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महिला समानता का संघर्ष

इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के ताजा आंकड़े बताते हैं 79.8 प्रतिशत महिलाओं को अस्पताल जाने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है।
Author March 8, 2017 04:29 am
भारत में महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती जन्म लेना है। कोख में खत्म होने से अगर वे बच भी जाएं, तो विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि बेटियों को बेटों की अपेक्षा कम भोजन दिया जाता है।

‘महिलाएं बौद्धिक रूप से पुरुषों के बराबर होती हैं। महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलना चाहिए, क्योंकि वे कमजोर हैं, छोटी हैं।’ यह वक्तव्य वारसा यूरोपीय संसद में पोलैंड के एक सांसद ने दिया। यह बयान, हमें याद दिलाने के लिए काफी है कि महिला समानता का संघर्ष अभी बहुत देर तक चलेगा। यह कोरा मिथ है कि महिलाओं में जैविक रूप से भारी और कठोर काम करने की क्षमता नहीं होती। 1930 के उत्तरार्ध और 1960 के मध्य में अंत:सांस्कृतिक आंकड़ों में स्वीकार किया गया था कि पुरुष, महिलाओं को सौंपे जाने वाले कार्य करने में अक्षम हैं और स्त्रियां पुरुषों के कार्यों को नहीं कर सकतीं। कुछ समाजों में आज भी बुनाई, कताई और खाना बनाने जैसे घरेलू कार्य पुरुष करते हैं, वहीं मोतियों के लिए गोताखोरी करना, डोंगी चलाना और घर बनाने जैसे साहसिक और कठोर कार्य स्त्रियां करती हैं। आदिम समाज की यह व्यवस्था आधुनिक समाजों में नहीं है और अगर अपवाद स्वरूप ऐसा हुआ भी, तो स्त्री को वह प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई, जो पुरुषों को प्राप्त होती रही है और इसका मुख्य कारण पुरुषों का वर्चस्व है।

दरअसल, पुरुषों और स्त्रियों के मध्य व्याप्त असमानताएं प्राकृतिक नहीं, सामाजिक हैं, क्योंकि ऐसा कोई जैविक कारण नहीं होता, जिससे यह स्वीकार किया जाए कि सार्वजनिक शक्ति संपन्न पदों पर स्त्रियों की उपस्थिति कम होना प्राकृतिक है। अगर स्त्रियां वाकई जैविक रूप से परिवार का मुखिया बनने या फिर पारिवारिक संपत्ति का उत्तराधिकार पाने के लिए अयोग्य थीं, तो फिर मातृवंशीय समाज वर्षों से सफलतापूर्वक क्यों चलते रहे? स्त्रियों की समानता के अधिकार की सबसे पहले मांग अमेरिकी क्रांति के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में उठी। उन्होंने स्त्रियों के मताधिकार और संपत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए इसे संविधान में सम्मिलित करने के लिए दबाव डाला, पर प्रभुत्वशाली वर्ग के विरोध के कारण यह संभव नहीं हुआ।समानता के अधिकार को लेकर संगठित स्त्री आंदोलन फ्रांसीसी क्रांति के दौरान शुरू हुए। समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ्रांस में ही शुरू हुआ, वहीं क्रांतिकारी महिला क्लबों के रूप में स्त्रियों का पहला संगठन अस्तित्व में आया, जिसने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में भागीदारी निभाते हुए मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किए जाने चाहिए।

ओलिंप द गाउजेस ने ‘मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा’ के मॉडल पर ‘स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा’ तैयार की। इस घोषणापत्र में ‘स्त्रियों पर पुरुषों के शासन’ का विरोध किया गया। पर ये सारे प्रयास पुरुषसत्तात्मक समाज ने दबा दिए। विश्व भर के महिला संगठनों ने मैक्सिको शहर, कोपेनहेगन, नैरोबी और बेजिंग में हुए अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलनों में अपने विकास एजेंडा में दृढ़ता से समानता के मुद्दों को उठाया। 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं की स्थिति पर एक आयोग गठित किया। फलस्वरूप विश्व के अधिकतर देश महिला समानता के मुद्दे को लेकर जागृत हो रहे थे। विभिन्न मंचों से लेकर किताबों और अखबारों में इस विषय को उठाया जा रहा था।भारत में तमाम सामाजिक सुधार आंदोलनों के साथ कुछ ऐसी लेखिकाओं ने अपनी कलम के जरिए महिला समानता का प्रश्न उठाया, जो किसी उच्च पद पर नहीं थीं। 1882 में ‘स्त्री पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक महाराष्ट्रीय गृहिणी ताराबाई शिंदे ने लिखी, जिसमें उन्होंने पुरुष प्रधान समाज द्वारा अपनाए गए दोहरे मापदंडों का विरोध किया। विज्ञान को पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र मानने वाली समाज की सोच को तब आघात लगा जब 1908 में भारत में बेगम रुकैया ने ‘सुल्तानाज ड्रीम’ नामक पुस्तक लिखी।

