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स्वराज की राह पर

वर्ष 1915 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे। उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने सुझाव दिया कि भारत आकर शीघ्रता में कोई काम शुरू न करें।
Author January 30, 2016 03:09 am
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का फाइल फोटो

राजीव रंजन गिरी

वर्ष 1915 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे। उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने सुझाव दिया कि भारत आकर शीघ्रता में कोई काम शुरू न करें। पहले भारत-भ्रमण करें। मुल्क की मनोभूमि पढ़ें। उसके बाद सार्वजनिक सवालों पर, खासकर राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के बारे में, अपनी राय बनाएं और अपने आगामी कार्यकलापों की रणनीति भी। गुरु के परामर्शानुसार गांधीजी देश के विभिन्न हिस्सों में गए। कई जगह उनके सम्मान में आयोजन हुए। लोगों से संवाद किया। महात्मा मुंशीराम, जो स्वामी श्रद्धानंद के नाम से लोकप्रिय हैं और कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर से भी मिले।

महामना मदनमोहन मालवीय के निमंत्रण पर गांधीजी बनारस पहुंचे। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के बाईसवें वार्षिकोत्सव में भी शामिल हुए। कश्मीर के महाराजाधिराज के सभापतित्व में संपन्न इस समारोह में गांधीजी ने भारतीय भाषाओं की असीम उन्नति की जरूरत पर बल दिया। युवकों से हिंदी में पत्र-व्यवहार करने का आग्रह किया। 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद््घाटन हुआ। कार्यक्रम में वायसराय भी शामिल हुए थे। दरभंगा के राजा सर रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में संपन्न समारोह में मालवीयजी के ‘विशेष आग्रह’ पर गांधीजी ने भाषण दिया।

साल भर के देश-भ्रमण के दरम्यान गांधीजी ने जो मौन रखा था वह ऋषियों का समाधिस्थ मौन नहीं था, जिसमें एक जगह बैठ कर अंत:प्रज्ञा का अभिज्ञान किया जाता है। गांधी ने इस कालखंड में खूब यात्राएं की। हर क्षेत्र के लोगों से मिले। साहित्य, राजनीति, धर्म, अध्यात्म, समाज सुधार जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में काम कर रहे सचेत लोगों के साथ चर्चाएं की। उनके विचारों को जाना, सुना और गुना।
यह भाषण इस मायने में भी ऐतिहासिक महत्त्व का था कि इसमें गांधीजी ने अपनी धारणा मजबूती के साथ जाहिर की। इसमें स्वराज आंदोलन की प्रकृति की समीक्षा की गई थी और संघर्ष की नई संस्कृति की प्रस्तावना भी। मंच पर मौजूद एनी बेसेंट और अध्यक्षता कर रहे दरभंगा राजा रामेश्वर सिंह सहित गणमान्यों को गांधीजी की बातें आपत्तिजनक महसूस हुर्इं। महामना मदनमोहन मालवीय को छोड़ सभी मंच से चले गए। नतीजतन गांधीजी का भाषण अधूरा रह गया।

