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वक्त की नब्जः भ्रष्टाचार की दीमक

ऐसा होने से न सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ा है, राजनीतिक दल भी कमजोर हो गए हैं, क्योंकि असली राजनेताओं के बदले इनके सदस्य बन गए हैं ऐसे लोग, जिनका राजनीति में आने का एक ही मकसद है: पैसा बनाना।
Author July 30, 2017 02:34 am
गुजरा सप्ताह अच्छा रहा भारतीय उप-महाद्वीप वासियों के लिए और बहुत बुरा रहा राजनेताओं के लिए। सीमा के उस पार एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री को गिराया भ्रष्टाचार के आरोपों ने और सीमा के इस पार पटना में एक ऐसे महगठबंधन को तोड़ा, जिस पर टिकी हुई थीं विपक्ष की सारी उम्मीदें। न

गुजरा सप्ताह अच्छा रहा भारतीय उप-महाद्वीप वासियों के लिए और बहुत बुरा रहा राजनेताओं के लिए। सीमा के उस पार एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री को गिराया भ्रष्टाचार के आरोपों ने और सीमा के इस पार पटना में एक ऐसे महगठबंधन को तोड़ा, जिस पर टिकी हुई थीं विपक्ष की सारी उम्मीदें। नवाज शरीफ ने जब इस्तीफा दिया तो हमारे कुछ अति-राष्ट्रवादी टीवी पत्रकार ऐसे पेश आए जैसे ऐसी चीजें हमारे देश में नहीं हो सकती हैं। अपने गिरेबान में झांकने के बाद बात किए होते तो उनको फौरन दिख जाता कि भ्रष्टाचार के मामलों में सीमा के इस पार के राजनेताओं और सीमा के उस पार के राजनेताओं में उन्नीस-बीस का भी फर्क नहीं है।

पटना में जिस नाटकीय अंदाज से नीतीश कुमार ने अपना पद त्यागा और कुछ घंटों के अंदर फिर से मुख्यमंत्री बन गए, वह इतना दिलचस्प था कि हम राजनीतिक पंडितों की नजरें इस ड्रामा पर ही टिकी रहीं। सो, उस बात को अनदेखा किया हमने कि नीतीश कुमार ने जो किया, क्यों किया। राहुल गांधी ने अपने खास अंदाज में कह दिया कि सत्ता हासिल करने के लिए लोग कुछ भी कर देते हैं। लेकिन शायद भूल गए कांग्रेस के युवराज कि नीतीश कुमार सत्ता में पहले से थे। सो, अगर लालू यादव के साथ रिश्ता तोड़ने का फैसला किया उन्होंने, तो इसलिए कि उनको अपनी बेदाग छवि सुरक्षित रखनी थी भ्रष्टाचार के उस दाग से, जो लालू यादव और उनके पूरे परिवार पर लगा है पिछले कुछ महीनों में। ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार के आरोप पहले नहीं लगे हैं लालू यादव पर। चारा घोटाले का मुकदमा अभी तक चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद जब छापा मारने पहुंचे आयकर विभाग वाले उन आलीशान कोठियों में, जो लालू यादव और उनके बच्चों की हैं, तो दुनिया हैरान रह गई। इतनी आलीशान थीं ये कोठियां कि अगर किसी अंबानी या अडानी की होतीं तो ताज्जुब न होता।
अफसोस की बात यह है कि अपने इस भारत महान में ऐसे कई राजनेता हैं, जो इससे भी आलीशान कोठियों के मालिक हैं और जिनकी संपत्ति उनकी आमदनी से मेल नहीं खाती। तेजस्वी यादव से जो सवाल आयकर विभाग वालों ने पूछे उनकी आमदनी के बारे में वही सवाल कई अन्य राजनेताओं के बच्चों से भी पूछे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, अगर इन राजनेताओं के राजकुमारों से पूछा जाए कि आपके पास इतना धन आया कहां से, तो उनके पास कोई जवाब न होगा। इसलिए कि इन लाड़ले शाहजादों ने कभी खून-पसीना बहा कर ईमानदारी से काम किया ही नहीं है।

