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हिंदी पट्टी का एक शब्द और क्रिया रही है हांका। यह जंगल, जीवन और जानवर से जुड़ा एक सामूहिक उपक्रम रहा है। जंगली जानवर का शिकार करने, उससे बचाव और उसे पाने के लिए लोग दल बना कर जोर-जोर से चीखते हुए, हाथ में जो भी रहे उसे पीटते हुए एक साथ दौड़ते थे, जिससे […]
Author January 15, 2015 14:41 pm
आयकर विभाग ने इनमें से 79 खाताधारकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है।

हिंदी पट्टी का एक शब्द और क्रिया रही है हांका। यह जंगल, जीवन और जानवर से जुड़ा एक सामूहिक उपक्रम रहा है। जंगली जानवर का शिकार करने, उससे बचाव और उसे पाने के लिए लोग दल बना कर जोर-जोर से चीखते हुए, हाथ में जो भी रहे उसे पीटते हुए एक साथ दौड़ते थे, जिससे सारे जानवर डर कर भागते थे। इस तरह शिकारी उसका शिकार करता था। वन संपदा और जानवर सुरक्षा के नाम पर इस क्रिया को रोक दिया गया। सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है।

नई सरकार ने इस हांका को अब सियासत में उतार कर समाज पर प्रयोग करना शुरू कर दिया है। इसके रूप, आकार, भाषा और करतब को नए ढंग से प्रयोग कर रही है और सफल भी हो रही है। इसे सटीक भाषा दी जाए तो यह कहने में ज्यादा सुविधा होगी कि हम हांका के दौर से गुजर रहे हैं। इसका पहला और सफल प्रयोग संसद के चुनाव में देखा गया।

एक हांका उठा। ठीक हांका की तरह। क्या, क्यों, कौन, किधर जैसे तमाम वाजिब सवाल दरकिनार हो गए और लोग दौड़ पड़े। जनतंत्र के मूल ढांचे पर यह पहला और कारगर हमला था, जहां तर्क और सवाल बेमानी हो गए। और एक सरकार बन गई। जब सब थिर हुआ और लोग पूछने लगे कि हम जिस हांके में शामिल थे, वह तो दिखाओ। काले धन की वापसी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार वगैरह! सरकार चुप।

ये सवाल अभी उठ ही रहे थे कि एक नया हांका आया। प्रधानमंत्री धन जमा योजना। सरकार ने कहा कि भागो बैंक की तरफ। हांका उठा कि सरकार हर खाते में लाखों रुपए डाल देगी और लोग रातोंरात लखपति बन जाएंगे। गोकि यह इस सरकार के मूल सोच का हिस्सा नहीं है। यह योजना मनमोहन सिंह के जमाने में ही लागू की जा चुकी थी, लेकिन उसका नाम और उसमें मिलने वाली सुविधा अलग थी। कि कोई भी खाताधारक किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक से पांच हजार रुपए तक ‘उधार’ ले सकता है।

इस सरकार ने उसे हांका में डाल दिया। भीड़ भागी बैंक की तरफ। खाते खुलवाने की होड़ में सारे करतब दिखाई पड़े। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक इस हांके से तर हो गए। लछमीना कहारिन, बिरजू पंडित, लम्मरदार सिंह वगैरह, जो इस हांके के जोरदार धावक रहे, मुंह बाए खड़े रह गए, जब उनके सवाल- कि कितना पैसा आया खाते में का उत्तर यह मिला कि- कैसा पैसा? इसमें पैसा डालोगे नहीं, तो आएगा कहां से?

दूसरा सवाल हांका में ठेले गए मजलूमों ने उठाया- सरकार ने हमारे खाते में कुछो नहीं डाला? बैंक ने घुड़की दी। यह सवाल सरकार से पूछो। सरकार का जवाब वही होगा, जो काले धन की वापसी पर था- वजीरे तिजारत जनाब अरुण जेटली ने जो संसद में दिया था- सरकार ने कब कहा था कि वह काला धन वापस लाएगी? संसद खामोश हो गई। यह सच है कि सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह काला धन वापस लाएगी। वह तो चुनाव का हांका था। चुनाव से पूछो। सरकार उसका क्या जवाब दे?

