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सभ्यता की अधोगामी दिशा

आज विश्व में सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था को औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बदलने में जुटे हैं। यह सिलसिला यूरोप में 1800 ईस्वी के आसपास आरंभ हुआ था। पिछले दो सौ वर्षों में उसने विश्व के आर्थिक भूगोल को पूरी तरह बदल दिया है। यूरोप उस समय तक विश्व की सबसे पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था था। आज अपने […]
Author June 11, 2015 08:31 am

आज विश्व में सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था को औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बदलने में जुटे हैं। यह सिलसिला यूरोप में 1800 ईस्वी के आसपास आरंभ हुआ था। पिछले दो सौ वर्षों में उसने विश्व के आर्थिक भूगोल को पूरी तरह बदल दिया है। यूरोप उस समय तक विश्व की सबसे पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था था। आज अपने अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया जैसे अधिग्रहीत क्षेत्रों के बल पर यूरोपीय जाति विश्व की सबसे संपन्न जाति हो गई है।

इस अभियान में सफलतापूर्वक सम्मिलित होने वाला यूरोपीय जाति से इतर पहला देश जापान था। अब चीन भी सफलतापूर्वक उस दिशा में आगे बढ़ रहा है। आशा की जा रही है कि अगले कुछ दशकों में भारत भी अपनी मंथर गति के बावजूद विश्व की उन्नत और औद्योगीकृत अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

इस तथाकथित आर्थिक प्रगति का स्वरूप क्या है, इसे कुछ अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। 1800 तक यूरोप का एक औपनिवेशिक साम्राज्य के रूप में उदय हो गया था। फिर भी उसके पास भारत या चीन को निर्यात करने के लिए कुछ नहीं था। उस समय तक के व्यापारिक घाटे का भुगतान वह अफ्रीकी दास-व्यापार के मुनाफे और अमेरिका की स्थानीय जनसंख्या के विनाश के बाद वहां की खदानों से निकाले गए सोने के आधार पर कर रहा था।

उसके बाद भारत पर नियंत्रण के पश्चात यहां के राजस्व की बलपूर्वक लूट से उसने व्यापारिक घाटा पूरा किया। इससे भारत पर दोहरी मार पड़ी, जबकि यूरोपीय देशों को अपने यहां त्वरित उत्पादन का औद्योगिक ढांचा खड़ा करने का अवसर मिल गया। फिर उसने भारत समेत सभी जगह स्थानीय उद्योगों को चौपट किया। बीसवीं सदी में इसी के आधार पर वह अपनी नई वैज्ञानिक उपलब्धियों से उत्पादन और संपन्नता को बढ़ा पाया।

इस उथल-पुथल का कोई ठीक आकलन अभी तक किसी ने नहीं किया है। अब तक के विश्व के आर्थिक इतिहास का एक फौरी और यूरोपीय सामग्री को केंद्र बना कर किया गया आकलन अंगस मेडिसन का है। आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से 2007 में छपी उनकी पुस्तक ‘कंटूअर्स आॅफ द वर्ल्ड इकोनामी 1-2030 एडी’ इस तरह का एक मात्र आकलन है। उनके आकलन के अनुसार 1700 तक भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था।

उसके बाद पश्चिमी यूरोप और चीन लगभग बराबर की शक्ति थे। उसके अनुसार तब तक भारत विश्व के एक चौथाई उत्पादन का केंद्र था और भारत और चीन विश्व के आधे से कुछ ही कम उत्पादन का केंद्र थे। आज क्रय शक्ति के आधार पर गणना करें तो भी भारत और चीन का विश्व के कुल उत्पादन में छठवां भाग ही है। भारत तो पांच प्रतिशत से भी कम पर सिकुड़ा हुआ है।

यह स्वाभाविक है कि इस चित्रण से भारत या चीन के स्वाभिमानी लोग उद्वेलित हों और वे कुछ शताब्दियों पहले तक विश्व के आर्थिक तंत्र में उनकी जो स्थिति थी उसे पुन: प्राप्त करने के प्रयास में लगें। यह आकांक्षा ही अब तक उन्हें यूरोपीय जाति के औद्योगिक तंत्र की अनुकृति खड़ी करने के लिए प्रेरित करती रही है।

