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बेबाक बोलः पंच परमेश्वर- आस्था और असलियत

हर की पैड़ी पर अगरबत्ती, कपूर की खुशबू और मंदिरों की घंटियों की गूंज बरबस आपको आध्यात्मिक माहौल में खींचती है। पर वहां से निकलते ही संकरी गलियां, खुली नालियां और गंदी हो रही गंगा आपकी आत्मा को इससे बगावत करने पर मजबूर करने लगती है।

हिंदुस्तान की विविधता भरी सांस्कृतिक आस्था की कड़ी उत्तराखंड में आकर जुड़ती है। इसी आस्था की डोर का सहज फायदा भाजपा को मिलता दिख भी जाता है और कांग्रेस भी इसके आगे नतमस्तक रहती है। पौराणिक अस्मिता जब आज के आधुनिक सच से टकराती है तो यहां के मुख्य राजनीतिक दल भ्रमजाल सा ही बुनते हैं। चुनावी सरगर्मी के समय प्रधानमंत्री ने जब लोकसभा में भूकम्प का मजाक उड़ाया तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ट्वीट किया, ‘उत्तराखंड का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’। इस बार हरीश रावत के चेहरे का सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी की छवि से है। इसके साथ ही चुनावों में भागीदारी कर रहे पांच राज्यों में से इसी राज्य की जनता यह तय करेगी कि मोदी का ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ अभियान किस तरफ जाएगा। प्राचीन पहचान वाले इस राज्य के अर्वाचीन द्वंद्व के साथ संवाद बनाने की कोशिश करता इस बार का बेबाक बोल।

