December 10, 2016

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राजनीतिः मुगलकाल में दिवाली

मुगलकाल में विभिन्न हिंदू और मुसलिम त्योहार खूब उत्साह और बिना किसी भेदभाव के मनाए जाते थे। अनेक हिंदू त्योहार मसलन दिवाली, शिवरात्रि, दशहरा और रामनवमी को मुगलों ने राजकीय मान्यता दी थी। खासतौर से दिवाली पर एक अलग ही रौनक होती थी। तीन-चार हफ्ते पहले ही महलों की साफ-सफाई और रंग-रोगन के दौर चला करते।

Author October 29, 2016 01:31 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

जाहिद खान

सदियों से हमारे देश का किरदार कुछ ऐसा रहा है कि जिस शासक ने भी सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्व की भावना से सत्ता चलाई, उसे देशवासियों का भरपूर प्यार मिला। देशवासियों के प्यार कीही बदौलत उन्होंने भारत पर वर्षों राज किया। मुगलकाल में औरंगजेब कोे यदि छोड़ दें, तो सारे मुगल शहंशाह सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्व पर यकीन रखते थे। उन्होंने कभी मजहब के साथ सियासत का घालमेल नहीं किया और अपनी हुकूमत में हमेशा उदारवादी तौर-तरीके अपनाए। यही वजह है कि उन्होंने भारत पर लंबे समय तक राज किया। मुगलों की हुकूमत के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता अपना धर्म पालन करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने एक ऐसा नया माहौल बनाया, जिसमें सभी धर्मों को मानने वाले एक-दूसरे की खुशियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। मुगलकाल में विभिन्न हिंदू और मुसलिम त्योहार खूब उत्साह और बिना किसी भेदभाव के मनाए जाते थे। अनेक हिंदू त्योहार मसलन दीपावली, शिवरात्रि, दशहरा और रामनवमी को मुगलों ने राजकीय मान्यता दी थी। मुगलकाल में खासतौर से दिवाली पर एक अलग ही रौनक होती थी। दीप पर्व आगमन के तीन-चार हफ्ते पहले ही महलों की साफ-सफाई और रंग-रोगन के दौर चला करते। ज्यों-ज्यों पर्व के दिन नजदीक आने लगते, त्यों-त्यों खुशियां परवान चढ़ने लगतीं। दीयों की रोशनी से समूचा राजमहल जगमगा उठता, जिसे इस मौके के लिए खासतौर पर सजाया-संवारा जाता था।