गांधीजी ने कहा कि इस पवित्र नगर में, महान विद्यापीठ के प्रांगण में, अपने देशवासियों से एक विदेशी भाषा में बोलना शर्म की बात है। आशा प्रगट की कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा। गांधीजी ने वहां मौजूद लोगों से सवाल किया कि क्या कोई स्वप्न में भी यह सोच सकता है कि अंगरेजी भविष्य में किसी भी दिन भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है? श्रोताओं ने ‘नहीं, नहीं’ कह कर जवाब दिया। उन्होंने भारत की ख्याति का कारण आध्यात्मिकता को बताया। यह कहा कि बातें बघार कर आध्यात्मिकता का संदेश नहीं दिया जा सकता। इसके लिए कर्म और शब्द में सामंजस्य स्थापित करना होगा। यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस और मुसलिम लीग क्या-कुछ कर पाती हैं, इसमें मेरी उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी इस बात में कि विद्यार्थी-जगत क्या करता है, जनता क्या करती है। इसमें गांधीजी की आगामी नीति- स्वाधीनता संग्राम की अगुआई के दौरान जिसे हकीकत बननी थी- की झलक मिलती है।
कांग्रेस की कमान गांधीजी ने संभाली, उससे पहले कांग्रेस बैरिस्टर, जमींदार सरीखे उच्च वर्ग के लोगों तक महदूद थी। गांधीजी ने इसे किसानों-मजदूरों से जोड़ा। पूरी साफगोई से कहा कि ‘कोई भी कागजी कार्रवाई हमें स्वराज नहीं दे सकती।’ स्वराज पाने के लिए आचरण को कसौटी बनाना, नितांत मौलिक बात थी। स्वराज के सवाल के साथ गांधीजी ने स्वच्छता का प्रश्न जोड़ा। इसके माध्यम से व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक आचरण का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि अगर हमारे मंदिर भी सादगी और सफाई के नमूने न हों तो हमारा स्वराज कैसा होगा? स्वराज का प्रश्न उठाने वाले लोगों की निगाहों से ऐसे मुद्दे बहुत दूर थे। पर गांधीजी के हिसाब से ये तमाम मुद््दे स्वराज के बुनियादी प्रश्न थे। इसके लिए जिम्मेवार श्रेष्ठता-ग्रंथि के रहते स्वराज नहीं आ सकता। ये परेशानियां अंगरेजों के कारण पैदा नहीं हुई थीं। इसके लिए भारतवासी जिम्मेवार थे। गांधीजी के लिए ये चिंताजनक बातें थीं; स्वराज की राह में रुकावट भी। स्पष्ट है कि गांधी जिस ‘स्वराज’ की बात कर रहे थे, वह अलहदा था और विशिष्ट भी। इतिहास के उस दौर में सक्रिय विचार-समूहों में स्वराज की अपनी-अपनी कल्पना थी। अपने-अपने मोर्चे पर स्वराज के ये तमाम तसव्वुर एक स्तर पर एक-दूसरे से संबद्ध थे तो दूसरे स्तर पर असंबद्ध भी।

दरभंगा के राजा सर रामेश्वर सिंह और कई वक्ताओं ने अपने संबोधन में गरीबी के सवाल पर जोर दिया था। भाषण में गरीबी के प्रति चिंता और जीवन में अश्लील प्रदर्शन एवं विलासिता गांधी को स्वीकार्य नहीं थी। उनके हिसाब से यह स्वराज की भावना के प्रतिकूल था।
इतिहास के उस दौर में जो तबके स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआई कर रहे थे, उन्हें आजादी के लिए अपर्याप्त कह कर गांधीजी आंदोलन की प्रकृति में बदलाव लाने का सुझाव दे रहे थे। वे किसानों का जिक्र कर बहुसंख्यक आबादी को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने पर बल दे रहे थे। मुट्ठी भर वकील, डॉक्टर या संपन्न जमींदार- जो कई मायनों में साम्राज्यवादी व्यवस्था के मजबूत अंग भी थे- स्वाधीनता आंदोलन को कितने दूर तक ले जा सकते थे?

स्वाधीनता आंदोलन के तत्कालीन नेतृत्व को आजादी के लिए अपर्याप्त कहने वाले गांधीजी उस दौर तक अंगरेजी सत्ता को देश के लिए घातक नहीं मानते थे। जो लोग उस हुकूमत को भगाना चाहते थे, वे देश की जनता को आंदोलन से जोड़ने की जरूरत नहीं समझ पाए थे। लिहाजा यह बात और भी महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। गांधीजी ने पूरी साफगोई से कहा था कि ‘‘यदि मुझे इस बात का विश्वास हो जाए कि अंगरेजों के रहते हुए इस देश का कदापि उद्धार न होगा- उन्हें यहां से निकाल ही देना चाहिए- तो उनसे अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर यहां से चलते होने की प्रार्थना करने में, मैं कभी आगा-पीछा न करूंगा और मुझे विश्वास है कि अपनी दृढ़ धारणा के समर्थन में मरने को भी तैयार रहूंगा, ऐसा मरण ही मेरी सम्मति में प्रतिष्ठा का मरण है।’’

