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बेबाक बोलः पांच साल- लोकपाल से केजरीवाल तक

बजरिए जंतर मंतर और रामलीला मैदान, नए मिजाज के मध्यवर्गीय तबके के समर्थन से जनलोकपाल का नारा लगाते हुए आम आदमी पार्टी का गठन होता है। इस नवंबर अपने पांच साल पूरे कर लेने वाली पार्टी इस बात पर कोई आंदोलन नहीं करती है कि अब जंतर मंतर पर आंदोलन नहीं हो सकता। पनामा से लेकर कालेधन की जन्नत पर ‘सब मिले हुए हैं जी’ के कोरस में उनकी चुप्पी भी मिल गई है। क्योंकि ‘आप’ का भ्रष्टाचार सरकारी बाबुओं की रिश्वतखोरी और मोबाइल स्टिंग तक सिमट जाता है। आम आदमी के भरोसे के वृक्ष की शीर्ष फुनगी पर केजरीवाल तो बैठे हैं, पर जब कुमार विश्वास कहते हैं कि जड़ों की ओर लौटो, तो इसकी बुनियाद रखने वाले सारे जड़ से छिटके हुए दिखते हैं। आज जनलोकपाल आंदोलन का हासिल सिर्फ केजरीवाल हैं। ‘आप’ की पांचवीं सालगिरह पर इस बार का बेबाक बोल।
‘आप’ की पांचवी सालगिरह पर लेख

मोबाइल पर आए उनके हर संदेश के अंत में लिखा होता है वंदे मातरम्। राष्ट्र प्रथम, यह वह पिछले कई सालों से बोल रहे हैं। वे कहते हैं कि वंदे मातरम् संघ नहीं कांग्रेस का नारा है। भारत माता की जय के साथ ही कांग्रेस की शुरुआत हुई थी। अखिल भारतीय आतंकवादी विरोधी दस्ते के अगुआ मनिंदरजीत सिंह बिट्टा यह सब कहते हुए अचानक गुस्से में उबल पड़ते हैं, ‘देशभक्ति करना तो केजरीवाल की तरह मत करना। देश की बात करना लेकिन रामलीला मैदान की तरह उसका मजाक मत उड़ाना’। राष्ट्र प्रथम बोलने वाले व्यक्ति की केजरीवाल से ऐसी घृणा क्यों? वो कांग्रेस वाली संस्थागत घृणा क्यों नहीं, यह केजरीवाल वाली व्यक्तिपरक घृणा क्यों? क्या इसलिए कि अरविंद केजरीवाल ने खुद को आम आदमी पार्टी का पर्याय बना लिया?

इससे पहले आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक कुमार विश्वास बेधड़क बोलते हैं कि हमें जड़ों की ओर लौटना होगा। जो लोग हमसे छिटक गए हैं उन्हें वापस लाना होगा। हम भी अगर जाति और मजहब की राजनीति करेंगे तो लोग हमें नकार देंगे और ऐसा हुआ भी। हम अब भी नहीं चेते तो जनता विकल्प पर भरोसा नहीं करेगी। ये बातें हो रही हैं उस पार्टी के बारे में जो आम आदमी का भरोसा बनकर आई थी। इस नवंबर में पार्टी ने अपनी स्थापना के पांच साल पूरे कर लिए हैं। लेकिन इन पांच बरस में ऐसा क्या हो गया कि अण्णा अब केजरीवाल के साथ नहीं हैं, योगेंद्र यादव अलग हैं और बिट्टा जैसे लोग जो भारत माता की जय के नारे के साथ भावनात्मक रूप से इनसे जुड़े थे – अब इन्हें देशभक्ति के विपरीत मानते हैं।

वो जंतर मंतर और रामलीला मैदान। वंदे मातरम् और ये देश है वीर जवानों का गीत गाते जवान। कई तरह के स्वयंसेवी संगठनों के बैनर तले जुटा मध्यम वर्ग का तबका। इन सबके साथ ही बनी थी आम आदमी पार्टी जिसे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था। उस वक्त जो इनके साथ नहीं था वह भ्रष्टाचारियों के साथ था, वैसे ही जैसे कभी जो जॉर्ज बुश के साथ नहीं था आतंकवादियों के साथ था। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा करने वाली आम आदमी पार्टी ने इतिहास रचा और कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ कर दिल्ली में अपनी सरकार बनाई। आज आप बिट्टा की आवाज को गोलवलकर की आवाज के साथ जोड़ सकते हैं, लेकिन इस सच को खारिज नहीं कर सकते कि उस वक्त जंतर मंतर और रामलीला मैदान पर उन्हीं लोगों ने आम आदमी पार्टी का झंडा उठाया था जो बिट्टा के साथ राष्ट्र की शपथ खाते थे, जो खुद को देशभक्त कहलवाना पसंद करते थे।

