ताज़ा खबर
 

बेबाक बोलः जब तोप मुकाबिल हो..

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी...नेहरूकाल का यह फिल्मी गीत नेहरू मॉडल का सार है।

पिछले तीन साल बनाम सत्तर साल में सबसे बड़ा खलनायक नेहरू मॉडल को बताया गया। वेदों की ओर लौट चलो के नारे के साथ ‘छेड़ो सिर्फ कल की’ बातों का तरन्नुम तैयार हुआ। सरकार की नाकामी के विकल्प में बाजार को खड़ा कर दिया गया। नेहरू मॉडल के योजना आयोग की समाधि पर गुजरात मॉडल वाले नीति आयोग की अट्टालिका तैयार की गई, लेकिन इसकी बुनियाद की पहली र्इंट अरविंद पनगढ़िया ही इससे अलग होकर अमेरिका में अकादमिक वापसी कर रहे हैं। रघुराम राजन से लेकर मुकुल रोहतगी तक सरकार को राम-राम कह चुके हैं। राजग सरकार में अकादमिक चेहरों की इस पुरस्कार वापसी पर बेबाक बोल।

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी…
नेहरूकाल का यह फिल्मी गीत नेहरू मॉडल का सार है। औपनिवेशिक गुलामी से निकलें और पुरानी बातों को छोड़ नई कहानी लिखें। आइआइटी, आइआइएम, इसरो नए भारत की पहचान थे और नेहरू ने कल-कारखानों को भारत के नए मंदिर कहा था।
मई 2014 के बाद देश को सत्तर साल बनाम आज में बांट दिया गया। पूरे घर की बदल डालो जैसे विज्ञापनी तरन्नुम के साथ देश बदल रहा है, ‘आगे बढ़ रहा है’ की शुरुआत हुई। और, सबसे ज्यादा निशाने पर लिए गए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू। देश की सारी ‘समस्याओं’ का ठीकरा नेहरूवादी अर्थव्यवस्था पर फोड़ा गया और नेहरू से जुड़ी हर पहचान बदलने की कवायद शुरू हो गई। नेहरूकालीन योजना आयोग का नाम नीति आयोग कर दिया गया। इसके पहले उपाध्यक्ष बनाए गए अरविंद पनगढ़िया।
अरविंद पनगढ़िया गुजरात मॉडल के समर्थक थे। 2014 तक इस मॉडल के पक्ष में ये काफी लिख-पढ़ चुके थे। इन्हें अमर्त्य सेन की अवधारणा (जिन्हें नेहरु मॉडल से जोड़ा जाता है) के खिलाफ खड़े होने का भी इनाम मिला। लेकिन आर्थिक नीतियों पर कांग्रेस से अलग आपके पास क्या था? जिस बाजारवाद की राह पर प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह की जोड़ी ले गई थी, उसे आक्रामक रूप से और बढ़ाना। निजीकरण की जमीन तैयार करना। वैश्विक पूंजी की इजारेदारी का घेरा बढ़ाना। सरकार के विकल्प में बाजार को खड़ा करना।
रघुराम राजन, मुकुल रोहतगी और अब अरविंद पनगढ़िया – ये उदारवाद समर्थक चेहरे ही थे। तो फिर एक उदारवादी अर्थव्यवस्था की सरकार से उन्हें क्या दिक्कत हो सकती थी? राजग सरकार की शुरुआत में ही असहिष्णुता के खिलाफ उठी आवाज को आपने कागजी क्रांति करार दिया था और उन साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ‘पुरस्कार वापसी का कांग्रेसी गिरोह’ कह कर खारिज कर दिया था। लेकिन पहले राजन, फिर रोहतगी और अब पनगढ़िया। यह दर्शा रहा है कि सहिष्णुता ही नहीं नीति निर्धारण के मसले पर भी आपकी व्यवस्था हिचकोले खा रही है।

