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बेबाक बोलः सियासत का संदेश

भाजपा से नाता टूटने के बाद हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला से सवाल पूछा गया था कि क्या उनके भाजपा के साथ फिर से गठजोड़ की संभावना है।
परिकल्पना : अनुराग अन्वेषी

आयाराम-गयाराम जैसा मुहावरा देने वाली भारतीय राजनीति हमेशा से विडंबनाओं से भरी रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से लोकतंत्र में जो प्रहसन चल रहा है वह बिहार से लेकर गुजरात तक डरावने मुहावरे गढ़ रहा है। चुनावी लोकतंत्र का प्रबंधन में तब्दील हो जाना, महज तीन साल में भाजपा का कांग्रेस हो जाना और कांग्रेसयुक्त भाजपा को आधुनिक चाणक्य की प्रयोगशाला बताना। खरीद-फरोख्त और शक्तियों के प्रयोग से सियासी समर्पण को तुरुप का पत्ता और चतुर राजनीति की संज्ञा दी जा रही है। कल तक ‘किचन कैबिनेट’ के चेहरा रहे अहमद पटेल आज लोकतंत्र के लिए आस हैं तो भाजपा में आने के बाद हर दागी चेहरा साफ है। जन से दूर होकर प्रबंध कर रहे भारतीय जनतंत्र के ताजा अध्याय पर इस बार का बेबाक बोल।

भाजपा से नाता टूटने के बाद हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला से सवाल पूछा गया था कि क्या उनके भाजपा के साथ फिर से गठजोड़ की संभावना है। इसके जवाब में इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ने बड़ी ही बेबाकी से कहा था, ‘राजनीति में संभावनाओं का कोई अंत नहीं होता है’। भाजपा सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी इसी सरकार से नाराज होकर हाल ही में पत्रकारों से कहते हैं, ‘तुमसे पहले वो जो शख्स यहां तख्त-नशीं था, उस को भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था’। गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के चुनाव ने भारतीय राजनीति के कई चेहरों को बेनकाब करने के साथ कई संदेश दिए हैं। इसके पहले तक किसी राज्यसभा की सीट के लिए मीडिया से लेकर आम जनता तक में इतनी रुचि कब जगी थी, यह याद नहीं। और, यह रुचि उन्हीं ‘चाणक्य’ ने पैदा कर दी जो ऐसे डॉक्टर के रूप में मशहूर हो गए कि अल्पमत हो या बहुमत – कहीं पर भी सरकार बनवा देंगे। इस तख्तनशीं को ‘खुदा नहीं, तो खुदा से कम भी नहीं’ की छवि के साथ जोड़ दिया गया। गोवा, मणिपुर और बिहार के बाद राज्यसभा की गुजरात सीट को इनके मीडिया प्रचारकों ने प्रतिष्ठा की सीट बताया। शाह के उस शाहकार का इंतजार किया जाने लगा कि विधानसभा चुनावों के पहले ही कांग्रेस की तेरहवीं हो जाए।

बकौल चौटाला, राजनीति में संभावनाओं का कोई अंत नहीं होता। जहां गुजरात में कांग्रेस के श्राद्धकर्म की तैयारी थी, इसके उलट नई संभावनाओं के जन्म का मंगलगीत गूंजा। चुनावी शाहकार रचने वाला खेमा भविष्यवाणी करने में जुटा था कि अहमद पटेल की सीट छीनकर सोनिया गांधी के युग का खात्मा कर दिया जाएगा, उनके मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया जाएगा। लेकिन हुआ इसके उलट। अगर यह सोनिया की प्रतिष्ठा की लड़ाई थी तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए कांग्रेस को संजीवनी दे दी। और, जिस सीट से अहमद पटेल को हराने की जी-तोड़ कोशिश की गई उस सीट पर कांग्रेस के दो विधायकों का अपना मतपत्र भाजपा के प्रतिनिधियों को दिखाना क्या बता गया? इन दो विधायकों को जनता ने कांग्रेस पार्टी की तरफ से सदन में भेजा था। इस चुनाव में प्रत्यक्ष रूप से जनता नहीं, उनके प्रतिनिधि लड़ते हैं। तो ये दो विधायक सीधे तौर पर कांग्रेस के मतदाताओं से कह रहे हैं कि लीजिए हमने आपका वोट भाजपा को बेच दिया।

