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संविधान, संसद और न्यायपालिका

 प्रेमलता संविधान में 121(124)वां संशोधन हो गया। कुछ महीनों में इसके कानून बन जाने की संभावना भी है। विषय न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर है। संशोधन विधेयक के पास होने के साथ ही इसे संवैधानिक तर्कों के आधार पर चुनौती भी दी गई है। समय बताएगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस संशोधन को संविधान-सम्मत मानता है, […]
Author December 8, 2014 11:53 am

 प्रेमलता

संविधान में 121(124)वां संशोधन हो गया। कुछ महीनों में इसके कानून बन जाने की संभावना भी है। विषय न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर है। संशोधन विधेयक के पास होने के साथ ही इसे संवैधानिक तर्कों के आधार पर चुनौती भी दी गई है। समय बताएगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस संशोधन को संविधान-सम्मत मानता है, या नहीं। इन्हीं विषयों के साथ जुड़ा एक विषय है कि न्यायाधीश निर्णय देते समय किस प्रकार और किस सीमा तक कानून बनाते हैं। ऐसे कानून विधानमंडलों द्वारा बनाए कानूनों के समकक्ष कितना महत्त्व रखते हैं। क्या विधानमंडलों द्वारा निर्मित कानूनों और न्यायधीशों द्वारा बनाए कानूनों या दी गई व्यवस्थाओं में कोई मूल अंतर होता है? क्या इनके प्रवर्तन की प्रक्रिया भिन्न होती है? या, दोनों प्रकार के कानून एक समान स्वीकार्य, मान्य और ग्राह्य होते हैं?

इस संबंध में अमेरिका का सिद्धांत भारत के सिद्धांत से भिन्न है। अमेरिका के सिद्धांत के अनुसार, न्यायालय का निर्णय वादी-प्रतिवादी या विशेष व्यक्ति के लिए ही बाध्यकारी होता है जिनका विवाद न्यायालय में पहुंचता है। इससे इतर अन्य किसी व्यक्ति के लिए बाध्यकारी नहीं होता। न्यायालय का निर्णय उसके समक्ष प्रस्तुत विवाद के मद्देनजर होता है। इसे उदाहरण के लिए अवश्य प्रस्तुत किया जा सकता है, पर भारत में यह सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि संविधान लागू होने के लगभग पांच वर्ष बाद ही, 1955 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर विशद चर्चा के बाद बेहरम खुर्शीद बनाम स्टेट आॅफ बॉम्बे के मामले में निर्णय देते हुए स्थापित कर दिया था कि संविधान का अनुच्छेद 141 यह घोषित करता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यवस्थाएं भारत की सीमा के भीतर सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होंगी।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक दूसरे निर्णय में (1976 में) यह भी स्पष्ट किया कि उच्चत्तर न्यायालयों के निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होंगे। फिर, 1977 में सर्वोच्च न्यायालय का ही यह निर्णय था कि न्यायालय का अपना निर्णय भी उसके लिए बाध्यकारी होगा जब तक कि उसे अधिक न्यायाधीशों के खंडपीठ द्वारा उलट न दिया जाए। चंूकि ये सभी निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए गए थे और उसके निर्णय सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होते हैं, इसलिए अनुच्छेद 141 के अनुसार ये सभी निर्णय देश के कानून होंगे।

इन निर्णयों के बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की बाध्यकारिता पर तो कोई विवाद नहीं रहा, पर विद्वानों का एक वर्ग इस बात से सहमत नहीं है कि न्यायाधीश इस प्रकार से कानून के निर्माता हैं। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जज कानूनी नुक्ते की व्याख्या कर उसके सही अर्थ को घोषित करते हैं, इसलिए कानून नहीं बनाते बल्कि संबंधित कानून की अपनी व्याख्या भर पेश करते करते हैं।

