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गांधी की पराजय

जब उनके चहेते दिल्ली के संसद भवन से लेकर लाल किले तक आजादी का जश्न मना रहे थे, तब यह बूढ़ा ‘अर्द्धनग्न फकीर’ कोलकाता की एक साधारण गली में चरखा चला रहा था।
महात्मा गांधी का जन्म दो अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था।

वर्ष 1920 के असहयोग आंदोलन से लेकर 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तक गांधी ने जिस स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया, उसकी परिणति 15 अगस्त 1947 को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के रूप में सामने आई। निस्संदेह यह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की जीत थी, लेकिन यह जीत ही उसके सेनापति रहे गांधी की बहुत बड़ी हार थी। यह जरूर हुआ कि गोरे शासकों की जगह कांग्रेसी नेता सत्तारूढ़ हो गए, लेकिन यह परिवर्तन मात्र सत्ता का हस्तांतरण होकर रह गया, जो गांधी द्वारा संजोए गए सपनों तथा पल्लवित किए गए स्वदेशी जीवन-मूल्यों से बहुत दूर था। इस जीत में छिपी हार का सदमा ही वह सबब था कि जब उनके चहेते दिल्ली के संसद भवन से लेकर लाल किले तक आजादी का जश्न मना रहे थे, तब यह बूढ़ा ‘अर्द्धनग्न फकीर’ कोलकाता की एक साधारण गली में चरखा चला रहा था।

दरअसल, गांधी ने अपने नेतृत्व में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध दीर्घकाल तक जो सत्याग्रह-संग्राम चलाया, उसका बहुआयामी चरित्र था, जिसका राजनीतिक स्वतंत्रता एक आनुषंगिक पक्ष था। गांधी के लिए मूल्यवान था हिंदू-मुसलिम एकता का बने रहना और शिक्षा, भाषा, उद्योग आदि के क्षेत्रों में स्वदेशी परंपराओं को परवान चढ़ाते हुए उन्हें स्वावलंबी बनाना ताकि वे विश्व मंगल में सहायक हो सकें। लेकिन अंग्रेजों तथा उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने ऐसा होने नहीं दिया और सत्ता देने तथा लेने की प्रक्रिया में उन्होंने देश को दो हिस्सों में बांट कर रख दिया। गांधी अंत तक चाहते रहे कि देश का बंटवारा न हो। यहां तक कह डाला कि अगर देश का विभाजन होगा, तो उनकी लाश पर होगा, लेकिन इसकी चिंता न अग्रेजों ने की, न मुसलिम लीग ने, न उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी बने नेहरू-पटेल ने।

गांधी को न चाहते हुए भी अंतत: माउंटबेटन की हिंदुस्तान-पाकिस्तान बनाने वाली योजना से सहमत होने वाले नेहरू-पटेल के समक्ष हार माननी पड़ी और अपनी अंतरात्मा की दुहाई देते रहने वाले इस महात्मा की अंतरात्मा को पराजित होना पड़ा अपने ही लाडलों के हाथों। अप्रैल 1947 में दिल्ली की एक प्रार्थना-सभा में गांधी ने बहुत मर्मान्तक भाषा में अपनी यह मनोव्यथा प्रकट की थी- ‘‘होना क्या है? मेरे कहने के मुताबिक तो कुछ होगा नहीं। होगा वही जो कांग्रेस करेगी। मेरी आज चलती कहां है? आज मेरी कोई मानता नहीं। मैं बहुत छोटा आदमी हूं। हां, एक दिन मैं हिंदुस्तान में बड़ा आदमी था। तब सब मेरी मानते थे। आज न तो कांग्रेस मेरी मानती है, न हिंदू और न मुसलमान। मेरा तो अरण्य-रोदन चल रहा है।’’

तो यह थी पूरे राष्ट्र को औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध जागरूक, लामबंद करने वाली शख्सियत के अंत में अकेले पड़ते जाने और अपने ही प्रिय अनुयायियों द्वारा निरंतर हाशिये पर धकेले जाने की दारुण दास्तान। इतिहासविद सुधीर चंद्र इस संबंध में अपनी पुस्तक ‘गांधी: एक असंभव संभावना’ में लिखते हैं- ‘‘इन गहराते दुखों के साथ-साथ निजी जिंदगी का त्रासद रीतापन भी था। गांधी के परमप्रिय सचिव, उनके ‘पांचवें पुत्र’ महादेव देसाई असमय चल बसे थे। कस्तूरबा भी चली गई थीं। जवाहर थे, सरदार भी थे। बहुत अपने, पर खिंचने लगे थे। कहना एक बात थी कि ऐसे गाढ़े आपसी ‘संबंध टूट नहीं सकते’। पर उनमें पड़ रही दरारों को कैसे रोका जा सकता था? बाहर के सार्वजनिक बीहड़ को थोड़ा-बहुत सहज बना देने वाला पारस्परिक स्नेह भी चाहे-अनचाहे सूखने-सा लगा था।’’
जाहिर है, देश को आजादी के रूप में जो विजयश्री हासिल हुई वह गांधी की सद् इच्छाओं की कीमत पर हुई, अपनों से दुराव तथा अकेलापन पाकर हुई, जो उसके एक बड़े सपने की पराजय थी। यानी गांधी की पहली हार हुई ‘अपनों’ के हाथों, भारत-विभाजन के सवाल पर। लेकिन गांधी की इससे भी बड़ी हार हुई जब उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके द्वारा अन्वेषित-आचरित भारतीय स्वदेशी जीवन पद्धति को तिलांजलि देते हुए पश्चिमी ढर्रे पर देश का कायाकल्प करने के अभियान में पिल पड़े।