यूरोप-अमेरिकी अर्थशास्त्री यह कहते हुए इस आकांक्षा को और दृढ़ कर रहे हैं कि 2040 तक चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा और भारत में भी विश्व का बीस प्रतिशत से अधिक उत्पादन हो रहा होगा। इस तरह की एकरेखीय गणनाएं अधिक विश्वसनीय नहीं होतीं। इतिहास प्राकृतिक शक्तियों, सामरिक अहंताओं और उथल-पुथल करने वाली आर्थिक प्रवृत्तियों से बनता-बदलता रहता है।

निश्चय ही भारत और चीन विश्व की सबसे स्वाभाविक और दीर्घजीवी सभ्यताएं रही हैं और उन्हें अपनी वह स्थिति प्राप्त होगी ही। लेकिन यूरोपीय जाति की पिछली दो शताब्दी की सफलता के अंधानुकरण में हमें उसके गढ़े अर्थतंत्र की सभ्यतागत विकृतियों को अनदेखा नहीं कर देना चाहिए।

यूरोप में अर्थतंत्र की मूल विशेषता यह रही है कि वहां समूचे उत्पादन तंत्र पर एक छोटे से अभिजात वर्ग का नियंत्रण रहा है। दो शताब्दी पहले तक वहां अस्सी-पचासी प्रतिशत लोगों को संपत्ति, शिक्षा और जीवन जैसे मूल अधिकार भी प्राप्त नहीं थे। वहां के उत्पादन तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि कोई अपने लिए या अपने आसपास के समाज के लिए पैदा नहीं करता था। जब यूरोप कृषिजीवी था तब भी खेती करने वाला किसान नहीं था, सर्फ यानी भूदास था, और वह मेनर स्वामी या यूरोप के उस जैसे दूसरे स्वामियों के लिए पैदा करता था।

अर्थशास्त्री की भाषा में कहें तो वह उत्पादन तंत्र का पुर्जा भर था। स्वयं स्वतंत्र उत्पादक नहीं था। वह जो पैदा करता था उसका एक भाग उसे दे दिया जाता था। पर वह उस भाग का सहज स्वामी नहीं था। उसे भूदास के रूप में कैसे और कब तक रखा जाएगा यह उसके स्वामी की इच्छा पर निर्भर था।

नई औद्योगिक व्यवस्था में इस संबंध का नया रूप सामने आया। उत्पादनकर्ता नए उत्पादन तंत्र में मजदूर हो गया और कंपनियों के मालिक उसके स्वामी हो गए। जैसे वह पहले अपने या आसपास के समाज के लिए नहीं, दूसरों या बाहरी बाजार के लिए पैदा करता था, वैसे ही इस नए तंत्र में भी वह उन दूसरों के लिए ही पैदा करता है।

उसके उत्पादन तंत्र में पुर्जा भर होने की इस विसंगति की ओर सबसे पहले ध्यान खींचा कार्ल मार्क्स ने। उसने कहा कि अगर वह उत्पादन तंत्र का पुर्जा भर रहेगा तो गुणी उपभोक्ता नहीं हो सकता। गुणी उपभोक्ता वह तभी हो सकता है जब वह गुणी उत्पादक हो। अन्यथा यह तंत्र जो भी पैदा कर रहा है उसका उपभोग सीमित होता जाएगा और उससे आर्थिक मंदी आएगी।
इतिहास ने कार्ल मार्क्स को सही साबित किया। लेकिन इस समस्या से उबरने का जो रास्ता कार्ल मार्क्स ने सुझाया वह यूरोपीय पंूजीवाद से भी बदतर था।

उनके सुझाए सामूहिक स्वामित्व का रूपांतरण निरंकुश साम्यवादी राजतंत्र में ही होना था। कार्ल मार्क्स को दूसरे समाजों का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए अपनी यूरोपीय वैचारिक कोटियों को वह लांघ नहीं पाया।

कार्ल मार्क्स ने पश्चिम के औद्योगिक तंत्र की जिस कमजोरी की ओर ध्यान खींचा था उससे पार पाने के लिए यूरोपीय औद्योगिक तंत्र ने बाजार का विस्तार करना आरंभ किया। इस प्रक्रिया ने आर्थिक उपनिवेशवाद के एक नए दौर को जन्म दिया। हम सभी जानते हैं कि पश्चिम की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने बाजार के विस्तार के लिए कितने बर्बर और अमानुषिक तरीके इस्तेमाल किए हैं। उनके इस व्यवहार पर अब तक बहुत कहा और लिखा जाता रहा है। इसलिए पश्चिमी अर्थतंत्र के कुछ दूसरे पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। इस नए अर्थतंत्र की आंतरिक प्रकृति को समझने से पहले इस मूलभूत तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है।