जिस नीति निर्धारण की बात हम कह रहे हैं उसके छेद पर सबसे पहले रघुराम राजन ने ही सवाल उठाया था। देश की अर्थव्यवस्था पर पूंजीपति घरानों के दबाव पर राजन ने बोलना शुरू कर दिया था। और, यह नीति इतने उच्च स्तर पर है कि हम और आप अभी अनुमान ही लगा सकते हैं कि यह या वह हो सकता है। लेकिन, नेहरूवाद की कब्र खोद कर जिस गाजे-बाजे के साथ नीति आयोग की अट्टालिका खड़ी की गई थी उसका चमकता कंगूरा क्या सिर्फ दखलंदाजी की आंधी में गिरा?
भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद एक साथ कई चीजें कई स्तर पर हो रही थीं। नीति आयोग के शुरुआती दस्तावेज बता रहे थे कि अर्थव्यवस्था क्रूर निजीकरण की राह पर ही आगे बढ़ेगी। ट्रेन किराए से लेकर रसोई गैस तक पर सबसिडी खात्मे की ओर। सबसिडी पर आधारित किसान देश पर बोझ बताए जा रहे हैं। रेलवे, विमानन से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक को तेजी से निजीकरण के दायरे में लाया जा रहा है। निजीकरण की शुरुआत तो कांग्रेसकाल में ही शुरू हो चुकी थी। राजग सरकार तो सहकारिता और सबसिडी के ताबूत पर अंतिम कील भर ठोक रही है।

लेकिन भाजपा की निजीकरण की राह में एक शब्द गूंज रहा है तानाशाही का। निजीकरण की प्राथमिकताओं में इतने चुनिंदा लोगों का घेरा बनाया गया है कि बाकी सब हाशिए पर आ गए हैं। दिल्ली और बिहार का हश्र देख भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनाव के पहले नोटबंदी का तुरुप का पत्ता चला और खतरों के खिलाड़ी बनने का फायदा उसे मिला। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की आड़ में वह जहां चुनाव जीती वहां तो सरकार बना ही रही है, जहां नहीं जीती वहां भी बना रही है। जहां का जनादेश भाजपा के खिलाफ था, आज भाजपा के उपमुख्यमंत्री शपथ ले चुके हैं। तो केंद्र से चली भ्रष्टाचार की परिभाषा यह है कि बिहार के लिए भ्रष्टाचार के मापदंड अलग हैं और मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के लिए अलग। अगर आपके भ्रष्टाचार पर बात हो तो आप अहंकार भाव से कहेंगे कि भाजपा के मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं। नोटबंदी पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को आपका अहंकार भ्रष्टाचार की जद में लाता है।

अंक-शस्त्र की बदौलत आपकी सरकारें तो बन रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर जो हालत बिगड़ रही है उसकी तरफ आप न देखना पसंद कर रहे हैं और न उसके खिलाफ सुनना। और, आपका यह अहंकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े उन संगठनों पर भारी पड़ रहा है जो जल, जंगल और जमीन पर जनता से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। स्वदेशी जागरण मंच उस खतरे को भांप रहा है जो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी के सर्वेक्षण से दिखता है। इसके मुताबिक, जनवरी-अप्रैल 2016 के दौरान 9.3 करोड़ रोजगार थे जो मई से अगस्त 2016 में घटकर 8.9 करोड़ रह गए। इस सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के नुकसान को देखा जा सकता है। एक साल पहले की तुलना में औपचारिक रोजगार में 70 लाख की कमी आई है। किसानों की कमर टूट चुकी है। और जीएसटी के नकारात्मक परिणामों के भी आंकड़े आने शुरू हो गए हैं। फिक्की भी कह चुका है कि फिलहाल निजी क्षेत्र के तीन चौथाई कारोबार में किसी नई भर्ती की संभावना नहीं है। और बहुप्रचारित किसान बीमा फसल योजना का हासिल यह होता है कि 2016 के लिए बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के नाम पर 9081 करोड़ रुपए का प्रीमियम इकट्ठा किया। इसके मुकाबले लगभग 27 सौ करोड़ रुपए नुकसान के दावे किए गए। उसमें से बीमा कंपनियों ने एक चौथाई अर्थात 638 करोड़ रुपए का भुगतान किया। यानी एक फसल में साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का मुनाफा, जिसके लिए उन्हें कुछ करना भी नहीं पड़ा क्योंकि बैंकों ने किसानों के खातों से पैसा लेकर उन्हें दिया। तो, साफ जाहिर है कि इससे सिर्फ बड़ी कंपनियों का फायदा हुआ और किसानों के खाते में बेबसी का ब्याज और बढ़ा। इन नीतिगत खामियों के पीछे स्वदेशी जागरण मंच के लोग सार्वजनिक मंचों पर पनगढ़िया की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर सवाल उठा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि नीति आयोग के कार्यों की समीक्षा हो और भारत की मिट्टी से जूझकर पढ़े-लिखे लोगों को नीति आयोग जैसी संस्थाओं की कमान सौंपी जाए।