उल्लेखनीय है कि 1909 में ‘हिंद स्वराज’ जैसी पुस्तक लिख कर गांधी आजाद हिंदुस्तान के नव-निर्माण की एक रूपरेखा प्रस्तुत कर चुके थे। इस पुस्तक में उन्होंने पश्चिम की मशीनी सभ्यता को ‘शैतानी सभ्यता’ कहते हुए भारत के आर्थिक कायाकल्प के निमित्त स्वदेशी उद्योग शिल्प को अपनाए जाने का प्रस्ताव रखा था। यही कारण था कि 1920 से अपने नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता-संघर्षों में जहां उनका ध्यान स्वराज्य-प्राप्ति पर रहा, वहीं वे रचनात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत खादी के प्रयोग द्वारा स्वदेशी उद्योग-शिल्प का भी प्रचार करते रहे। लेकिन उनके इस आग्रह से नेहरू, जिन्हें 1941 में गांधी अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे, सहमत नहीं थे। अतएव 1945 के आसपास जब आजादी मिलने की संभावना बढ़ गई तो गांधी ने आजाद भारत के कायाकल्प करने की दिशा को तय कर लेना आवश्यक समझा। इस बाबत उन्होंने 5 अक्टूबर 1945 को नेहरू को एक लंबा पत्र हिंदी में लिखा उनका जोर इस बात पर था कि ‘‘मैं यह मानता हूं कि अगर हिंदुस्तान को सच्ची आजादी पानी है और हिंदुस्तान के मारफत दुनिया को भी, तब आज नहीं, तो कल देहातों में ही रहना होगा। कई अरब आदमी शहरों में और महलों में सुख से और शांति से कभी नहीं रह सकते, न एक दूसरे का खून करके, मायने हिंसा से, न झूठ से यानी असत्य से। सिवाय इस जोड़ी के (यानी सत्य और अहिंसा) मनुष्य जाति का नाश ही है, उसमें जरा भी शक नहीं है। उस सत्य और अहिंसा का दर्शन हम देहातों की सादगी में ही कर सकते हैं।’’

नेहरू ने 9 अक्टूबर 1945 को लिखे जबावी पत्र में कहा- ‘‘मैं नहीं समझ पाता कि क्यों गांव अनिवार्यत: सत्य और अहिंसा की मूर्ति ही हों। गांव आमतौर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होता है और पिछड़े वातावरण में प्रगति नहीं की जा सकती।’’ यहीं से पश्चिम की ‘शैतानी सभ्यता’ से भारत को बचाने का गांधी का मंसूबा परास्त होने लगता है। गांधी ने जितना ही गंभीर होकर अपना दृष्टिकोण पत्र में पेश किया था, नेहरू ने उसे उतने ही अगंभीर रूप में लेते हुए उनकी बातों को नजरअंदाज किया। इस संबंध में गौरतलब है सुधीर चंद्र की यह टिप्पणी: ‘‘गांधी ने जिस बड़े विमर्श के इरादे से अपना 5 अक्टूबर का पत्र लिखा था देश के भावी प्रधानमंत्री को, वह विमर्श असल में हुआ ही नहीं। यह गांधी के पराभव का निर्णायक क्षण था। निश्चित हो गया था कि देश गांधी के रास्ते पर नहीं चलेगा। वही निश्चय अभी तक अमल में है।’’ आजादी के बाद के इन सत्तर वर्षों में हमारे शासकों ने भाषा, शिक्षा, उद्योग, शिल्प, ग्रामोद्योग, ग्राम-स्वराज, सांप्रदायिक सौमनस्य आदि सभी क्षेत्रों में गांधी के सपनों को कितना पीछे छोड़ दिया है यह बताने की जरूरत नहीं।

हालांकि नवंबर 1963 में लोकसभा में बोलते हुए नेहरू ने स्वीकार किया था कि ‘गांधी का रास्ता छोड़ कर गलती की है’ लेकिन मसल यही चरितार्थ हुई ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’। गांधी ने जिन स्वदेशी, भारतीय संस्कृति से पोषित जीवन-मूल्यों की खेती जीवन पर्यन्त की थी, उसे चुगने का जो सिलसिला नेहरू सरकार ने शुरू किया, वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। जो भी सरकारें आर्इं, गांधी की खेती चरने में कोताही नहीं की। सचमुच अगर हम भारत को विदेशीपन का उपनिवेश होने से बचाना चाहते हैं, तो इस परास्त होते जा रहे गांधी को थामना होगा, उनके द्वारा आचरित जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाना होगा।

 

 

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