और, अबकी बार बिहार का लक्ष्य पूरा होते ही ‘चाणक्य’ गुजरात का रुख करते हैं। यहां प्रवेश करते ही कांग्रेस के 57 विधायकों में से 14 का मन बागी हो उठता है। बिहार में नीतीश कुमार के बाद गुजरात में शंकर सिंह वाघेला अंतरात्मा की आवाज सुन हे राम से जय श्रीराम की ओर प्रस्थान करते हैं। और, कांग्रेस अपने विधायकों को लेकर कर्नाटक जैसे सुरक्षित राज्य में पहुंचती है जहां उसकी सरकार है ताकि उसके बचे विधायकों की खरीद-फरोख्त न हो जाए। लेकिन आपकी सरकार वाला राज्य है तो क्या, केंद्रीय एजंसी उस रिसॉर्ट पर छापा तो मार ही सकती है, जहां कांग्रेसी वोटों को नजरबंद किया गया था। तो, केंद्रीय एजंसियां किस तरह से नजरबंद वोटों तक पहुंच सकती है – इसका भी उदाहरण केंद्र सरकार ने दे डाला। इसके साथ ही इन एजंसियों की साख को और भी कमजोर किया। यह तो साफ संदेश गया कि कांग्रेस के सारे विधायक बिक सकते थे और संदेश यह भी है कि भाजपा उसके सारे विधायकों को खरीद सकती थी। एक पार्टी खरीद सकती है और दूसरी बिक सकती है। कांग्रेसमुक्त करने के लिए भाजपा कांग्रेसयुक्त हो सकती है। खरीद-फरोख्त वाले नेताओं के जनतंत्र के साथ इस सेल्फी को राजनीतिक मूल्यों की किताब में किस तरह पढ़ाया जाएगा, यह तो आनेवाला वक्त बताएगा।

बिहार से लेकर गुजरात तक यह दिख ही गया कि भाजपा और कांग्रेस की बात छोड़ें, लोकतंत्र बुरी तरह हार रहा है। हालिया सियासी घटनाक्रम का दुखद पहलू यह रहा है कि चौटाला ने जिस संभावना को अंत से परे कहा था, उसके अंत की भी घोषणा कर जम्हूरियत की जमीन दरकाने की कोशिश की गई। दिल्ली से चले सीबीआइ और अन्य जांचों का हश्र देख नीतीश कुमार ने अंत से बेहतर समर्पण समझा। लेकिन उन्होंने अपने अंत को लोकतंत्र का अंत घोषित करने की कोशिश की। जब वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी अजेय हैं, 2019 में उन्हें कोई हरा नहीं सकता तो हम उनका समर्पण देख सकते हैं, उनकी आंखों में संभावनाओं की मौत का संदेश पढ़ सकते हैं। जिस नीतीश कुमार को जनता ने भाजपा को हराने के लिए वोट दिया और भाजपा को हराया भी गया, वही नीतीश कुमार जनता को डराते हैं कि अब भाजपा को हराया नहीं जा सकता।