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी तक निरंतर महिलाओं की बौद्धिकता को शंका से देखा जा रहा था। 1963 तक अधिकतर अमेरिकी न तो यह विश्वास करते थे कि लैंगिक समानता संभव है और न ही वे इसकी आवश्यकता समझते हैं। यहां तक कि खुद महिलाएं ऐसा विश्वास करती थीं कि घर के महत्त्वपूर्ण निर्णय घर के पुरुष सदस्यों द्वारा लिए जाने चाहिए। 1962 में मिशिगन विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में दो तिहाई महिलाओं ने ये विचार रखे थे। 1977 तक दो तिहाई अमेरिकी विश्वास करते थे कि पुरुष को बाहर का काम देखना चाहिए और स्त्रियों को घरेलू जिम्मेदारी। पर स्त्रियों की सामाजिक और लैंगिक समानता के स्वरों ने जोर पकड़ा और 1994 तक दो तिहाई अमेरिकियों ने लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन का विरोध करना शुरू किया। संयुक्त राष्ट्र ने अपने 2015 के बाद के विकास एजेंडे के पूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया भर में व्यापक अभियान शुरू किया। इस अभियान का संदेश है: ‘दुनिया अपने विकास लक्ष्यों को तब तक सौ प्रतिशत हासिल नहीं कर सकती जब तक कि इसके पचास प्रतिशत लोगों- यानी महिलाओं के साथ सभी क्षेत्रों में पूर्ण और समान प्रतिभागियों के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है।’ आर्थिक सशक्तीकरण को महिला समानता के एक आधार बिंदु के रूप में देखा जाता रहा है। संरचनात्मक समायोजन के प्रतिक्रिया स्वरूप बीते दशकों में महिलाएं खुद अपनी आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही हैं।

सामाजिक उत्तरदायित्व, घरेलू रख-रखाव और आय उत्पादक कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। पर इसके चलते उन पर गहरा दबाव भी बढ़ा है। ‘असमान वेतन’ महिला समानता पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न है। आर्थिक हिस्सेदारी और महिलाओं के लिए अवसरों के मामले में अब भी साठ प्रतिशत लैंगिक गैर-बराबरी है। विश्व आर्थिक फोरम में लैंगिक समानता अध्ययन की 2015 की रिपोर्ट बताती है कि एक सौ बयालीस देशों की सूची में भारत एक सौ चौदहवें स्थान पर है। राजनीतिक सत्ता, स्त्री समानता का एक और महत्त्वपूर्ण आधारबिंदु है। इस संदर्भ में भी भारतीय महिलाओं के संघर्ष की लंबी यात्रा है। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (आइपीयू) की रिपोर्ट बताती है कि भारत की संसद या विधानसभाओं में महिला जनप्रतिनिधियों की काफी कम उपस्थिति उनके प्रति भेदभावपूर्ण राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है। आइपीयू की रिपोर्ट 2015 के मुताबिक इस मोर्चे पर भारत को एक सौ पांचवां स्थान प्राप्त है। इस सूची में पहले दस नंबर पर रवांडा, बोलीविया, अंडोरा, क्यूबा, इक्वाडोर और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश हैं, जो स्पष्ट करते हैं कि महिला समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से महिलाओं के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए आर्थिक सबलता से कहीं अधिक वृहद दृष्टिकोण की आवश्कता है।

भारत में महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती जन्म लेना है। कोख में खत्म होने से अगर वे बच भी जाएं, तो विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि बेटियों को बेटों की अपेक्षा कम भोजन दिया जाता है। चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी, शिक्षा के स्तर पर बेटे और बेटियों के बीच अंतर साफ देखा जा सकता है। बेटियों को उन विषयों को चुनने को कहा जाता है, जिनसे विवाह के बाद उनकी घरेलू जिम्मेदारियां बाधित न हों। यों तो भारतीय संविधान ने, महिलाओं को समानता के तमाम अधिकार दे दिए हैं, पर सच यह है कि उन्हें हर स्तर पर अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। आर्थिक जिम्मेदारियों को बराबर बांटने वाली भारतीय महिलाएं, अपने लिए स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकतीं। इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के ताजा आंकड़े बताते हैं 79.8 प्रतिशत महिलाओं को अस्पताल जाने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार जीवन के आखिरी समय में 37.05 प्रतिशत महिलाएं अस्पताल में भर्ती हुर्इं, वहीं 62.05 प्रतिशत पुरुष अस्पताल में भर्ती हुए। सच तो यह है कि स्त्री की पीड़ा, उसकी इच्छा किसी के लिए कोई मायने नहीं रखती। अपने लिए समानता के मार्ग पर चलने के लिए उसे हर रोज खुद ही कांटे निकालने होंगे।

ऋतु सारस्वत 

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First Published on March 8, 2017 4:29 am

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