May 23, 2017

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बेबाक बोलः सिकुड़ता सच- बे-साख

हॉलीवुड अदाकारा मेरिल स्ट्रीप ने गोल्डेन ग्लोब पुरस्कार समारोह में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा तो दुनिया भर में उनके चर्चे हुए।

सांकेतिक तस्वीर

मीडिया के विभिन्न रूपों के जरिए पत्रकार जब विभिन्न पक्षों की आवाज बनने के बजाए खुद एक पक्ष बन कर कानफोड़ू शोर में नुमायां हो जाए तो उसकी साख पर सवाल उठते हैं। सत्ता सापेक्ष पत्रकारिता के लिए पारंपरिक मीडिया की साख पर सवाल उठ रहे थे तो बजरिए इंटरनेट नए मीडिया में हाशिए की आवाज उठनी शुरू हुई थी। लेकिन सर्कुलेशन, टीआरपी के आंकड़ों से हांफते पारंपरिक मीडिया को ‘क्लिक’ की चुनौती दे नए मीडिया ने और भी बेदम कर दिया। सर्कुलेशन के बरक्स क्लिक पर भी उन्हीं शक्तियों की इजारेदारी है जिन्होंने सार्वजनिक मंचों पर टकराती आवाजों को निगल लिया है। इसके हल में मीडिया संस्थानों के वित्तीय ढांचे और संपादकीय नीति को जनपक्षीय बनाने की बात की जा रही है। सहभागिता की पत्रकारिता के विकल्प सामने हैं। यह तो तय है कि हमें थोड़ा ठहरना होगा, सोचना होगा और जनपक्षीय बनना होगा। एक खास पक्ष का भोंपू बनने के बजाए जनपक्षधरता की राह ढूंढ़ने की कोशिश में इस बार का बेबाक बोल।

हॉलीवुड अदाकारा मेरिल स्ट्रीप ने गोल्डेन ग्लोब पुरस्कार समारोह में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा तो दुनिया भर में उनके चर्चे हुए। जब भारत में शाहरुख खान से यह सवाल पूछा गया कि भारतीय कलाकार इस तरह से बोलना कब शुरू करेंगे तो खान ने सीधे भारतीय मीडिया को आईना दिखाया कि वे सत्ता से ऐसे सवाल पूछना कब शुरू करेंगे। शाहरुख खान ने उन टीवी एंकरों पर भी सवाल उठाए जो किसी मुद्दे पर खुद एक पक्ष बन जाते हैं और परिचर्चाओं में अपनी ही आवाज बुलंद रखते हैं। और, पत्रकार बनने के बजाए एक मॉडल की तरह छोटे पर्दे पर नमूदार होते हैं। फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि खबर पत्रकार पढ़ रहा है या मॉडल अपने नाजोअंदाज दिखा रहा है।
पत्रकारिता सिखाने के संस्थान में पत्रकारिता की एक विद्यार्थी ने मुझसे सवाल किया कि हमलोगों ने कुछ समय पहले देखा था कि एक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सेल्फी लेने में वरिष्ठ पत्रकारों के बीच गुत्थमगुत्था जैसी स्थिति बन गई थी। तो हम कैसे भरोसा करें कि ये पत्रकार सत्ता के खिलाफ कुछ बोलेंगे या किसी मुद्दे को निष्पक्ष तौर पर रख सकेंगे?
छात्रा के सवाल के बाद टीवी पर चीखते-चिल्लाते वाचकों का दृश्य सामने उभरा तो खुद पर भी उछाले गए सवालों से दो-चार हुआ।

यह छात्रा जो कल किसी टीवी चैनल की एंकर बन सकती है या किसी अखबार की संपादक बन सकती है, सत्ता से पत्रकारिता के सेल्फी वाले रिश्ते पर उसकी चिंता हम सबकी साख पर सवाल उठा रही है। छात्रा ने मुझे इस बात का अहसास कराया कि हर संस्थान एक स्कूल भी होता है। हमारा लिखना, बोलना हमारी पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है तो हमें अपनी साख को लेकर सजग होना ही होगा। सत्ता सापेक्ष होती जा रही पत्रकारिता की साख पर सवाल दशकों से उठ रहे हैं। लेकिन हाल के सालों में ऐसा क्या हो गया है कि एक पत्रकारिता की छात्रा को लग रहा है कि उसके भावी कार्यक्षेत्र के वरिष्ठ जो कर रहे हैं वह उनकी साख गिरा रहा है, और उसके सामने मैं भी खुद को कठघरे में महसूस कर रहा हूं। उदारीकरण के बाद पिछले दो दशकों में वैश्विक पूंजी की इजारेदारी ने हर क्षेत्र में एक समरूपता की सी स्थिति पैदा की है। इसने हर क्षेत्र में टकराती आवाजों को निगल लिया है। ‘आवाजों’ की प्रतियोगिता खत्म हो गई है जिसका असर मीडिया में भी दिख रहा है।