इसके साथ ही राजनीतिक मूल्यों को खारिज करने की भी नई प्रयोगशाला तैयार हुई। गोवा, मणिपुर से लेकर बिहार तक अवसरवादिता और जोड़तोड़ को ‘मास्टर स्ट्रोक’ और ‘स्मार्ट राजनीति’ का खिताब दिया जाने लगा। अमित शाह को नए समय का चाणक्य कहा गया जिन्होंने तीन साल में भाजपा की सूरत बदल दी। राजनीतिक शुचिता पर बात करने वाला राजनीति से बेदखल कर दिया गया।  लेकिन दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा, मणिपुर से लेकर गुजरात तक की बात करें तो तीन साल में यह कैसी भाजपा बनी है। जो कल तक दागी थे, कांग्रेस के बागी बन भाजपा में आते ही शुद्ध हो गए। कांग्रेस, बसपा, सपा सभी पार्टियों के दागियों के दाग आपके गले लगते ही साफ हो जाते हैं। तो आप कांग्रेस को कमजोर कर कांग्रेस संस्कृति को मजबूत कर चुके हैं। अब हमें भी इसे शाहकार मान लेना चाहिए क्योंकि तीन साल पहले कांग्रेस का यूं भाजपा हो जाना किसी ने सोचा भी न था।
तो, गुजरात में लोकतंत्र के लिए राहत की इतनी सी बात रही कि उसके सारे विधायक भाजपाई नहीं हुए और उसे आगे की लड़ाई के लिए जिंदा भी मान लिया गया है। लेकिन कांग्रेस को हाल ही में कही जयराम रमेश की इस सलाह को नहीं भूलना चाहिए कि देश बदल रहा है और कांग्रेस को बदलना चाहिए। उसे कम से कम अब तो सल्तनत के सुल्तानों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। अहमद पटेल की जीत को जनता की तरफ से विपक्ष या लोकतंत्र की जीत भी नहीं मान लेना चाहिए।

इस पूरे मसले पर चुनाव आयोग ने अपनी विश्वसनीयता बढ़ाई है, इसमें कोई शक नहीं। वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त का नाम मोदी और गुजरात से जोड़ा जाता रहा है। वे नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री काल वाले गुजरात में लंबे समय तक काम कर चुके हैं। इसके साथ ही आयोग के बहुत से सदस्यों की नियुक्तियां भी मोदी सरकार के आने के बाद हुई हैं। इन दिनों बहुत सी संवैधानिक संस्थाओं पर जिस तरह से सवाल उठ रहे थे, वैसे में चुनाव आयोग के लिए भी यह छवि निर्माण का मौका था। पिछले दिनों ईवीएम और वीवीपैट जैसे मुद्दों को लेकर आयोग भी सवालों के घेरे में था और इस बार भी भाजपा के सदस्यों ने पुरजोर तर्क देने की कोशिश की थी कि आयोग को राज्यसभा चुनाव में दखल देने की शक्ति नहीं है। लेकिन उठने-गिरने और खरीदने-बिकने में जख्मी हुए लोकतंत्र पर आयोग ने मरहम लगाने का काम तो किया ही।

लेकिन, आयोग के इस मरहम और अहमद पटेल की इस जीत को भी अभी की राजनीतिक शब्दावली में अमित शाह के प्रबंधन की हार माना जा रहा है। प्रचारित यही किया जा रहा है कि पटेल हारते-हारते जीते हैं। आखिर जो सीट भाजपा की थी ही नहीं, वह भाजपा के पाले में जा कैसे रही थी। प्रशांत किशोर जैसे दुकानदारों का एक-दो माल लोकप्रिय हो जाने के बाद उनका यही ‘प्रबंधन’ अब आधुनिक चाणक्य के हाथ में है। ‘मैनेज करना’ अब नया राजनीतिक मूल्य है। बिहार से निकली अंतरात्मा की आवाज गुजरात पहुंचते ही बर्खास्त हो जाती है। डर यह है कि इन बागी नेताओं के इस प्रहसन में जनता लोकतंत्र को लेकर मलिक मुहम्मद जायसी की तरह बैरागी न हो जाए। जिस पद्मावती की खोज में युद्ध लड़ा अलाउद्दीन खिलजी को जौहर के बाद उसकी राख हासिल होती है। और उस वक्त खिलजी के लिए दुनिया के निरर्थकता के अहसास को जायसी ‘पद्मावत’ में यूं लिखते हैं-
‘छार उठाए लीन्हीं एक मूठी, दीन्हीं उड़ाय पिरिथमी झूठी’
(पद्मावती ने जौहर कर लिया वह राख हो गई। उसे जबरन पाने की कोशिश करने वाले अलाउद्दीन को नि:सारता, निराशा का अहसास हुआ है। सत्य का ज्ञान। पद्मावती का कौन सा रूप सत्य? पिरिथमी यहां जगत है। यह ज्ञान कि जिसे वह सत्य मानता था वह तो राख हो गया)

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