December 08, 2016

ताज़ा खबर

 

अमरनाथ सिंह का लेख : चीन से सस्ते आयात की कीमत

भारतीय बाजार में ब्रांड कंपनियों का पच्चीस से पैंतालीस हजार रुपए में मिलने वाला टेबलेट चीनी ब्रांड में मात्र दो से पांच हजार रुपए में मिल जाता है।

Author नई दिल्ली | June 29, 2016 02:50 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारे मुल्क को चीन घटिया ही नहीं, कई जहरीले उत्पाद भी निर्यात करता है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है। हालांकि तमाम जद्दोजहद के बाद भारत सरकार ने चीन से आने वाले घटिया प्रकार के दूध व दुग्ध उत्पादों के साथ कुछ विशेष प्रकार के मोबाइल फोन पर 24 अप्रैल 2016 को प्रतिबंध लगाया है। केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में इसकी पुष्टि भी की है। लेकिन अहम सवाल है कि यह प्रतिबंध कितने दिनों तक जारी रह पाएगा। क्योंकि इसके पहले 23 जनवरी 2016 को भी चीनी खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में चीन ने अपने आंकड़ों से यह साबित किया कि उसके उत्पाद बढ़िया हैं। उसके बाद ही चीन को इस आंशिक शर्त पर ढील दी गई कि खिलौने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों पर खरे उतरने चाहिए।

दरअसल, पूरे विश्व में नकली व पायरेटेड सामान का कारोबार 31,789 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इसमें सबसे ज्यादा नकली व घटिया सामान चीन में ही बनता है। इसका सर्वाधिक नुकसान यूरोपीय संघ व अमेरिका की कंपनियों को उठाना पड़ रहा है। 27 अप्रैल 2016 को लोकसभा में भाजपा की ओर से ही चीनी मांझे का मुद्दा उठाया गया। भाजपा सदस्यों ने चीनी मांझे से होने वाले हादसों पर रोक लगाने की मांग की। लेकिन सरकार खामोश रही। केंद्र की सत्ता में आए भाजपा को दो साल हो गया है। लेकिन इस सरकार ने बड़ी मुश्किल से चीन से आयातित टेलीकॉम उपकरणों पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाया है। दरअसल, एंटी-डंपिंग ड्यूटी यूपीए सरकार की ओर से पहली बार दिसंबर 2010 में पांच साल के लिए लगाया गया था, जो दिसंबर 2015 में समाप्त हो गया, लेकिन केंद्र सरकार को एंटी-डंपिंग ड्यूटी फिर से लगाने पर केवल मंथन करने में चार माह लग गए। जबकि नौकरशाही चाह रही थी इस साल के शुरू में ही चीन से आयातित टेलीकॉम उत्पादों पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई जाए।

खैर, देर से ही सही, भारत सरकार ने चीन की तीन कंपनियों हूवेई, जेडटीई कॉरपोरेशन और अल्काटेल ल्यूसेंट से टेलीकॉम उपकरणों के आयात पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने का फैसला किया। यूपीए सरकार ने घरेलू कंपनियों को सस्ते आयात से बचाने के मकसद से यह कदम उठाया था। यह शुल्क विशेष रूप से सिंक्रोनस डिजिटल हायरारकी ट्रांसमिशन इक्विपमेंट पर लगा है। चीन से होने वाले आयात पर इसके कुल मूल्य का 9.42 फीसद से लेकर 86.59 फीसद के बीच शुल्क लगाना अब संभव हो पाएगा। कुल मिलाकर अब टेलीकॉम उत्पादों पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी अप्रैल 2021 तक जारी रहेगी। भारत सरकार को ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। खास रणनीति के तहत ऐसे संवेदनशील मसलों पर एक समय-सीमा के भीतर कार्रवाई हो। ओइसीडी और यूरोपीय संघ द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक अध्ययन से यह बात उजागर हुई है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013 में कुल वैश्विक व्यापार 18,998 अरब डॉलर का रहा। इसमें आयातित सामानों में 572 अरब डॉलर के सामान नकली व पायरेटेड पाए गए। ओइसीडी की रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से वर्ष 2013 के बीच छह लाख बार विभिन्न देशों की सीमाओं पर आयातित सामानों में नकली सामान पाए गएं। ओइसीडी ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि नकली उत्पाद बनाने वाले ट्रेडमार्क व ब्रांड का लाभ उठा कर न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि जीवन को भी खतरे में डाल रहे हैं।

ओइसीडी ने अपने अध्ययन में यह माना है कि हैंडबैग व परफ्यूम से लेकर मशीनों के कलपुर्जे तथा रसायनों तक, सब के नकली उत्पाद बन रहे हैं। वर्ष 2014 में चीन में प्रतिव्यक्ति 1,531 डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश हुआ था, जबकि भारत में यह आंकड़ा प्रतिव्यक्ति मात्र 183 डॉलर का था। वर्ष 2015 में जरूर अपने देश की स्थिति थोड़ी बेहतर हुई, लेकिन चीन की तुलना में अब भी भारत कहीं नहीं टिकता। इस कड़वी सच्चाई को सुनने की आदत भारत सरकार को डालनी चाहिए। यही अर्थव्यवस्था का सच है।

आंकड़े बताते हैं कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2010 में भारतीय विनिर्माण उत्पादन का विश्व व्यापार में हिस्सा 1.4 फीसद था, जबकि चीन का 11.6 फीसद। वर्ष 2000 में चीन से आयात भारत में 1.5 अरब डॉलर था जो वर्ष 2009-10 में बढ़ कर 30.8 अरब डॉलर और वर्ष 2010-11 में 39.8 अरब डॉलर हो गया। इन वर्षों में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा क्रमश: 0.5 अरब डॉलर, 19.2 अरब डॉलर और 20.5 अरब डॉलर था। सबसे खास बात यह है कि चीन में विनिर्माण क्षेत्र का वहां की सकल राष्ट्रीय आय में बयालीस फीसद का योगदान है, जबकि भारत में यह आंकड़ा मात्र सत्रह फीसद का है। भारत सरकार को इस तथ्य पर गौर करना पड़ेगा, ताकि व्यापार घाटा कम किया जा सके।