विधिवेत्ताओं का एक दूसरा वर्ग स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करता है कि कानून की व्याख्या करने और उसको कार्यान्वित करवाने में अदालतें जो भूमिका निभाती हैं वह कानून बनाने से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। विधानमंडल केवल कानून बना कर छोड़ देते हैं, पर जब विवाद न्यायालय के समक्ष पहुंचता है और विधानमंडल द्वारा निर्मित कानून की व्याख्या और अर्थ-विस्तार का प्रश्न सामने होता है तो न्यायालय को अपनी राय देनी होती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि बदली परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारण शाब्दिक अर्थ से भिन्न अर्थ भी ग्रहण करना पड़ता है।

बदले संदर्भों में कानूनी पेचीदगियां उत्पन्न होने पर अदालत यह नहीं कह सकती कि अमुक विवाद का समाधान करने में वह समर्थ नहीं है क्योंकि यह संभव भी नहीं है कि विधानमंडल बार-बार शब्दों में परिवर्तन करता रहे। तब प्रस्तुत प्रश्न की बहुआयामी व्याख्या और उसे ताजा परिप्रेक्ष में देखने की आवश्यकता होती है और यहीं पर न्यायाधीश अपने विवेक से कानून के सामान्य सिद्धांतों के आधार पर निर्णय देता है। उदाहरण के लिए हिंदू विवाह अधिनियम में क्रूरता शब्द अपनी आधुनिक व्याख्या में मार-पिटाई से बहुत दूर जा चुका है; एक संभ्रांत परिवार से आई पत्नी को कठोर शब्द कहना भी क्रूरता हो सकता है। नौकरी के कारण पति से दूर होने पर पत्नी का पति का बहिष्कार करना नहीं माना जाता।

उपर्युक्त सभी मामलों को देखने के बाद यह तो स्पष्ट है कि न्यायालयों की भूमिका कानून बनाने में बहुत महत्त्वपूर्ण है। वास्तविक विवाद तो कुछ वर्षों से सामने आने लगे हैं जब सर्वोच्च न्यायालयों के किसी निर्णय के बाद विधानमंडल उस निर्णय के विपरीत कानून बनाने लगे। देश की सर्वोच्च अदालत और विधानमंडल (संसद) दोनों को ही अपने-अपने क्षेत्र में काम करने का अधिकार संविधान से ही प्राप्त है।

अब प्रश्न यह उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय को शासक वर्ग प्रभावहीन घोषित करने लगे तो क्या सर्वोच्च न्यायालय का अस्तित्व खतरे में नहीं होगा। शाहबानो का मामला तो बहुत पुराना हो गया है, पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कोशिशें लगातार होती रही है चाहें वह सूचना अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या हो या संसद सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रश्न हों।

सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या के विरुद्ध कानून बनाने में संसद को कोई संकोच नहीं होता। कुछ दिन पहले ही एक विषय चर्चा में रहा। वर्ष 2009-2011 में सर्वोच्च न्यायलय ने एक आदेश दिया था कि इच्छा-मृत्यु की अनुमति किस स्थिति में दी जाए। वह आदेश भी फिर आज विवाद में है कि इच्छा-मृत्यु की अनुमति कितनी ग्राह्य है। फिर एक मामला अदालत के सामने है और सरकार का मानना है कि इस पर संसद में कानून बने, न कि अदालत आदेश दे। ऐसा बार-बार करने की कोशिश की जाती है और यही चेतावनी आज भी सामने है जब एक मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने निर्णय के लिए पड़ा है और संसद का मानना है कि अदालत इस पर अपनी व्याख्या न करे, संसद इसके लिए कानून बनाए। यह एक नई स्थिति है जो निर्णय से पहले की चेतावनी जैसी बात है।

ऐसा भी बहुत बार हुआ है कि विधानमंडल ने अदालतों पर न्यायिक सक्रियता (ज्युडीशियल एक्टिविज्म) का आरोप लगाया। अब यह न्यायिक सक्रियता क्या है, इसे भी समझने की आवश्यकता है। कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अदालत के दखल देने को सामान्य भाषा में न्यायिक सक्रियता कहते हैं। पर अदालती आदेशों को देखें तो ऐसी टिप्पणियां मिलती हैं कि सरकारें अपने ही बनाए नियमों और कानूनों का खुद कई बार पालन नहीं करतीं, उनकी अनदेखी करती रहती हैं। फिर न्यायपलिका को बताना पड़ता है कि उन्हें क्या करना चाहिए।