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के दौरान स्थान-स्थान पर लगाई गई खुफिया पुलिस को देख गांधी बेचैन थे। आयोजन में वाइसराय शामिल हुए थे। उनकी सुरक्षा के मद्देनजर यह तैनाती हुई थी। गांधी के मुताबिक इसका कारण था-अविश्वास। भारतीय लोगों के प्रति शासकों में अविश्वास। खुफिया पुलिस की तैनाती गांधी के हिसाब से मरणांतक दुख है। वे कहते हैं कि इस प्रकार मरणांतक दुख भोगते हुए जीने की अपेक्षा क्या लार्ड हार्डिंग के लिए सचमुच ही मर जाना अधिक श्रेयस्कर है। गांधीजी यह भी पूछते हैं कि खुफिया पुलिस का जुआ हमारे सिर पर लादने का क्या कारण है? जवाब में इसके लिए हिंसक अराजक दल को जिम्मेदार मानते हैं। गांधी खुद को अराजक ही कहते हैं, अहिंसक अराजक। वे हिंसक अराजक दल की उत्पति का कारण मानते हैं- उतावलेपन का नशा और भय।

गांधी के मन में हिंसक अराजकतावादियों के स्वदेश-प्रेम के प्रति आदर-भाव था। वतन के लिए खुशी-खुशी मरने वाले जज्बे की वे इज्जत करते थे। फिर भी उनके मार्ग से घोर असहमति रखते थे। गांधी की मनोभूमि से वाकिफ कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि वे जो सभ्यता निर्मित करना चाहते थे, उसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी। भले ही वह हिंसा किसी के भी प्रति हो। हमारी सभ्यता-संस्कृति का विकास जिस दिशा में हुआ है, उससे यह मिथ्या धारणा पुष्ट हुई है कि हिंसा ताकत का पर्याय है; कि हिंसा का मार्ग मजबूती की मिसाल है; कि हिंसा करने वाले पराक्रमी होते हैं। गांधीजी आजीवन अपने शब्द और कर्म के जरिये इसका प्रतिलोम रचते रहे हैं। यह समझाते रहे हैं कि अहिंसा वीरों का मार्ग है; कि अहिंसा मजबूरी में अपनाया जाने वाला साधन नहीं है; कि अहिंसा की राह पर पराक्रमी और निडर लोग ही चल सकते हैं।
अहिंसक संस्कृति की रचना ही मनुष्यता का लक्ष्य होनी चाहिए। गांधी हिंसा के उत्स की असली वजह कायरता को भी समाप्त करना चाहते थे। भय के कारण ही हिंसा पनपती है। निहायत भिन्न परिस्थितियों में भी हिंसा के उत्स का कारण एक ही होता है- भय। भले ही वह भिन्न-भिन्न तरह का भय हो। गांधी अभय-संस्कृति रचना चाहते थे; जिसमें कोई किसी से भयभीत न हो। हिंसा से हासिल स्वराज से अहिंसक संस्कृति के पनपने के लिए आवश्यक खाद-पानी मुमकिन नहीं है।

गांधीजी अपने भाषण में, बंग-भंग में, हिंसक आंदोलनकारियों के दावे की चर्चा कर रहे थे। ऐन तभी मंच पर बैठी एनी बेसेंट ने हस्तक्षेप करते हुए भाषण शीघ्र समाप्त करने के लिए कहा। नागवार लगने वाली बात थी- हिंसक आंदोलनकारियों की चर्चा के पूर्व की बात; जिसमें वे देश का उद्धार न होने की समझ आने पर, अंगरेजों से बोरिया-बिस्तर समेट कर जाने के लिए कहने और इसके लिए मरने को भी तत्पर रहने को कह रहे थे। साथ ही हिंसक आंदोलनकारियों के स्वदेश प्रेम और इसके लिए मृत्यु को गले लगाने के प्रति सम्मान की चर्चा। युवजनों के बीच सार्वजनिक सभा में ऐसी बातें कहने-सुनने से वाकिफ नहीं था तत्कालीन नेतृत्वकारी तबका। वह भी ऐसे आयोजन में जिसमें ब्रिटिश-सत्ता के प्रतिनिधि शिरकत कर रहे हों! यहां तक पहुंच कर गांधी के भाषण की दिशा साफ हो चुकी थी। बेसेंट सरीखी प्रबुद्ध शख्सियत इसे समझने में चूक नहीं सकतीं!

 

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