वर्ष 2014 के एक आंकड़े को समझने की जरूरत है। अप्रैल से दिसंबर 2014 के बीच चीन से आयात छियालीस अरब डॉलर रहा, जो भारत के कुल आयात का तेरह फीसद से ज्यादा था। इसकी तुलना में भारत से चीन को निर्यात अप्रैल से दिसंबर के बीच सिर्फ नौ अरब डॉलर का था। अर्थात कुल फासला सैंतीस अरब डॉलर का रहा। खुद भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015-16 के अप्रैल-फरवरी में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 48.68 अरब डॉलर रहा है। इस अवधि में भारत व चीन के बीच 65.16 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। सरकार ने माना है कि अब भी चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ रहा है। विशेष रूप से गौर करने वाली बात यह है कि चीनी उत्पादों की गुणवत्ता और बिक्री के बाद दिया जाने वाला सेवा कर कई भारतीय उत्पादों की तुलना में कम है, पर सस्ते होने की वजह से वे उत्पाद बाजी मार लेते हैं। पर यदि विनिर्माण उपकरण चीन से बड़ी तादाद में आए, तो कई छोटी और मध्यम आकार की औद्योगिक इकाइयां धीरे-धीरे बंद हो जा सकती हैं और उससे बेरोजगारी भी बढ़ सकती है।

भारतीय बाजार में ब्रांड कंपनियों का पच्चीस से पैंतालीस हजार रुपए में मिलने वाला टेबलेट चीनी ब्रांड में मात्र दो से पांच हजार रुपए में मिल जाता है। इतना ही नहीं, खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्तियां, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे चीनी उत्पाद भारत में किफायती दरों पर उपलब्ध हैं। सौ से ज्यादा कंपनियों को चीनी कंपनियों ने धोखा दिया है। खुद भारतीय दूतावास का कहना है कि भारतीय कंपनियां चीनी कंपनियों के साथ कारोबारी समझौते करने सेपहले चीनी कंपनियों की जांच-परख कर लें। जो चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में लिप्त पाई गई हैं उनमें रसायन, स्टील, सौर ऊर्जा के उपकरण, आॅटो वील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हार्डवेयर और बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के कारोबार से जुड़ी हुई हैं। चीनी रंगों, पिचकारी और स्प्रिंकल्स की भी भारत में भरमार है। होली के मौके पर देखा जा सकता है कि भारतीय रंग की तुलना में चीनी रंग और पिचकारी साठ फीसद तक सस्ते रहते हैं। भारत के रंगों से जुड़े पचहत्तर फीसद कारोबार पर चीन ने कब्जा कर लिया है।

एक अध्ययन के मुताबिक, पूरे देश में छह सौ टन गुलाल का इस्तेमाल होता है। सेंट्रल बोर्ड आॅफ एक्साइज की मानें तो सॉफ्टवेयर और संगीत ऐसे क्षेत्र हैं जहां धड़ल्ले से नकली माल बाजार में उपलब्ध हैं। इनके अलावा, नकली किताबों का 4 करोड़ 80 लाख डॉलर का, फिल्मों का 97 करोड़ डॉलर का, आॅटो के कलपुर्जों का सवा अरब डॉलर का और नकली सॉफ्टवेयर का तीस अरब डॉलर का कारोबार भारत में चल रहा है।

पिछले साल आॅनलाइन कारोबार के जरिये आपूर्ति किए गए सिर्फ 58.7 फीसद उत्पादों की गुणवत्ता अच्छी थी, जबकि शेष चालीस फीसद से अधिक उत्पाद घटिया व नकली थे। आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने पिछले साल विश्व के सबसे बड़े आॅनलाइन खुदरा बाजार (554 अरब डॉलर) के तौर पर अमेरिका (350 अरब डॉलर ) को पछाड़ दिया है। रिपोर्ट में वाणिज्य मंत्रालय के हवाले से कहा गया है कि आॅनलाइन खुदरा कारोबार सालाना चालीस फीसद से बढ़ कर 554 अरब डालर का हो गया है। इस दौरान नकली उत्पादों का विनिर्माण और बिक्री इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता रही।

आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि डेढ़ दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी। सस्ता माल पाकर भारत के लोग खुश थे और धीरे-धीरे भारत में चीनी सामानों का ढेर लग गया। लेकिन इसका बुरा असर देसी उत्पादकों पर पड़ा। कई छोटी इकाइयों पर ताले पड़ गए। जबकि बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे विकल्प की तलाश करने लगीं। आज भारतीय परियोजनाओं के लिए अस्सी फीसद ऊर्जा संयंत्रों के उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं। स्वाभाविक है कि इसका नकारात्मक असर घरेलू उत्पादन क्षेत्र पर पड़ा है। अर्थशास्त्र के जानकार बताते हैं कि ऐसे कई कारोबार जो अपने देश में आने चाहिए थे, चीन में चले गए हैं। आॅटो पार्ट्स के क्षेत्र में भी चीनी आयात की बाढ़ से भारत को जूझना पड़ रहा है। भारत में इसका बाजार करीब सात अरब डॉलर का है, और इसमें अड़तीस फीसद से ज्यादा का नकली बाजार है, जिसमें अधिकतर चीन का माल है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on June 29, 2016 12:01 am

सबसे ज्‍यादा पढ़ी गईंं खबरें

सबरंग