एक निर्णय में न्याायमूर्ति सिंघवी ने सरकार से प्रश्न किया कि वह बताए कि सरकार केस लड़ने में कितना पैसा खर्च कर रही है, नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक असंख्य मामले क्यों न्यायालयों में आ रहे हैं, सरकार क्यों स्वयं फैसले नहीं करती। सर्वोच्च न्यायालय नौकरी संबंधी मामले नहीं देखना चाहता, पर जब सरकार कुछ नहीं करती तो हमें फैसला करना पड़ता है, इसे आप ज्युडीशियल एक्टिविज्म कह देते हैं! संयोग की बात है कि इस निर्णय के साथ-साथ ही 11 फरवरी 2011 को एक सांसद ने लोकसभा में चर्चा के दौरान स्वीकार किया कि सरकार की ओर से निर्णय में देरी से न्यायाधीशों को सरकार के कामकाज पर टीका-टिप्पणी करने का मौका मिल जाता है।
आज का यह प्रसंग कई संशोधनों और सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों की याद दिलाता है। इसी प्रकार की एक स्थिति तब उत्पन्न हुई थी जब अपने ही पूर्व निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था। ऐसा भी नहीं है कि समय के साथ वही अदालत उसी स्थिति में दूसरा निर्णय नहीं दे सकती, पर यहां कसौटी यह होगी कि बड़ी अदालत का निर्णय मान्य होगा या फिर बड़े खंडपीठ से उसकी विवेचना कराई जाएगी। इस संबंध में गोलकनाथ बनाम स्टेट आॅफ पंजाब के 27 फरवरी 1967 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और इसी के विपरीत हुए केशवानंद भारती के 1973 के निर्णयों को नहीं भूल सकते।

गोलकनाथ ने सरकार द्वारा सार्वजनिक प्रयोजन से संपत्ति के अधिग्रहण को अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकार के विरुद्ध बताया। मूल प्रश्न यह था कि क्या संविधान का भाग-11, मौलिक अधिकार में हस्तक्षेप हो सकता है। निर्णय गोलकनाथ के पक्ष मे हुआ तो चिंता इस बात की थी कि अब तक के भूमि अधिग्रहण की स्थिति क्या होगी।

केशवानंद भारती के मामले में यह स्थापित किया गया कि राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों (डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स आॅफ स्टेट पॉलिसी) के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण किया जा सकता है, पर ऐसा करते समय अनुच्छेद 13 को दृष्टि में रखा जाना चाहिए कि किसी के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप न हो। इस फैसले के समय 1970 में चर्चित हुए बैंक राष्ट्रीयकरण मामले को आधार माना गया जिसमें पर्याप्त मुआवजे की बात कही गई थी। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने ही गोलकनाथ के मामले को बाद में केशवानंद भारती बनाम स्टेट आॅफ केरला, 1973 मामले में पलट दिया।

यह फैसला सबसे बड़े संविधान खंडपीठ द्वारा किया गया था जिसमें तेरह न्यायाधीशों ने अपने मत व्यक्त किए थे, जिसमें चौबीसवें, पच्चीसवें संशोधन की पुिष्ट की गई थी। इस संदर्भ में वर्ष 1976 में फिर से बयालीसवां संशोधन हुआ जो एक ऐतिहासिक संशोधन था, जिसने संविधान के मूल भाव को ही बदल दिया और कई शब्द तक हटा दिए, कई शब्द परिवर्तित कर दिए- जिसे बाद में 1977 में तैंतालीसवें और 1978 में चौवालीसवें संशोधन के द्वारा कुछ सुधार किया गया और मौलिक अधिकारो को यथावत रखा गया।

अनुच्छेद 368 संसद को संशोधन का अधिकार देता है, पर संविधान की मूल भावना को बदलने का अधिकार नहीं देता। किसी दिन अगर संसद चाहे कि अनुच्छेद 368 को ही हटा दिया जाए तो हमारा संविधान जहां है वहीं ठहर जाएगा। इसलिए यह अधिकार संसद को नहीं है।

 

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