मुगल शासक बाबर ने दिवाली के त्योहार को ‘एक खुशी का मौका’ के तौर पर मान्यता प्रदान की थी। वे खुद दीपावली को जोश-ओ-खरोश से मनाया करते थे। इस दिन पूरे महल को दुल्हन की तरह सजा कर कई पंक्तियों में लाखों दीप प्रज्वलित किए जाते थे। इस मुकद्दस मौके पर शहंशाह बाबर अपनी गरीब रियाया को नए कपड़े और मिठाइयां भेंट करते थे। बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को भी दिवाली के जश्न में शामिल होने की समझाइश दी। बाबर के उत्तराधिकारी के तौर पर हुमायूं ने न सिर्फ इस परंपरा को बरकरार रखा, बल्कि इसमें और दिलचस्पी लेकर इसे और आगे बढ़ाया। हुमायूं दीपावली हर्षोल्लास से मनाते थे। इस मौके पर वे महल में महालक्ष्मी के साथ दीगर हिंदू देवी-देवताओं की पूजा भी करवाते और अपने गरीब अवाम को सोने के सिक्के उपहार में देते थे। लक्ष्मी-पूजा के दौरान एक विशाल मैदान में इसके बाद आतिशबाजी चलाई जाती, फिर 101 तोपें चलतीं। इसके बाद हुमायूं शहर में रोशनी देखने के लिए निकल जाते। ‘तुलादान’ की हिंदू परंपरा में भी हुमायूं की दिलचस्पी थी।
शहंशाह अकबर के शासनकाल में पूरे देश के अंदर गंगा-जमुनी तहजीब और परवान चढ़ी। इस्लाम के साथ-साथ वह सभी अन्य धर्मों का सम्मान करते थे। जहांगीर ने अकबर के मुताल्लिक अपने तुजुक यानी जीवनी में लिखा है, ‘अकबर ने हिंदुस्तान के रीति-रिवाज को आरंभ से सिर्फ ऐसे ही स्वीकार कर लिया, जैसे दूसरे देश का ताजा मेवा या नए मुल्क का नया सिगार या यह कि अपने प्यारों और प्यार करने वालों की हर बात प्यारी लगती है।’ एक लिहाज से देखें, तो अकबर ने भारत में राजनीतिक एकता ही नहीं, सांस्कृतिक समन्वय का भी महान काम किया। इसीलिए इतिहास में उन्हें अकबर महान के रूप में याद किया जाता है।
अकबर ने अपनी सल्तनत में विभिन्न समुदायों के कई त्योहारों को शासकीय अवकाश की फेहरिस्त में शामिल किया था। हरेक त्योहार में खास तरह के आयोजन होते, जिनके लिए शासकीय खजाने से दिल खोलकर अनुदान मिलता। दिवाली मनाने की शुरुआत दशहरे से ही हो जाती। दशहरा पर्व पर शाही घोड़ों और हाथियों के साथ व्यूह रचना तैयार कर सुसज्जित छतरी के साथ जुलूस निकाला जाता। राहुल सांकृत्यायन, जिन्होंने हिंदी में अकबर की एक जीवनी लिखी है, वे इस किताब में लिखते हैं, ‘‘अकबर दशहरा उत्सव बड़ी ही शान-शौकत से मनाता। ब्राह्मणों से पूजा करवाता, माथे पर टीका लगाता, मोती-जवाहर से जड़ी राखी हाथ में बांधता, अपने हाथ पर बाज बैठाता, किलों के बुर्जों पर शराब रखी जाती। गोया कि सारा दरबार इसी रंग में रंग जाता।’’
अकबर के नौ रत्नों में से एक अबुल फजल ने अपनी मशहूर किताब ‘आईना-ए-अकबरी’ में शहंशाह अकबर के दीपावली पर्व मनाए जाने का तफसील से जिक्र किया है। अकबर दिवाली की सांझ अपने पूरे राज्य में मुंडेरों पर दीये प्रज्वलित करवाते। महल की सबसे लंबी मीनार पर बीस गज लंबे बांस पर कंदील लटकाए जाते थे। यही नहीं, महल में पूजा दरबार आयोजित किया जाता था। इस मौके पर संपूर्ण साज-सज्जा कर दो गायों को कौड़ियों की माला गले में पहनाई जाती और ब्राह्मण उन्हें शाही बाग में लेकर आते। ब्राह्मण जब शहंशाह को आशीर्वाद प्रदान करते, तब शहंशाह खुश होकर उन्हें मूल्यवान उपहार प्रदान करते। अबुल फजल ने अपनी किताब में अकबर के उस दीपावली समारोह का भी ब्योरा लिखा है, जब शहंशाह कश्मीर में थे। अबुल फजल लिखते हैं-‘‘दीपावली पर्व जोश-खरोश से मनाया गया। हुक्मनामा जारी कर नौकाओं, नदी-तट और घरों की छतों पर प्रज्वलित किए गए दीपों से सारा माहौल रोशन और भव्य लग रहा था।’’ दिवाली के दौरान शहजादे और दरबारियों को राजमहल में जुआ खेलने की भी इजाजत होती थी। जैसा कि सब जानते हैं कि दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा होती है, मुगलकाल में गोवर्धन पूजा बड़ी श्रद्धा के साथ संपन्न होती थी। यह दिन गोसेवा के लिए निर्धारित होता। गायों को अच्छी तरह नहला-धुला कर, सजा-संवार कर उनकी पूजा की जाती। शहंशाह अकबर खुद इन समारोहों में शामिल होते थे और अनेक सुसज्जित गायों को उनके सामने लाया जाता।
जहांगीर के शासनकाल में दिवाली के अलग ही रंग थे। वे भी दिवाली मनाने में अकबर से पीछे नहीं थे। किताब ‘तुजुक-ए-जहांगीर’ के मुताबिक साल 1613 से 1626 तक जहांगीर ने हर साल अजमेर में दिवाली मनाई। वे अजमेर के एक तालाब के चारों किनारों पर दीपक की जगह हजारों मशालें प्रज्वलित करवाते थे। इस मौके पर शहंशाह जहांगीर अपने हिंदू सिपहसालारों को कीमती नजराने भेंट करते थे। इसके बाद फकीरों को नए कपड़े, मिठाइयां बांटी जातीं। यही नहीं, आसमान में इकहत्तर तोपें दागी जातीं और बड़े-बड़े पटाखे चलाए जाते।
अकबर के उत्तराधिकारी जहांगीर के शासनकाल में भी दिवाली बदस्तूर मनाई जाती रही। जहांगीर दिवाली के दिन को शुभ माननकर चौसर जरूर खेलते थे। इस दिन राजमहल को खासतौर से मुख्तलिफ तरह की रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता था। जहांगीर रात में अपनी बेगम के साथ आतिशबाजी का मजा लेने निकलते। मुगल बादशाह शाहजहां जितनी शान-ओ-शौकत के साथ ईद मनाते थे ठीक उसी तरह दीपावली भी। दीपावली पर किला रोशनी में नहा जाता और किले के अंदर स्थित मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती थी। इस मौके पर शाहजहां अपने दरबारियों, सैनिकों और अपनी रिआया में मिठाई बंटवाते थे। शाहजहां के बेटे दारा शिकोह ने भी इस परंपरा को इसी तरह से जिंदा रखा। दारा शिकोह इस त्योहार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते और अपने नौकरों को बख्शीश बांटते थे। उनकी शाही सवारी रात के वक्त शहर की रोशनी देखने निकलती थी।
किताब ‘तुजुके जहांगीरी’ में दीपावली पर्व की भव्यता और रौनक तफसील से बयां है। मुगल वंश के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर का दिवाली मनाने का अंदाज जुदा था। उनकी दिवाली तीन दिन पहले से शुरू हो जाती थी। दिवाली के दिन वे तराजू के एक पलड़े में बैठते और दूसरा पलड़ा सोने-चांदी से भर दिया जाता था। तुलादान के बाद यह धन-दौलत गरीबों को दान कर दी जाती थी। तुलादान की रस्म-अदायगी के बाद किले पर रोशनी की जाती। कहार खील-बतीशे, खांड और मिट्टी के खिलौने घर-घर जाकर बांटते। गोवर्धन पूजा जब आती, तो इस दिन दिल्ली की रिआया अपने गाय-बैलों को मेंहदी लगा कर और उनके गले में शंख और घुंघरू बांध कर जफर के सामने पेश करते। जफर उन्हें इनाम देते और मिठाई खिलाते।