अब इस सरकार ने समझ लिया है कि देश को जंगली करतब से कैसे चलाया जा सकता है। इसके लिए उसके पास तरह-तरह के कारकून हैं। कोऊ मुखहीन, विपुल मुख काहू। आपने चुनाव के समय जो वादे किए थे उसे टालने और किसी अघोषित कार्यक्रम को लागू करने के लिए एक हांका लगा दीजिए, बस। सवाल तो सवाल दबेगा, अपने गुप्त कार्यक्रम लागू करने की पृष्ठभूमि बनेगी। उदाहरण के लिए ‘घर वापसी’।
यह हांका वे लगा रहे हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई के समय मुसलमानो भारत छोड़ो का हांका लगाया था। उन्हें बेघर किया था। घर के नाम पर मुल्क तोड़ने में लीग की मदद की थी। मुल्क टूट कर आजाद हुआ। तोड़ने का अपराध इन पर न लगे, इसके लिए सबसे पहले ‘अखंड भारत’ की रामनामी ओढ़ कर सामने खड़े हो गए। आज भी उनकी कांख में विशुद्ध हिंदू गोत्रवाद की कटार लटकी हुई है। उनके पास एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है, जिसमें मात्र हिंदू हों, दूसरे नहीं।

इन्हें अब मुसलमानों से कम, ईसाइयों से ज्यादा खौफ है, धर्म परिवर्तन के मसले पर। इसलिए ये एक विधेयक लाना चाहते हैं कि धर्म परिवर्तन को पहले रोका जाए। सरकार की यह पहली प्राथमिकता है कि वह एक कानून बनाए, जिससे आप अपनी चाहत का धर्म न चुन सकें। यानी इस तरह नागरिक अधिकार में कटौती की जा सकेगी।

मुसलमानों के प्रति इनकी नाराजगी जगजाहिर है। उनकी बढ़ती आबादी से इन्हें चिंता होती है। उसे रोकने के लिए इनके हांकाबाजों ने पहले दस, फिर पांच, अब चार का नारा दिया है। आप इस हांके के साथ हैं या फिर विरोध में और जम कर अपने गुस्से का इजहार कर लीजिए, फिर सरकार बीच में आएगी और संतति कानून बना कर बता देगी कि आपको कितने बच्चे पैदा करने हैं।
इस तरह की हांकाबाजी से उनको दो फायदे मिल रहे हैं। एक, जिन मुद्दों पर ये चुन कर आए हैं, वे दरकिनार हो जाएंगे और दूसरा, ये अपनी गुप्त नियति को नीति की शक्ल देकर अगले हांके की तैयारी में व्यस्त हो जाएंगे। क्योंकि इस सरकार के पास न तो कोई दिशा है, जो आगे की तरफ ले जाए, न ही कोई व्यापक दृष्टि है, जो देश को विकास की डगर पकड़ा सके।

‘एक नेता, एक झंडा, एक राष्ट्र’ इनका नारा ही नहीं सोच का मजबूत हिस्सा रहा है। ये उसी डगर पर हैं, लेकिन एक बात भूल जाते हैं कि इस मुल्क में जनतंत्र और संवाद की निरंतरता जन-जन तक पहुंच चुकी है। और वह इसे धर्म के रूप में अख्तियार कर चुकी है। जो भी इसके विपरीत जाकर किसी और तंत्र की बात करेगा या उधर बढ़ेगा वह गर्त में जाएगा।

इस देश का शासनतंत्र बहुदलीय है और जनतंत्र के खांचे में है। बहुदलीय व्यवस्था में केवल सत्तापक्ष तक सत्ता महदूद नहीं रहती। प्रतिपक्ष की भी भूमिका होती है। सदन एक मंच है, जिस पर सवाल उठते हैं और उसका जवाब सरकार को देना पड़ता है। किसी सवाल पर सदन में प्रधानमंत्री की गैर-मौजूदगी इस बात की गवाह है कि सरकार मुद्दों पर बात करने से घबरा रही है। या फिर उसके पास वाजिब जवाब ही नहीं है।