हर की पैड़ी पर अगरबत्ती, कपूर की खुशबू और मंदिरों की घंटियों की गूंज बरबस आपको आध्यात्मिक माहौल में खींचती है। पर वहां से निकलते ही संकरी गलियां, खुली नालियां और गंदी हो रही गंगा आपकी आत्मा को इससे बगावत करने पर मजबूर करने लगती है। जब लोकसभा में प्रधानमंत्री भूकम्प का मजाक उड़ाते हैं तो उन्हें पहाड़ की अस्मिता को छेड़ने का खमियाजा भुगतना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में अगर राहुल गांधी को अपने भाषण की शुरुआत शमेशर बहादुर सिंह की कविता से शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ता है तो उत्तराखंड में भाजपा सहित हर सियासी दल गंगा मैया के जयकारे के बिना अपनी बात शुरू नहीं कर सकता। आस्था और असलियत का यही द्वंद्व इस सूबे की जंग को अलग बना रहा है।
चार साल से लटक रहे राष्टÑीय राजमार्ग, गंदगी का ढेर और गंदी होती गंगा। हरिद्वार में स्वागत है आपका। विकास के नाम पर उत्तराखंड में वोट मांग रही कांग्रेस को जनता ने शब्दश: लिया तो उसे सत्ता से बेदखल हो जाना पड़ेगा। वहीं, कर्मकांडी पंडितों, यजमानों, साधु-संतों और महंतों से अटी हरिद्वार की धरती पर भारतीय जनता पार्टी सहज ही अपना रास्ता बनाती दिखती है। हर की पैड़ी पर गंगा आरती स्थल के ऐन ऊपर अपना छोटा-सा मंदिर सजाए अजय पांडे घाट पर हर घड़ी दिखते अजनबियों से गंगा के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने का आग्रह करते समय अपनी थाली पर नजर रखे हैं जिसमें अब छोटे नोट और सिक्के दूर-दूर छिटके पड़े हैं। ‘कभी यह थाली भरी रहती थी। लेकिन कोई बात नहीं। प्रधानमंत्री ने कहा है कुछ ही दिन की बात है। सब ठीक होगा’ कह कर पांडे ने नोटबंदी के किसी विपरीत असर को खारिज कर दिया।
नोटबंदी की यही खासियत रही। कालेधन और ‘बुराई’ की चाशनी में लपेट कर इस कड़वी दवा को नरेंद्र मोदी ने सहजता से लोगों के गले से उतार दिया। प्रधानमंत्री पर अपने विश्वास के कारण लोगों ने इस कठिन घड़ी में भी अच्छे दिनों की उम्मीद को टूटने नहीं दिया। दरअसल, हरिद्वार में तो वैसे भी भाजपा सहज-स्वाभाविक रूप से अपना आधार बनाती है। हरिद्वार के तंग बाजार में भाजपा के झंडे आपके सिर को छू कर ही आपको गुजरने देते हैं। भाजपा का नारा बुलंद करते हुए अखिलेश शर्मा ने कहा, ‘नोटबंदी बहुत बढ़िया रही। हमारा तो जबर्दस्त फायदा हुआ। जनाब कई वर्षों से लंबित पड़ा एक करोड़ से ज्यादा का बकाया वसूल हुआ। वित्तीय कमी से लड़खड़ाते नगर निगम के लिए यह वरदान रही। धर्मस्थानों में गृहकर न चुकाने का जैसे स्वभाव बन गया था। लेकिन नोटबंदी के बाद धड़ाधड़ नकदी जमा हुई। यह ऐसा मामला है जहां वसूली प्यार से व गुहार से करनी पड़ती है। लिहाजा जबर्दस्ती तो कर नहीं सकते’।
वहीं गंगा सभा के बैनर तले पिछले कई दशकों से गंगा की सफाई में जुटे पुरुषोत्तम शर्मा ने तमतमाते हुए कहा, ‘एक झटके में देश की 85 फीसद नकदी को कालाधन करार देना कहां का लोकतंत्र है? यह तो सरासर तानाशाही है। अपने ही पैसे को लेने के लिए लोगों को कतारबद्ध करना और तमाम नकदी जिसमें पाई-पाई जोड़ कर इकट्ठा की गई बचत भी शामिल हो उसे कालाधन करार देना फासीवाद जैसा है’। पूर्व विधायक व कांग्रेस उम्मीदवार अंबरीश कुमार अपने आकलन में कहते हैं, ‘यह संकट गुल खिलाएगा। तमाम कामगार वर्ग और व्यापारियों को बहुत मुश्किल हुई। यह एक ऐसा फैसला था जो सरकार ने नहीं एक व्यक्ति ने किया जिसका खमियाजा देश के हर नागरिक को उठाना पड़ा। इसका विपरीत असर होगा हर हालत में’।
हरिद्वार के सबसे बड़े शिक्षा संस्थान एसएमजेएन पीजी कॉलेज के प्रिंसिपल अवनीत कुमार घिल्डियाल ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि प्रदेश को आपसी कलह और खींचतान का शाप मिला है। राज्य की नारायण दत्त तिवारी सरकार को छोड़ दें तो आपसी खींचतान और दलबदली के खिलाफ कोई अपवाद भर भी नहीं है। यह अलग बात है कि देश की न्यायिक व्यवस्था ने अपनी सार्थक भूमिका निभाई। लगता है कि इस बार लोग निर्णायक मत देंगे। हालांकि यह कांग्रेस और भाजपा के बीच बड़ी नजदीकी लड़ाई लग रही है’।

इलाके की सियासत के वरिष्ठ जानकार मोहन लाल सचदेवा मौजूदा हालात से पूरी तरह निराश हैं। उनका सीधा मत है, ‘अब तो बस कम बुराई को चुनने का ही समय है और जो हालात मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में बने हैं, उनमें तो कांग्रेस ही कम बुराई की कसौटी पर खरी उतरती दिखाई दे रही है। भाजपा और संघ का गठजोड़ देश के ही भीतर विभाजन की लकीर खींचता हुआ दिखाई देता है। यह समय देश और उसके संप्रदायों को एकजुट रखने का है इसलिए यह जरूरी है कि ऐसी ताकतों से बच कर चला जाए जिनका ध्येय बांटना है’।
हरिद्वार देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड के चारों धाम का द्वार ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति का दिशानिर्देशक भी है। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम के साथ जिस गंगा की अविरल धारा बनी उसकी प्राणप्रतिष्ठा यहीं हुई, जहां हर साल दो करोड़ से भी ज्यादा श्रद्धालु श्रद्धानत होकर जाते हैं। यह हिंदुओं के अस्थि विसर्जन और पिंडदान का भी सबसे बड़ा तीर्थ है। दक्ष ने जब अपने दामाद शिव का अपमान किया तो पति के निरादर से रुष्ट बेटी सती ने अग्निकुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसी धार्मिक आस्था का बखान करते-करते यहां के निवासी शिव और सती से जुड़ जाते हैं। इसी आस्था और जुड़ाव का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को मिलता है। सिर्फ यहीं नहीं पूरे देश में।