इस नए अर्थतंत्र ने विश्वभर में पहले से कहीं अधिक उपभोक्ता सामग्री उपलब्ध कर दी है। हो सकता है कि इस सामग्री से यूरोपीय लोगों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ी हो। पर शेष अधिकतर जगह तो आवश्यकताओं का अनावश्यक विस्तार हुआ है और भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, संस्कृति और प्रकृति से संबंध, इन सभी दिशाओं में जीवन की गुणवत्ता घटी है। भारत, चीन और इन जैसे विचारों वाले समाजों में उत्पादन में लगे लोग सदा राजनीतिक रूप से स्वतंत्र, सामाजिक रूप से निबद्ध और सांस्कारिक रूप से उन्नत रहे हैं।

भारत में शिक्षा और कौशल की पूरे समाज में व्याप्ति रही है। भारत में सदा सभी तरह के संबंधों में पारस्परिकता रही है। लोग मुख्यत: अपने और अपने परिचित समाज के लिए वस्तुएं उत्पादित करते थे। इसलिए उनकी गुणवत्ता भी बनी रहती थी और बढ़ती रहती थी और वस्तुआें और सेवाओं के विनिमय में अनुचित लाभ या नियंत्रण की संभावना नहीं रहती थी। भारत ने अपने ऐतिहासिक अनुभव से यह सीखा कि आत्मनिर्भरता निश्चित कर लेने के बाद ही व्यापार की गुंजाइश होती है।

व्यापारिक दृष्टि से भारत लंबे समय तक विश्व की सबसे बड़ी शक्ति रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि भारत में सोने की खानें नहीं थीं, पर गरीब से गरीब व्यक्ति भी सोने की थोड़ी-बहुत मात्रा संजोए रहता था। यह सोना हमें आयात के मुकाबले अधिक निर्यात से ही प्राप्त हुआ। लेकिन सभ्यतागत महत्त्व की बात यह नहीं है कि भारत व्यापार में बहुत आगे था, सभ्यतागत विशेषता यह है कि हमें अपने उपयोग की कोई सामग्री बाहर से खरीदने की आवश्यकता नहीं होती थी।

पिछली दो शताब्दियों में जो औद्योगिक तंत्र खड़ा हुआ, उसके मूल में यंत्र और मुद्रा हैं। यंत्र और उसकी चालक शक्तियों के परिष्कार से इस तंत्र को तेज गति से विशाल उत्पादन की क्षमता मिल गई है। इस उत्पादन के लिए स्थानीय बाजार पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए बाजार का निरंतर विस्तार आवश्यक है। नई मुद्रा ने बाजार के इस विस्तार को आसान बना दिया है। ये शक्तियां आज यूरोपीय जाति से उद्भूत हैं, कल वहीं की हों, यह आवश्यक नहीं है। पर वे जहां की भी हों, उनका स्वरूप औपनिवेशिक ही रहेगा। इस बाजार का जैसे-जैसे विस्तार होता है उस पर नियंत्रण उतना ही कठिन होता चला जाता है। इसलिए आज के बाजार में उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता बने रहना स्वाभाविक है।

अब तक यूरोप और उसके बाहर जिन भी देशों ने औद्योगिक तंत्र खड़ा किया है, उन्हें उसके लिए व्यापक हिंसा का सहारा लेना पड़ा है। साधनों पर नियंत्रण के लिए प्रकृति का भारी विनाश हुआ है। लोगों पर नियंत्रण के लिए एक सर्वसत्तावादी तंत्र खड़ा हो गया है। यह सभ्यता की अधोगामी दिशा है।

भारत में इस हिंसा के लिए उतनी सहज गुंजाइश नहीं है। चीन तक ने अपने औद्योगिक कायाकल्प के लिए व्यापक हिंसा का सहारा लिया, जो उसके साम्यवादी नियंत्रण ने आसान बना दिया था। भारत में वैसी गुंजाइश नहीं है। विश्व में टिके रहने के लिए हमें भी एक औद्योगिक तंत्र खड़ा करना पड़ेगा। यह प्राकृतिक जीवन और सभ्यतागत अभीप्साओं को बनाए रखते हुए कैसे किया जाए यह ठीक से सोचा जाना चाहिए। अभी तक हमने इस दिशा में कुछ नहीं सोचा।

बनवारी

 

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