दिल्ली में सरकार बनते ही ‘आप’ के अंदर क्षेत्रीय बनाम अखिल भारतीय का विवाद उठा। बहस हुई कि पार्टी का स्वरूप स्थानीय रहे या राष्ट्रीय। इस बुनियादी बहस में ही योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोग छिटक गए और नई पार्टी स्वराज इंडिया का गठन हो गया। यह बिखराव ही बताता है कि आप अपनी बुनियाद या आपका चरित्र कैसा हो – यह भी तय नहीं कर पाए थे। दूसरा बिखराव आया नीतिगत मुद्दों पर। आपके केंद्र में थी आम आदमी पार्टी। इसमें भी आपने दिल्ली के मध्यवर्ग को लुभाने वाली नीतियों का दामन पकड़ा। बड़े पैमाने पर देखें तो पार्टी आम आदमी को लेकर ही अपनी नीति स्पष्ट नहीं कर पाई थी। न्यूनतम मजदूरी का कानून तो पास कर दिया लेकिन उसे लागू कैसे करेंगे – इस पर चुप्पी साध ली। इसी तरह शिक्षा का सवाल है। बजट तो बढ़ा दिया, लेकिन उसके लिए धन कैसे आएगा और उसे कैसे लागू किया जाएगा – इसका कोई रोडमैप नहीं है। मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजनाएं तारीफ के काबिल हैं। लेकिन छिटपुट योजनाओं को छोड़ कर आप कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई विकल्प नहीं दे पाए।

आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार को अपना आधार बनाया था और वह इस पर ही कोई आख्यान गढ़ने में नाकाम रही। सोशल मीडिया पर अब भी आपको केजरीवाल की बातें मिल जाएंगी ‘घूस लेते देखो तो स्टिंग करो जी, वीडियो बनाओ जी’। भ्रष्टाचार का वही लोकलुभावन आख्यान था, बाबुओं की घूसखोरी और इसका समाधान बताया मोबाइल फोन को। ‘आप’ की भी वही कांग्रेसी और भाजपाई अवधारणा थी कि पूंजीवाद के अंदर भ्रष्टाचार न हो। अगर भ्रष्टाचार है तो उसके जिम्मेदार सरकारी बाबू। सारा ठीकरा सरकारी बाबुओं पर फोड़ कर भ्रष्टाचार के बुखार को कितने दिन कम किया जा सकता था। और, सबसे गजब रही लोकपाल पर चुप्पी। जिस लोकपाल पर पूरे आंदोलन की बुनियाद रची गई थी, वह बस सरकारी बाबुओं पर गाज गिरा कर चुप था। न तो उसके नीचे कोई भ्रष्टाचार था और न उसके ऊपर।

और, इन सबके बीच वही मोबाइल फोन और वही स्टिंग आपके मंत्रियों को एक के बाद एक सलाखों के पीछे भेज रहा था। आप जिस स्मार्ट फोन क्रांति को भ्रष्टाचार पर लागू करने के सपने दिखा रहे थे, वही स्मार्टफोन आपके सपने तोड़ रहा था। शायद आपकी फोन क्रांति से ही प्रेरणा लेकर आपके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी ने भी एक स्मार्ट फोन को सारी समस्याओं का समाधान मानते हुए नोटबंदी करवा दी थी। जैसे आप मोबाइल फोन से भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते थे, वे भी मोबाइल फोन से कालाधन खत्म करना चाहते थे। यानी कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी हुई आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों के पास भ्रष्टाचार के खिलाफ एक र्स्माटफोन आख्यान ही था। और अब तो करचोरों के पनामा और जन्नत के बीच आपकी भाषा में सब लोग मिले हुए हैं ही जी। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन भी ठंडे बस्ते में बंद है।

वहीं नीतिगत मसलों पर दिल्ली से बाहर जाने के विमर्श में आम आदमी पार्टी पर सिर्फ कांग्रेस को कमजोर करने के आरोप लग रहे हैं। गोवा से लेकर पंजाब तक वह जिस तरह से कांग्रेस की वोटकटवा दिखती है, इन आरोपों में दम भी दिखता है। नहीं तो आखिर क्या वजह है कि ‘आप’ दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ती है, लेकिन गुजरात में आपकी पूरी तैयारी है। खासकर बिहार में जहां आपकी पूरी संभावना थी, वहां से आप दूर-दूर ही रहे। यानी जहां कांग्रेस का वजूद नहीं है, वहां आम आदमी पार्टी नहीं जा रही है।

यह पार्टी आम लोगों के लिए कोई नीतिगत रोडमैप बनाने में नाकाम रही। फिलहाल जिस दिल्ली को पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर आर या पार वाला फैसला लेना था वहां आम आदमी पार्टी भी परंपरागत दलों की तरह चुप्पी साध चुकी है। श्रम कानूनों और निगमों को लेकर तो भाजपा और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ते ही रहती हैं। लेकिन ‘आप’ नए मिजाज के लोगों की पार्टी थी और पर्यावरण व प्रदूषण पर वह क्रांतिकारी कदम उठाने का श्रेय ले सकती थी। लेकिन वह भी यमुना तट पर श्रीश्री रविशंकर से जुड़े कलाकारों का सितारवादन सुनने में जुट गई थी और अब पानी सिर से गुजर जाने पर सम-विषम की औपचारिकता निभा दी।

‘भारत माता की जय’ वाली राजनीति भारतीय जनता पार्टी के नाम की जा चुकी है और ‘हिंदू-मुसलिम-सिख, ईसाई हम सब हैं भाई-भाई’ वाली लोकतांत्रिक उदारवादी राजनीति पर अभी तक कांग्रेस की दावेदारी है। आम आदमी की पार्टी की राजनीति से वंदे मातरम् और ईद मुबारक निकाल दें तो बचता क्या है? फिलहाल तो इसके जवाब में खूब सारा हंगामा है, जिससे दुखी होकर जनता कई जगहों पर आपको खारिज कर ही चुकी है। जनलोकपाल के नारे वाली पार्टी के पास अब सिर्फ हैं केजरीवाल।

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