पिछले पांच साल के हालात पर गौर करें तो जनता के सामने साख खोती सत्ता का विकल्प भी मीडिया के जरिए ही तैयार किया गया। जब कांग्रेस बढ़ते भ्रष्टाचार और जड़ प्रशासन के कारण अपनी साख खोती जा रही थी उसी समय मनमोहन सिंह के बरक्स नरेंद्र मोदी का चेहरा भी मीडिया के जरिए ही खड़ा हुआ। जड़ सत्ता के खिलाफ विकल्प का चेहरा तैयार करने के लिए सभी ने एका दिखाई। इसलिए कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ खड़ा मीडिया अब हमें भाजपा की सत्ता के सापेक्ष खड़ा दिखता है। और जिस मीडिया के जरिए विकल्प का चेहरा तैयार हुआ है अब हमें उसमें विरोधाभास के सुर सुनने को नहीं मिलते हैं। और, इन सबके साथ बिगड़ी संपादक की साख, जिसे महज प्रबंधन का एक हिस्सा मान लिया गया।
इन सबके खिलाफ आस जगी नए और वैकल्पिक मीडिया से जो हाशिए की आवाज को मंच दे रहा था। लेकिन प्रतिरोध की आवाज निकाल रहे नए मीडिया पर भी उन्हीं शक्तियों की इजारेदारी बढ़ रही है जिसने पारंपरिक और मुख्यधारा के मीडिया पर कब्जा किया। वरन उसने जनपक्षीय रुख लेकर चल रहे पारंपिक मीडिया पर अस्तित्व का संकट डाल दिया है। एक वेबसाइट पर अपने वीडियो के अपलोड होने के बाद सेना के जवान का खुदकुशी कर लेना हम सबके लिए मिल-बैठ कर सोचने का सबब है। स्टिंग और ब्रेकिंग की होड़ में हम एक इंसान को महज खबर, हिट, शेयरिंग और लाइक की तरह देखने लग जाते हैं। इस वीडियो को अपलोड करने के पहले दो मिनट बैठ कर सोचने का मौका नहीं मिला कि इसका किस पर और क्या असर पड़ेगा।

आज मीडिया विभिन्न पक्षों को मंच मुहैया कराने के बजाए खुद एक कानफोड़ू पक्ष बन जा रहा है। जो विकल्प का चेहरा आपने ही बनाया है और फिलवक्त जिसे बनाए रखना आपकी मजबूरी है तो आप उसके खिलाफ कैसे हल्ला बोल सकते हैं। इसलिए आप कश्मीर के मौसम, सलमान के एक्शन, करवा चौथ के चांद पर चीखने लगते हैं। और, इन सबके अलावा नवउदारवादी बाजार ने आपको राष्टÑवाद और देशभक्ति का झुनझुना भी पकड़ा दिया है जिसे आप दर्शकों के सामने बजाने लगते हैं। आप इसके लिए कभी कन्हैया कुमार तो कभी गुरमेहर कौर के खिलाफ उन्मादी की तरह हमला करते हैं। देश के ध्वज की आड़ में हो रही पत्रकारिता के साथ ही आए दिन छोटे-बड़े नेता नामी-गिरामी मॉडल पत्रकारों को बेइज्जती की हद तक जाकर शर्मसार कर देते हैं। उनके सवाल पूछने की समझ पर ही सवाल उठा देते हैं।

और, जिसे अभी उम्मीद की किरण बताया जा रहा था वह नया मीडिया तो और बड़े खतरे पैदा कर रहा है। उसकी वजह यही है कि उसके बहुत बड़े हिस्से में संपादक जैसे तत्त्व का अभाव। कौन क्या और किस भाषा में बात कर रहा है उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है किसी की जिम्मेदारी नहीं है। नियंत्रण शब्द मीडिया के क्षेत्र में जितना खलनायकनुमा है, जिम्मेदारी शब्द उतना ही नायकत्व भरा है। बस कैमरा, फोन और इंटरनेट के बजरिए आपको जो ताकत मिली है, उस ताकत की जिम्मेदारी का भी अहसास होना चाहिए। किसी ने कार में डांस करती लड़की के वीडियो को गुरमेहर का वीडियो बता कर इंटरनेट पर डाल दिया। वो लड़की कौर है या नहीं, लेकिन जो भी है उसकी गरिमा को नष्ट करने की आजादी कैसे मिल गई? फोटोशॉप और मीडिया की नई तकनीकों के कारण झूठ और सच में फर्क पकड़ने में इतनी देर हो चुकी होती है कि झूठ, सच बन कर आम लोगों के मानस में बैठ जाता है। हिट और शेयर के शोर में सच, समझदारी और संतुलन के बोल सुनाई ही नहीं पड़ते हैं।