इतना ही नहीं, जितनी बार प्रधानमंत्री सदन में आए हैं, उन्हें बार-बार माफी मांगनी पड़ी है। चाहे वह ‘हरामजादा’ का सवाल हो या साक्षी महाराज की बात। गोकि ये सब उल-जलूल बातों के बीच से अपने को छिपा ले जाने का करतब प्रधानमंत्री भले खेल जाएं, लेकिन कब तक और कितनी बार?…
और यह भी सच है कि प्रतिपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन भी उस तरह से नहीं कर पा रहा, जिस तरह होना चाहिए। जब देश का प्रधानमंत्री अपने मंत्री के शर्मनाक वक्तव्य (हरामजादे) पर सफाई दे रहे थे, तो उन्होंने दो बातें कहीं। एक, कि कम पढ़ी-लिखी हैं। चलिए यह बात कुछ पचाने लायक है, क्योंकि हम जिस तरह की पढ़ाई में उलझे पड़े हैं, उससे कोई गुणात्मक सोच विकसित नहीं हो सकता।

दूसरा तर्क निहायत भद्दा था, जब नेता सदन ने यह कहा कि वे ‘गांव’ से आती हैं। मतलब साफ था कि गांव के लोगों के पास एक असभ्य भाषा है। उनके पास बोलने की तमीज नहीं है। जबकि सदन की सच्चाई इससे कत्तई अलहदा है।

भारतीय समाज की बुनावट ही गांव से शुरू होती है और गांवों पर जाकर टिक जाती है। इतना ही नहीं, संसद के जितने भी मुखर वक्ता हैं, सबके सब गांवों के ही रास्ते से इस हवेली तक पहुंचे हैं। लेकिन एक भी कुर्सी से प्रतिवाद की आवाज नहीं उठी।

प्रतिपक्ष ने निराश किया है। सबसे ज्यादा निराश साम्यवादियों ने किया है। मजदूर, किसान, मजलूम की बात करने वाले साम्यवादियों की चुप्पी उनके किंकर्तव्य विमूढ़ की स्थिति बता रही है या फिर उनकी चालाकी। क्योंकि उन्हें भी जनतंत्र से, बहुदलीय व्यवस्था और विकेंद्रित सत्ता से परहेज रहा है। यह बात दीगर है कि कुछ सूबों में उन्हें भी जनतंत्रीय व्यवस्था से गद्दी तक पहुंचने की सुविधा मिल चुकी है।

वे इस वक्त किसी ऐसे अवसर की तलाश में हैं, जो देश के जनतंत्र को कमजोर कर दे और इन्हें आगे बढ़ने में सहूलियत हासिल हो जाए। साम्यवादियों की यह चतुराई इन्हें बार-बार मारती रही है, लेकिन ये अपनी आदत से बाज नहीं आते। सन सैंतालीस में अंग्रेजों की तानाशाही का समर्थन इन दोनों ताकतों ने किया था। 1975 में आपातकाल का भी समर्थन दोनों ने सार्वजनिक रूप से किया था। एक ने माफीनामा लिख कर और दूसरे ने खुला समर्थन देकर। मजे की बात यह कि जिस इंदिरा गांधी ने तानाशाही का प्रयोग किया था, उन्होंने सार्वजनिक रूप से जनता से माफी मांगी, लेकिन ये दोनों उस पर आज तक चुप्पी साधे पड़े हैं।

अब प्रतिपक्ष की नहीं, बल्कि जनतंत्र की हिफाजत की जिम्मेदारी कांग्रेस की बनती है। उसकी चुप्पी अखरती है। लेकिन अभी वक्त है कि वह संसद और सड़क को गरम करे और उन सवालों को उठाए, जो देश की समस्या है। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि पर व्यापक माहौल तैयार करे। लेकिन यह खयाल रहे कि सवाल भर उठा देना किसी सियासी पार्टी का कर्तव्य नहीं है, उसका निदान भी जनता के सामने रखती चले और उस पर जनमत को देखे।
यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इन सब समस्याओं का निदान केवल कांग्रेस के पास है, बशर्ते वह अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से उस पर उतरे। उदाहरण के लिए ‘दाम बांधो’, ‘फिजूलखर्ची पर रोक’, ‘विकेंद्रित और कुटीर उद्योग’ जैसे मसले पर उसकी पुरानी और स्पष्ट नीति रही है। छब्बीस जनवरी कांग्रेस की बहुत पुरानी तारीख है। उसे नई और परिमार्जित किया जा सकता है क्या?

 
चंचल

 

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