सच तो यह है कि जितना धन जितनी जल्दी राजनीति में कमाया जा सकता है वह किसी दूसरे व्यवसाय में कमाना मुश्किल है। सच यह भी है कि एक बड़े सरकारी सौदे से चतुर मंत्री या मुख्यमंत्री उतना कमा सकते हैं जो बॉलीवुड का कोई बड़ा अभिनेता अपनी पूरी जिंदगी में मुश्किल से कमाता होगा। असली काला धन सिर्फ राजनेताओं के पास होता है अपने देश में और उसे छिपाने के कई तरीके होते हैं, जिनमें सबसे अच्छा तरीका है जमीन-जायदाद खरीदना बेनामी तौर पर। ऐसा नवाज शरीफ ने किया लंदन में कई आलीशान मकान खरीद कर और फंस गए जब पानमा दस्तावेज प्रकाशित हुए। लालू यादव ने कम से कम अपने धन को देश के अंदर ही रखा और इसको गनीमत मानना चाहिए हमें, क्योंकि कई भारतीय राजनेताओं ने अपना पैसा दुबई, सिंगापुर और लंदन में छिपा रखा है इतनी चालाकी से कि आयकर विभाग के जासूसों के लिए ढूंढ़ना नामुमकिन है। लालू यादव ने ऐसा किया होता, तो शायद आज इस मुसीबत में नहीं फंसते कि उनके ‘छोटे भाई’ को उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा।

सो, सवाल है कि क्या राजनीतिक भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है या नहीं? मेरी राय में इसको कम करना मुश्किल नहीं है, अगर प्रधानमंत्री कुछ ठोस कदम उठाने को तैयार हों। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने इशारा किया था अपने भारतीय जनता पार्टी के साथियों को कि उनको परिवरवाद पसंद नहीं है। सो, बिहार के विधानसभा चुनावों तक कुछ हद तक परिवारवाद को नियंत्रण में रखने में वे सफल रहे। दिल्ली के चुनावों में भी ऐसा हुआ, लेकिन जब उत्तर प्रदेश की बारी आई तो इस प्रदेश के बड़े राजनेताओं ने अपने बेटों-बेटियों को टिकट दिलवाए यह कह कर कि वे बहुत वर्षों से पार्टी के लिए काम करते आए हैं। सो, अब भाजपा में भी वही रोग लग गया है, जिसने अन्य राजनीतिक दलों को बर्बाद किया है।
यह गलत परंपरा शुरू की थी कांग्रेस ने, लेकिन अब शायद ही कोई राजनीतिक दल रह गया है देश में, जो किसी राजनेता की निजी संपत्ति में तब्दील न हो गया हो। ऐसा होने से न सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ा है, राजनीतिक दल भी कमजोर हो गए हैं, क्योंकि असली राजनेताओं के बदले इनके सदस्य बन गए हैं ऐसे लोग, जिनका राजनीति में आने का एक ही मकसद है: पैसा बनाना।
पैसे इतनी जल्दी बन जाते हैं कि शाहजादा साहब लोकसभा तक पहुंचते ही इस काबिल हो जाते हैं कि उनके लिए महंगी विदेशी गाड़ी खरीदना कोई मुश्किल बात नहीं रहती। कुछ ही दिनों में बीवी के जेवर बन जाते हैं और बच्चों को विदेशों में घुमाने के भी पैसे आ जाते हैं। इनका रहन-सहन इतना बदल जाता है कि बिलकुल वैसे रहने लगते हैं जैसे बड़े उद्योगपति रहते हैं। इन सबके घरों में वैसे छापे अगर पड़ने लगें, जो लालू यादव के ठिकानों पर पड़े थे, तो राजनीतिक भ्रष्टाचार की व्यापक तस्वीर दिखने लगेगी, सो ऐसा करना जरूरी हो गया है अब।

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