और, सोशल मीडिया के अग्रेषित सच-झूठ से तो हमारे प्रधानमंत्री भी नहीं बच पाए। नोटबंदी के दौरान स्वाइप मशीन से भीख लेने का ‘कलात्मक वीडियो’ वायरल हुआ तो प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में आॅनलाइन भुगतान के पक्ष में यह तर्क दे डाला कि अब तो भिखारी भी स्वाइप मशीन से भीख मांगता है। फोटोशॉप की ‘कलात्मकता’ तो सरकार के शुरुआती दिनों में प्रधानमंत्री कार्यालय भी दिखा चुका था जब चेन्नई में आई बाढ़ के दौरान प्रधानमंत्री के हवाई दौरे की तस्वीरों के साथ सरकार की भोंपू संस्था प्रेस सूचना कार्यालय (पीआइबी) ने छेड़खानी की। जब सरकार से जुड़ी आला संस्थाएं ऐसी गैरजिम्मेदारी दिखा सकती हैं तो आम लोगों से क्या उम्मीद करें। तो, नए मीडिया पर भी झूठ के बरक्स सच सिकुड़ा हुआ है, इसे लेकर खेमेबंदी है। मेरे खेमे का फोटोशॉप और तकनीक सच और तुम्हारे खेमे का झूठ। जो जितनी जल्दी फैला, वही सच हो गया।

हाल ही में जारी एडेलमैन ट्रस्ट की मीडिया पर रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय मीडिया पूरी दुनिया का दूसरा सबसे अविश्वसनीय मीडिया है। यानी लोगों का मीडिया पर भरोसा नहीं है। आपकी टीआरपी इसलिए बढ़ रही है कि लोगों को यह फर्क नहीं पड़ता कि वे ‘ससुराल सिमर का’ देख रहे हैं या न्यूज चैनल पर दिखाई जा रही ‘नागिन कथा’। बुद्धु बक्से से बस फुर्सत के पलों में मनोरंजन करना है और आज ‘कोमोलिका’ क्या बोलेगी की तरह इसी उत्सुकता से टीवी खोलते हैं कि आज वह वाचक किस तरह से और कितनी जोर से एक सांस में अपनी बात कहेगा।

इन दिनों विज्ञापनों की भाषा पर गौर करें। पौष्टिक पेय पदार्थों के विज्ञापनों में बेटा और बेटी दोनों को तवज्जो दी जाती है, वाशिंग मशीन के विज्ञापन में पति भार की भागीदारी करता है, गहनों को कामकाजी महिलाओं के साथ जोड़ा जा रहा है, स्कूटी चलाती लड़की कहती है कि सारे मजे लड़के ही क्यों करें, एकल महिलाओं का सम्मान किया जा रहा है, भेदभाव के खिलाफ आवाज उठ रही है। बाजार ऐसी समतामूलक भाषा के साथ अपनी साख बना रहा है। तो क्या एकतरफा चीख रहे और लिख रहे खबरनवीसों के लिए यह चेत जाने का समय नहीं है? खबरिया चैनलों और ‘ससुराल सिमर का’ में, खबरनवीसों की रिपोर्ट और ‘मनोहर कहानियां’ में फर्क दिखाना हम जितना जल्द शुरू करें उतना अच्छा है। आखिर बे-साख तो कोई नहीं होना चाहता।

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First Published on March 11, 2017 4:15 am

  1. प्रवीण
    Mar 11, 2017 at 3:07 pm
    बहुत सटीक लेख। एक नज़र जनसत्ता के पेजेस पर भी रखें जो clickbaits से भरी रहती है।
    Reply
    1. R
      rahul
      Mar 11, 2017 at 6:05 am
      अब यह प्रयास बेमानी हो चुका है कि सत्ता (हवा) के विपरीत जाकर कोई पत्रकार उस हकीकत से रुबरु कराए जो तमाम दावो के बावजुद धरातल परनजर ही नही आते एक खुबसुरत भविष्य के सपनो की मार्केटिंग जिसकी बढिया है वह शहंशाह है वह सवालो के जवाब कभी खुले मंच पर नही बल्कि अपने चहेते मीडिया स्टुडियो मे कई टेक लेकर फींके साथ उचित मौके पर देता है यह सभी राष्ट्रभक्तचैनल होते हैं
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