मुगलकाल में हिंदू तथा मुसलिम समुदायों के छोटे-से कट्टरपंथी तबके को छोड़ सभी एक-दूूसरे के त्योहारों में बगैर हिचकिचाहट भागीदार बनते थे। दोनों समुदाय अपने मेलों, भोज तथा त्योहार एक साथ मनाते। दिवाली का पर्व न केवल दरबार में पूरे जोश-खरोश से मनाया जाता, आम लोग भी उत्साहपूर्वक इस त्योहार का आनंद लेते। दिवाली पर ग्रामीण इलाकों के मुसलिम अपनी झोंपड़ियों व घरों में रोशनाई करते तथा जुआ खेलते। वहीं मुसलिम महिलाएं इस दिन अपनी बहनों और बेटियों को लाल चावल से भरे घड़े उपहारस्वरूप भेजतीं। यही नहीं, दिवाली से जुड़ी सभी रस्मों को भी पूरा करतीं।

मुगल शहंशाह ही नहीं, बंगाल तथा अवध के नवाब भी दिवाली शाही अंदाज में मनाते थे। अवध के नवाब तो दीप पर्व आने के सात दिन पहले ही अपने तमाम महलों की विशेष साफ-सफाई करवाते। महलों को दुल्हन की तरह सजाया जाता। महलों के चारों ओर तोरणद्वार बना कर खास तरीके से दीप प्रज्वलित किए जाते थे। बाद में नवाब खुद अपनी प्रजा के बीच में जाकर दिवाली की मुबारकबाद दिया करते थे। उत्तरी राज्यों में ही नहीं, दक्षिणी राज्यों में भी हिंदू त्योहारों पर उमंग और उत्साह कहीं कम नहीं दिखाई देता था। मैसूर में तो दशहरा हमेशा से ही जबर्दस्त धूमधाम से मनाया जाता रहा है। हैदर अली और टीपू सुल्तान, दोनों ही विजयदशमी पर्व के समारोहों में हिस्सा लेकर अपनी प्रजा को आशीष दिया करते थे। मुगल शासकों ने भी दशहरा पर्व पर भोज देने की परंपरा कायम रखी।

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First Published on October 29, 2016 1:30 am

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