पनगढ़िया की अर्थशास्त्र की विदेशी डिग्री का जो भी असर हो लेकिन यह तथ्य है कि पनगढ़िया ने नोटबंदी के समय पुराने नोट जमा कराने की समय-सीमा पर सवाल उठाए थे। इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया था कि ढाई लाख तक की नकद जमा कराने वालों से कोई सवाल-जवाब न हो। पनगढ़िया ने मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन की युनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम योजना पर भी सवाल उठाए थे। इसके साथ ही अपनी उदारवाद की विश्वविद्यालयी शिक्षा के तहत ही क्रूर निजीकरण की राह पर जानेवाले मसौदे भी तैयार किए थे। वे एक तानाशाही वाली अर्थव्यवस्था की सड़क बना रहे हैं लेकिन सरकार की तानाशाही और संघ की दखलंदाजी से परेशान हैं। दक्षिणपंथी विचारधारा भी दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था से परेशान है।

दखलंदाजी के पत्थर से बनाई जा रही सड़क पर जब तानाशाही का मजबूत सीमेंट चढ़ने लगा तो आपको घबराहट हुई और आप तो उस सड़क पर से ही उतर भागे। लेकिन संसद से लेकर अर्थव्यवस्था तक सरकार का तानाशाही रवैया सामने आ रहा है। अब इसके शिकार सरकार के झंडाबरदार चेहरे भी हो रहे हैं। आपने निजीकरण का दायरा तय किया लेकिन निजीकरण का फायदा किन्हें लेने दिया जाएगा यह तो सरकार ही तय करेगी और यहीं से इस व्यवस्था के छेद दिखने शुरू हो गए। सवाल तो यह है कि पाकिस्तान में पनामा कांड के आरोपी प्रधानमंत्री की गद्दी छिन गई और एक तरह से न्यायिक तख्तापलट हुआ। लेकिन भारत में पनामा के आरोप ठंडे बस्ते में और उसके आरोपी सरकारी नीतियों के ब्रांड अंबेसडर बने हुए हैं। व्यवस्था जो भी हो, उसमें कुछ तो ईमान की बात होनी चाहिए। आपके पक्ष के भ्रष्टाचार के आरोपियों पर कार्रवाई की कम से कम मुंहदिखाई की रस्मअदायगी भी हो जाती तो जनतंत्र के लिए संतोष की बात होती। लेकिन जब विचारों के टैंक बनाने वाली जगह पर असली टैंक रखा जाए तो ‘थिंक टैंक’ अपने हिसाब से अपनी कागजी क्रांति चुन ही लेंगे। राजन, रोहतगी और पनगढ़िया आपके दिए पुरस्कारों की वापसी कर चुके हैं। जब तानाशाही का तोप मुकाबिल हुआ है तो आपके पक्ष के कागजी क्रांतिकार सबसे पहले भागे हैं। भारत के विश्वविद्यालयों में टैंक और मिग विमान खड़े हैं और अकादमिक कोलंबिया विश्वविद्यालय की पनाह ले रहे हैं। पनगढ़िया तो अपनी विदेशी डिग्री ले विदेश चले अब देखना यह है कि स्वदेशी जागरण मंच निजीकरण व तानाशाही की तोप के आगे जनता को कैसे खड़ा करता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग