए। उनमें इन्हीं बिंदुओं पर सुचिंतित ज्ञान भरा पड़ा है। नए युग में नई स्थितियों का सामना करने के लिए भी उससे संपृक्त होना जरूरी है। हमारी शिक्षा इसके विपरीत हो गई है, इस पर विचार करना चाहिए।
क्योंकि दुनिया जितनी बदलती जाती है, उतनी ही वह वैसी की वैसी भी रहती है। जीवन-मृत्यु, आशा-आकांक्षा, लोभ-स्वार्थपरता, परोपकार-त्याग, लूटपाट, गरीबी-अमीरी, अहंकार, मोह, अराजकता, सुव्यवस्था, आदि अनेक परिघटनाएं हजारों साल से मानवता के साथ हैं। नीति-अनीति, ऊंच-नीच, धर्म-अधर्म, प्रेम-वैराग्य, आदि भी मनुष्य के साथ उसी तरह हैं। इसीलिए महान पुस्तकें, चाहे वह वेदव्यास की हों या टॉल्सटॉय की, कभी पुरानी नहीं पड़तीं। उनके अध्ययन करने में रुचि रखने वालों के लिए ही विश्वविद्यालय नामक स्थान होता है। उन्हीं से वह सार्थक होता है। विज्ञान के विभागों की प्रयोगशालाएं उनके बाद ही हैं।

विश्वविद्यालय सर्वोच्च ज्ञान-केंद्र होते हैं। इस आदर्श को भटकाते हुए मात्र कागजी डिग्री वितरण, संभावित नौकरी के लिए युवा प्रमाणित करना, हॉस्टल जैसी सुविधाओं को कोचिंग धर्मशालाओं में बदल देना, या राजनीतिक प्रशिक्षण-प्रचार का अड््डा बनाना- इन सबके लिए विश्वविद्यालय नहीं होता। न होना चाहिए। यह विचार न करने का अर्थ होगा कि विकृति को मान्यता दे दी गई।

स्मरण रहे कि आदमी रोजगार इसलिए करता है कि वह सुखमय जीवन जी सके। मगर वह जीवन क्या है, यह ज्ञान उसे आज शिक्षा में नहीं मिल रहा। साइंस-टेक्नॉलॉजी, वाणिज्य-व्यापार को मुख्य मानने वाले दर्शन का यह दिवालियापन ही है कि धर्म-अधर्म की उपेक्षा से बढ़ते-बढ़ते अंतत: उसका पैमाना मनुष्य भी नहीं रह गया है। केवल वस्तुओं का अंधाधुंध निर्माण और वित्तीय लाभ ही कसौटी हो गई है। स्वयं मनुष्यता किसी गिनती में नहीं! इसलिए पहले हमें अपनी शिक्षा-दृष्टि पर ही पुनर्विचार कर लेना चाहिए।

शिक्षा पर अधिकतर चर्चा प्राय: आंकड़ों से संबंधित रहती है। कई बिंदुओं पर यह उपयुक्त है, लेकिन यही चर्चा का आदि और अंत नहीं होना चाहिए। क्या समाज की सांस्कृतिक, भाषाई उन्नति-अवनति आदि कुछ नहीं? इतने हाईस्कूल पास, ग्रेजुएट या पीएचडी कहने का क्या अर्थ है, यदि ग्रेजुएट की वास्तविक मूल्यवत्ता आकलन से बाहर हो? मात्रा से लिप्त, गुण से निर्लिप्त, यह दृष्टि छल-पूर्ण है। लेकिन इसी से आज शिक्षा का मूल्यांकन हो रहा है। इसे सुधारना चाहिए।

विश्वविद्यालय को मात्र रोजगारोपयोगी तैयारी करने-कराने के केंद्रों से अलग करना भी विचारणीय है। श्रीअरविंद ने कहा था: ‘किसी भी महान देश का बौद्धिक पतन सदैव तीन गुणों के क्षरण से आरंभ होता है।’ उन्होंने ये तीन गुण बताए थे: विवेकपूर्ण विचार करने की क्षमता, तुलना और विभेद करने की क्षमता, तथा अभिव्यक्ति की क्षमता। ये क्षमताएं भाषा, महान साहित्य, संसार भर के शास्त्रीय ग्रंथों के अध्ययन से ही आती हैं। हमारे विश्वविद्यालयों में उन ग्रंथों के नाम तक लुप्त-से हो गए हैं, अध्ययन-मनन तो दूर रहा!

भारत के लिए तो उक्त चेतावनी और भी सदा स्मरणीय है। क्योंकि पिछले हजार वर्ष से बर्बर और धूर्त लोग आकर यहां हम पर अधिकार जमाते रहे हैं।
ऐसी समस्याओं की विवेचना, और निकलने वाले निष्कर्षों का अध्ययन कहां, किनके द्वारा किया जाएगा? याद रहे, सोने की चिड़िया ही लूटी गई थी! यानी उद्योग, तकनीक, धन-वैभव से परिपूर्ण भारत ही पराधीन हुआ था। किनके हाथों, कैसे? ऐसे प्रश्नों को केवल उत्कृष्ट सामाजिक चिंतन, दर्शन और साहित्य ही समझता और हल करता है। उसी पर सभ्यता टिकती, सुरक्षित रहती है।

इसलिए हमें चिंतक, द्रष्टा भी चाहिए। जबकि भारतीय युवा मुख्यत: तकनीकी, प्रशासनिक कार्य करने वाले, प्रबंधक आदि भर बन रहे हैं। हमारे विश्वविद्यालय अधिकांशत: रोजगार की ओर बढ़ने के प्रारंभिक प्रमाण-पत्र भर दे रहे हैं। चारों तरफ विश्वविद्यालय के नाम पर केवल पोलिटेकनिक या कोचिंग जैसे केंद्र बन, बढ़ रहे हैं। लेकिन सामाजिक समस्याओं की समझ और समाधान के लिए और गहरे प्रशिक्षण, बल्कि आत्म-प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

यहां शिकागो विश्वविद्यालय के चांसलर रहे रॉबर्ट हचिन्स की टिप्पणी स्मरणीय है: ‘मैंने कई खगोलशास्त्रियों का नाम सुना है, जो सोलह वर्ष की आयु से पहले ही अंतरराष्ट्रीय विशिष्ट पत्रिकाओं में शोध-पत्र लिखते रहे हैं। पर मैंने किसी ऐसे बच्चे के बारे में नहीं सुना जो सामाजिक संगठन और मनुष्य के भवितव्य के बारे में कोई उपयोगी बात कह सका हो।’ यह मानवीय प्रश्नों की अधिक जटिलता का संकेत है। लेकिन हमारे देश में ऐसे प्रश्न ही शिक्षा और शोध की दृष्टि से पूर्णत: उपेक्षित छूट गए हैं।

इसका कारण शिक्षा में अंगरेजी का वर्चस्व और राजनीतिक विचारधाराओं का दबदबा भी है। उच्च-स्तरीय विमर्श में अंगरेजी ने आम जन-गण को काट कर अलग कर दिया है। बुद्धिजीवी वर्ग अपनी ही दुनिया में रहता है और आपसी चर्चा से आगे नहीं जाता। भारतीय भाषाओं में उच्च-शिक्षा के लिए उपयोगी पुस्तकें होना-न होना महत्त्वहीन हो गया। जैसे-तैसे कुछ नोट्स, हेल्प-बुक जैसी परीक्षोपयोगी चीजें बाजार में ला देने का चलन बन गया है। विश्वविद्यालय इन सब पर क्या कर रहे हैं?
इसी बीच, समाज विज्ञान और मानविकी विषयों को राजनीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पनपी और बढ़ती गई। इसका दुष्प्रभाव आम शिक्षण-चिंतन पर भी पड़ा। राजनीतिक मतवादों का वर्चस्व शिक्षा के बाजारीकरण का ही दूसरा पहलू है। विद्यार्थियों के स्वविवेक और चेतना को जाग्रत, विकसित करने के बदले बने-बनाए निष्कर्ष भरने और उन्हें दुहराने वाला प्रचारक भर बनाना यही चीज है।

दिल्ली के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के ‘एमए राजनीति’ के पाठ्यक्रम और सूची में अठारह बार कार्ल मार्क्स का नाम आया है। जबकि विश्व के सबसे बड़े समकालीन विद्वानों एरों, लिपसेट और हंटिग्टन का नाम तक उसमें नहीं! मतवादीकरण के ऐसे उदाहरण सामाजिक विज्ञान और मानविकी के पाठ्यक्रम में भरे मिलेंगे। इस घोर राजनीतिकरण से मुक्ति पाना प्राथमिक चिंता होनी चाहिए।

कुछ आलोचक भी इस दुर्गति का संपूर्ण आकलन नहीं करते। वे किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने जैसी बचकानी मांग करके मामले को भटका डालते हैं। ऐसे ‘शिक्षा बचाओ’ रटने वालों से भी बचने की जरूरत है। वे एक मतवाद के बदले दूसरा मतवाद थोपने से अधिक किसी योग्य नहीं लगते। जबकि संपूर्ण शिक्षा-परिदृश्य को स्वतंत्र दृष्टि से जांचने-परखने की आवश्यकता है।

 

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