December 04, 2016

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राजनीति बनाम रूढ़िवादिता

पिछले दिनों शायरा बानो केस की सुनवाई के बीच अदालत को भेजे गए हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक पर असहमति जताते हुए एक समय में तीन तलाक और एक से अधिक शादियों पर रोक लगाने की मंशा जताई।

Author October 22, 2016 03:45 am

पिछले दिनों शायरा बानो केस की सुनवाई के बीच अदालत को भेजे गए हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक पर असहमति जताते हुए एक समय में तीन तलाक और एक से अधिक शादियों पर रोक लगाने की मंशा जताई। इसे लेकर पूरे देश में बहस शुरू हो गई है। एक ओर मुसलिम रूढ़िवादी धार्मिक नेता और मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे अपने मजहबी मामलात में दखल मान रहा है और पूरे देश में इसे लेकर आंदोलन चलाने की बात कर रहा है। दूसरी ओर, मुसलिम बुद्धिजीवी पर्सनल लॉज में सुधार की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। सियासी दल भी इस होड़ में किसी से पीछे नहीं हैं। आने वाले दिनों में पांच राज्यों के चुनावों पर इसका कितना असर पड़ता है यह तो समय बताएगा। लेकिन मामले की गंभीरता व सामाजिक अहमियत को देखते हुए यह जानना भी जरूरी है कि जिस धार्मिक ग्रंथ का हवाला देते हुए रूढ़िवादी धर्म गुरु इतना तूफान उठा कर आम जनता को भ्रमित कर रहे हैं, वह तलाक के बारे में क्या कहता है।
कुरआन की सूरा बकर, सूरा नीसा और सूरा तलाक तीनों सूरा (श्लोक) में स्पष्ट शब्दों में आदेश दिया गया है, ‘तुम लोग अपनी स्त्रियों को तलाक दो तो उनकी इद्दत (तीन महीने कुछ दिन जिनमें बेवा या तलाक दी हुई स्त्री किसी दूसरे पुरुष के संपर्क में नहीं आ सकती) लिए दो, और तलाक के जमाने की गिनती ठीक-ठीक करो और जब इद्दत खत्म होने लगे तो उन्हें अपने निकाह में रखो या भली तरह से अलग हो जाओ’।

इन तीन महीनों में अगर दोनों के बीच समझौता होता है तो पति-पत्नी का रिश्ता रहेगा। अगर कुछ दिन बाद दोबारा पति तलाक देता है तो यह प्रक्रिया फिर दोहराई जाएगी। लेकिन तीसरी बार तलाक दिए जाने पर वह अंतिम तलाक होगा जिसके बाद पति-पत्नी का संबंध हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। अगर पहले तलाक के तीन महीने बाद भी पति अपने फैसले पर कायम रहता है तो भी तलाक हो जाएगा। तीन महीने का यह समय पत्नी को पति के घर में ही गुजारना होगा। इसी के साथ कुरआन यह भी कहता है कि अगर पति-पत्नी के बीच मनमुटाव हो जाए तो दोनों के रिश्तेदारों की ओर से दो ईमानदार लोगों को नियुक्त करो ताकि वह दोनों में समझौता करा दे। तलाक और इद्दत के समय के बाद समझौता होने की हालत में भी दोनों ओर से गवाह होने चाहिए। इसके अलावा माहवारी के दिनों में भी तलाक नहीं हो सकता। अगर गर्भवती स्त्री को तलाक दिया गया हो तो उसकी इद्दत का समय बच्चे के जन्म तक होगा, चाहे वह तीन महीने दस दिन से अधिक हो, और इस बीच तलाक वापस हो सकता है।

कुरआन स्पष्ट शब्दों में तलाक के लिए व्यवस्था बता रहा है। दुनिया के बाईस मुसलिम देशों में एक समय में तीन तलाक पर अंकुश लगाया गया है, जिनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ईरान, तुर्की सहित दूसरे बहुत से देश शामिल हैं, जहां तलाक के लिए पूरी कानूनी कार्रवाई से गुजरना पड़ता है और दूसरी शादी भी शर्तशुदा है। फिर भी मुसलिम धर्मगुरु अपनी बात पर अड़े हैं। वह भी इस हालत में कि उनके पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसमें तलाक के बाद औरत एक सम्मानित जीवन जी सके। 1985 में शाह बानो केस के बाद भी मुसलिम नेताओं ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई। बल्कि समय-समय पर सरकारों द्वारा बनाए जाने वाले कानूनों पर भी धर्म के नाम पर असहमति जताते रहे। आम मुसलिम जनता अपने धार्मिक मामलात के लिए धर्मगुरुओं की ओर देखती है जो अपनी रूढ़िवादी सोच और पैतृक व्यवस्था में विश्वास के कारण भारत में पर्सनल लॉ में किसी सुधार की बात सुनना भी नही चाहते।

दूसरी ओर, केंद्र में भाजपा सरकार की नीयत भी कुछ साफ नहीं है। कॉमन सिविल कोड भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में शामिल करके भाजपा बहुसंख्यक जनता का वोट हासिल करना चाहती है। लेकिन एक ऐसे देश में जहां 300 से अधिक पर्सनल लॉ हों वहां कौन सा कानून ‘कॉमन’ माना जाए, इस पर कोई बात नहीं करती। जैसे यह तय हो कि कॉमन सिविल कोड का मतलब बहुसंख्यक जनता के पर्सनल लॉ को लागू करना हो। इस बार भी जैसे ही कोर्ट ने सरकार से तीन तलाक पर जवाब मांगा, लॉ कमीशन ने तुरंत एक प्रश्नपत्र जारी कर कॉमन सिविल कोड पर जनता की राय मांग ली। इन दोनों बिंदुओं का एक साथ होना सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है। कॉमन सिविल कोड पर बहस की जरूरत के साथ ही सभी समुदायों को विश्वास में लेना भी जरूरी है। अगर धर्मगुरु और सरकार दोनों मुसलिम स्त्रियों की हालत सुधारने में रुचि रखते हैं तो उन्हें रूढ़िवादिता और राजनीति से ऊपर उठना होगा।

नजमा रहमानी
असिस्टेंट प्रोफेसर, उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

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First Published on October 22, 2016 3:36 am

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