हालांकि मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ लोगों की सहानुभूति जबर्दस्त है और उन्होंने अपना पीड़ित चेहरा पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अवनीत कुमार कहते हैं, ‘अपने गठन के बाद से उत्तराखंड राजनीतिक उथलपुथल का शिकार रहा है। यह भी सच है कि पहले जब कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति आई तो आलाकमान ने उनकी निस्बत विजय बहुगुणा को प्रदेश की कमान दे दी। और फिर इसी के कारण रावत के तख्तापलट की कोशिश उनकी अपनी ही पार्टी ने की। ऐसे में लोग पार्टियों के प्रति आश्वस्त होने से डगमगा गए हैं जिस कारण मतदाता दुविधा में दिखाई दे रहा है’।

उत्तराखंड का गठन 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर हुआ। अंतरिम सरकार की कमान नित्यानंद स्वामी को दी गई। स्वामी हरियाणा के थे लेकिन यहां पर उनकी पहचान एक जुझारू नेता की थी लेकिन जल्द ही उनकी सरकार पर संकट आ गया जबकि भाजपा के ही भगत सिंह कोश्यारी की अगुआई में बगावत हुई और कमान कोश्यारी ने ली। पार्टी की लड़ाई से परेशान प्रदेश के मतदाता ने 2002 के पहले चुनाव में सत्ता कांग्रेस की झोली में डाल दी। तब प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत थे, लेकिन उनके दावे को नकारते हुए सत्ता नारायण दत्त तिवारी को दी गई। बस एक इसी सरकार ने बिना किसी बड़ी उथलपुथल के कार्यकाल पूरा किया। 2007 में सत्ता भाजपा के हाथ आई और कमान बीसी खंडूरी को दी गई। तब तो जैसे पहले ही दिन से बगावत शुरू हो गई। कोश्यारी रुष्ट थे। 2009 में पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन करके रमेश पोखरियाल निशंक को सत्ता दी। लेकिन 2010 के कुंभ मेले में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सरकार पर संकट आया। भूमि घोटाले के आरोप लगे। पार्टी ने एक बार फिर से खंडूड़ी पर भरोसा जताया। सत्ता दी और 2012 के चुनाव में ‘खंडूरी जरूरी’ का नारा दिया। लेकिन खंडूरी के खाली किए गए लोकसभा हलके से उनका अपना ही बेटा चुनाव हार गया और पार्टी के नारे और निर्माण को पलीता लग गया।
2012 में सत्ता की कुंजी कांग्रेस के हाथ आई। कई परेशानियों व कलह के बावजूद सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। लेकिन अब कई इलाकों में उसके अपने ही बागियों ने अधिकृत उम्मीदवारों की नाक में दम कर रखा है।

गुरुकुल कांगड़ी के कुलपति डॉ. सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘शुरू में रावत के खिलाफ उठी बगावती बयार के बाद उनके प्रति सहानुभूति की लहर उठी थी। तब लग रहा था कि कांग्रेस आगे है। लेकिन जब भाजपा में भी आपसी कलह का कोलाहल हुआ तो यह मुद्दा शांत हो गया। फिलहाल तो भाजपा और कांग्रेस में बराबर की टक्कर दिख रही है’।
आस्था और असलियत के बीच झूलता उत्तराखंड दो तरह के परिदृश्य पेश कर रहा है। ग्रामीण और शहरी इलाकों के मुद्दे अलग हैं। नजर यहां के मुसलिम और दलित समुदाय की ओर भी है। कांग्रेस को आशा है कि ऐन चुनावी मौके पर संघ की ओर से आरक्षण पर आए बयान का फायदा उसकी झोली में गिरेगा।
यहां मुकाबला कांग्रेस के मुख्यमंत्री हरीश रावत की लोकप्रियता और भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दमखम से है। भाजपा ने रावत के सामने किसी को खड़ा नहीं किया है। इस बार यहां की जनता यह जनादेश भी देने वाली है कि उसे कांग्रेस चाहिए या नहीं जो पूरे हिंदुस्तान की सियासत के लिए भी नजीर बनेगा।

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