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गैरसैण: सोलह साल से भ्रमजाल

उत्तराखंड को वजूद में आए सोलह साल हो चुके हैं। इन सोलह सालों में सूबे की जनता तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव देख चुकी है।

उत्तराखंड को वजूद में आए सोलह साल हो चुके हैं। इन सोलह सालों में सूबे की जनता तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव देख चुकी है। लेकिन राज्य की जनता के सामने सूबे की राजधानी समेत कई सवाल ज्यों के त्यों आज भी खड़े हैं। हर विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड की स्थायी राजधानी और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन की समस्या का निपटारा करने के वादे कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने चुनावी घोषणापत्र में जोर-शोर से करते चले आ रहे हैं। लेकिन अब तक कोई भी सरकार पहाड़ों से पलायन रोकने और स्थाई राजधानी के सवाल को हल करने के लिए स्पष्ट नीति नहीं बना पाई है। स्थाई राजधानी के मुद्दे को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने भ्रमजाल ही फैलाया है।
1992 में उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के वक्त उत्तराखंड के आंदोलनकारियों ने गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने का ऐलान कर यहां स्थाई राजधानी का शिलापट भी लगा दिया था। यह पेशावर कांड के नायक चंद्र सिंह गढ़वाली की जन्मभूमि है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्र की जनता का भावनात्मक संबंध गैरसैण से है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पेशावर में पठानों और बलूचों ने बगावत कर दी थी। तब अंग्रेज हुक्मरानों ने वहां तैनात गढ़वाल रेजीमेंट को बागी पठानों और बलूचों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे। गढ़वाल रेजीमेंट की अगुआई कर रहे चंद्र सिंह गढ़वाली ने यह फरमान मानने से इनकार कर दिया था और चंद्रसिंह गढ़वाली समेत गढ़वाल राइफल के सभी जवानों ने अपनी बंदूक पलट दी। इसके बाद ब्रितानी हुकूमत ने चंद्रसिंह गढ़वाली का कोर्ट मार्शल किया और उन पर मुकदमा चलाया और उन्हें सजा दी गई। गैरसैण को कुमांऊ और गढ़वाल का केंद्र माना जाता है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ने वाली क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल और वामपंथी दलों के अलावा अन्य किसी राजनीतिक दल ने गैरसैण को उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाने को लेकर साफगोई नहीं दिखाई है। उत्तराखंड क्रांति दल के चुनावी घोषणापत्र में हर बार गैरसैण को सूबे की स्थाई राजधानी बनाए जाने की मांग को प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है।
1994 में अविभाजित उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने उत्तराखंड राज्य गठन के लिए रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। कौशिक समिति की रिपोर्ट आने के बाद 24 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में उत्तराखंड राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ था। कौशिक समिति ने गैरसैण को उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाने की सिफारिश की थी। 9 नवंबर 2000 में उत्तराखंड राज्य का निर्माण केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने कर दिया। लेकिन उत्तराखंड की स्थाई राजधानी के मामले को उस वक्त सरकार ने लटकाते हुए देहरादून को सूबे की अंतरिम राजधानी घोषित कर दिया।

उत्तराखंड को उसके जन्म के समय से ही अंतरिम राज्य सरकार और अंतरिम राजधानी सौगात में मिली। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड को निर्वाचित सरकार तो मिल गई लेकिन स्थाई राजधानी आज तक नहीं मिल पाई है। उत्तराखंड की अंतरिम सरकार के मुखिया और उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने 11 जनवरी 2001 को हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में उत्तराखंड की स्थाई राजधानी का समाधान खोजने के लिए एक सदस्यीय राजधानी चयन आयोग बनाया। इस आयोग के कार्यकाल को 11 बार बढ़ाया गया। आखिरकार आयोग ने 11 अगस्त 2008 को अपनी सिफारिशें उस समय की भाजपा की भुवनचंद्र खंडूरी सरकार को सौंपी। आयोग की इस रिपोर्ट को 13 जुलाई 2009 को विधानसभा के पटल पर रखा गया था।

आयोग ने उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाने के लिए पांच जगहों का जिक्र किया था। जिनमें देहरादून, गैरसैण, काशीपुर, ऋषिकेश और रामनगर शामिल थे। आयोग की इस रिपोर्ट में देहरादून स्थाई राजधानी के लिए उपयुक्त बताया गया और गैरसैण को भौगोलिक आधार पर अनुपयुक्त बताया गया। आयोग की यह रिपोर्ट कांग्रेस और भाजपा के लिए गले की फांस बनी रही है क्योंकि इन दोनों पार्टियों को गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने का भय इसलिए सताता है कि उत्तराखंड की विधानसभा की 70 सीटों में 35 सीटें सूबे के मैदानी क्षेत्रों में पड़ती हैं। जिनमें तीन मैदानी जिलों हरिद्वार में 11, देहरादून 10 और उधमसिंह नगर में 9 विधानसभा सीटें पड़ती हैं। इसके अलावा नैनीताल जिले की 4 सीटें और पौड़ी गढ़वाल की एक विधानसभा सीट मैदानी क्षेत्र में पड़ती है। कुल मिलाकर 35 विधानसभा सीटें मैदानी क्षेत्रों में हैं। गैरसैण को यदि भाजपा और कांग्रेस सरकारें स्थाई राजधानी बनाने का ऐलान करती हैं तो इन दोनों दलों को मैदानी क्षेत्रों से नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी। यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा गैरसैण को उत्तराखंड की स्थाई राजधानी बनाने का कभी भी खुलकर ऐलान नहीं करती हैं।

2012 में जब उत्तराखंड में दूसरी बार कांग्रेस की सरकार बनी तो गैरसैण को लेकर सरकार ने बहुत अधिक सक्रियता दिखाई। जिससे लगा कि गैरसैण को 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले सूबे की कांग्रेस सरकार स्थायी राजधानी घोषित कर देगी। दो बार राज्य की कांग्रेस सरकार ने विधानसभा सत्र भी आयोजित किए और दो बार कैबिनेट की बैठक भी पिछले 5 सालों में गैरसैण में की गई। लेकिन कांग्रेस की सरकार गैरसैण को उत्तराखंड की स्थाई राजधानी घोषित करने से बचती रही। भाजपा ने भी गैरसेण को लेकर बहुत हल्ला मचाया लेकिन स्थाई राजधानी को लेकर अपना रुख साफ नहीं किया। नतीजतन उत्तराखंड की जनता को गैरसैण की स्थाई राजधानी मिलने के बजाए गैरसैण में विधानसभा भवन, राज्य अतिथि गृह और विधायक निवास के झुनझुने के अलावा कुछ नहीं मिला और उत्तराखंड की जनता फिर एक बार ठगी सी रह गई।

इस बार कांग्रेस और भाजपा ने अपने घोषणापत्र में गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने को लेकर भ्रमजाल फैलाया है। भाजपा ने अपने दृष्टिपत्र में कहा है कि भाजपा गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के पक्ष में है। सत्ता में आने पर भाजपा स्थायी राजधानी के मुद्दे का हल विधानसभा में निकालने का प्रयास करेगी। कांग्रेस ने अपने संकल्पपत्र में गैरसैण को उत्तराखंड की जनता की आस्था का प्रतीक बताया है, साथ ही गैरसैण में मुख्यमंत्री कार्यालय खोलने जिसमें एक हफ्ते तक सरकारी काम करने और गैरसैण में विधानसभा का नियमित सत्र आयोजित करने का वादा किया है। लेकिन सूबे के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों ने एक बार फिर गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने के मुद्दे से किनारा कर लिया है।

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