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बेबाक बोलः पहचान की परतें- उत्तर सत्य

उत्तर प्रदेश में चुनावों के पहले एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने बॉब डिलन का उदाहरण देते हुए कहा कि वे परिवर्तन के वाहक थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम के दौरान। (Image Source : PTI Photo)

‘समूचे संसार से, सभी माता-पिता आएं, और वे जिसे नहीं समझ सकते, उसकी आलोचना न करें। आपके बेटे और बेटियां, आपके आदेशों से भी आगे हैं। आप तेजी से बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। अगर आप बदलाव में हिस्सेदार नहीं हो सकते तो इस नवीनता से अलग हो जाएं’। नोटबंदी के बाद एक समारोह में प्रधानमंत्री ने बॉब डिलन के गीत ‘द टाइम्स दे आर चेंजिंग’ के शब्दों में कुछ फेरबदल करते हुए ये पंक्तियां कहीं तो उस वक्त कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा पाया था कि उत्तर प्रदेश चुनावों के नतीजे उन्हें परिवर्तन का वाहक साबित कर ही देंगे। इस परिवर्तन की अपनी-अपनी व्याख्या हो सकती है। लेकिन इस बार इसे सिर्फ मोदी नहीं जीते कांग्रेस हारी है कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। नरेंद्र मोदी ने पहचान की राजनीति का पूरा पाठ्यक्रम ही बदल डाला है। उत्तर प्रदेश में मोदी की जीत के परिप्रेक्ष्य में पहचान की परतों पर इस बार का बेबाक बोल।

उत्तर प्रदेश में चुनावों के पहले एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने बॉब डिलन का उदाहरण देते हुए कहा कि वे परिवर्तन के वाहक थे। वह नोटबंदी का समय था और एक केंद्रीय मंत्री कह रही थीं कि नोटबंदी से मोदी कार्ल मार्क्स का सपना पूरा कर रहे हैं। मोदी आठ नवंबर के बाद से इस कड़े फैसले को गरीबों के हक में लिया बता रहे थे। मेरा प्यारा गरीब… कह कर अपने मन की बात कहते हुए इस कदम को बार-बार अमीरों के खिलाफ और गरीबों के हक में लिया बता रहे थे। कार्ल मार्क्स के शब्दों में जिन गरीबों के पास खोने के लिए कुछ नहीं था, उत्तर प्रदेश में वही इस फैसले में मोदी के साथ हो गए। आखिर क्यों? क्योंकि सब कुछ हारे हुए लोगों को मोदी यह समझाने में कामयाब रहे कि तुम्हारे पास ईमानदारी है, देशभक्ति है जो अमीरों के पास नहीं है। जब मोदी अपने फैसले को गरीबों के हक में बता रहे थे, तो विपक्ष क्या कर रहा था? एक-दो जगहों पर सांकेतिक तौर पर आने के अलावा उन्होंने इसके खिलाफ कुछ भी हल्ला नहीं बोला। और उसके बाद आते हैं उत्तर प्रदेश के चुनाव। राहुल और अलिखेश सिर्फ चुनाव जीतने के लिए एक हुए। चुनावों के ऐन पहले और चुनावों के बाद महागठबंधन की बात करने वालों ने क्या वंचितों को इंसाफ दिलाने के लिए किसी तरह का गठबंधन किया? इनके गठबंधन का जो पाठ जनता के सामने आ रहा था, वह था सत्ता की भूख। जब आपकी भाषा थी कि हम मोदी को हराने के लिए एक हुए हैं तो मोदी लोगों को बता रहे थे कि देखो सभी बेईमान एक हुए हैं, मैंने काफी हमला झेला है, मुझे संसद में नहीं बोलने दिया जाता है…।

पिछले तीन दशक में नवउदारवाद के साथ उभरी पहचान की राजनीति का उल्लेख इस स्तंभ में कई बार किया गया है। लोकसभा चुनावों में मोदी ने हिंदुत्व की पहचान का धु्रवीकरण किया और बजरिए उत्तर प्रदेश केंद्र की सत्ता को फतह किया। इसका जवाब बिहार में दिया गया और मोदी के खिलाफ जाति और अन्य पहचान से जुड़े मुद्दों का धु्रवीकरण हुआ और वहां मोदी की अगुआई में राजग गठबंधन हारा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा और बसपा ने पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण किया। बसपा ने मुसलिम मतों का धु्रवीकरण करने की कोशिश में सौ से ज्यादा सीटों पर मुसलमान उम्मीदवारों को उतारा और मोदी ने इसका जवाब दिया शून्य मुसलिम उम्मीदवार से। और इस शून्य के बरक्स खड़ा कर दिया देश और देशभक्ति को। ऐन मौके पर जोड़े गए इस राष्ट्रवादी पाठ का विपक्ष के पास कोई जवाब नहीं था।

धु्रवीकरण का जवाब था ध्रुवीकरण। बिखरी हुई पहचान के लोहे को काटने के लिए मोदी ने देश नाम का लोहा पेश किया। श्मशान और कब्रिस्तान के बरक्स सोशल मीडिया पर चाहे जितने भी चुटकुले बने हों लेकिन मोदी एक संदेश देने में कामयाब हो गए। और वह यह था कि मुसलमान उनकी छतरी के नीचे सबसे महफूज रह सकते हैं। नरेंद्र मोदी गरीब-गरीब कहते हुए मध्यवर्गीय मानसिकता को साधते हैं। जिसके पास शक्ति है वही तो कुछ देगा। और इसके लिए भाजपा से सशक्त अभी और कौन सी पहचान हो सकती है। किसानों का कर्ज कौन माफ करेगा? मुसलमानों के लिए नीतियां कौन बनाएगा? कारपोरेट किसके साथ है?

वह कौन सी कौम है जो अभी तक महज बढ़ई, मिस्त्री, प्लंबर, कशीदाकारी, मीनाकारी और रेहड़ी पटरी तक महदूद है। जिसकी विश्वविद्यालय में, सियासत में, नौकरशाही में सबसे कम संख्या है? पहचान की राजनीति के तीन दशक बीत जाने के बाद उसका दायरा भी साफ-साफ दिख चुका है। इसकी बदौलत सत्ता तो मिल सकती है लेकिन सामाजिक न्याय नहीं।
नतीजे आने के बाद अगर लोग टीवी पर बोलने लगे कि मायावती को मायावती ने हराया है (अगर यह बात चुनावों के पहले समझ आती हमें) तो हम अपने दायरे में सिमट चुकी पहचान की राजनीति के बरक्स खड़े राष्ट्रवाद के अतिवाद को देख रहे हैं। पहचान की कई परतें हैं। गरीब, जाति और स्त्री सबके ऊपर राष्ट्र को खड़ा कर खुद को ‘मिले हुए लोगों’ का पीड़ित दिखाने में सफल हो गए। और इन पहचानों के बीच मार्क्सवादी वर्गीय चेतना जितनी तेजी से भुलाई जा रही है उसका भी सीधा फायदा ‘राष्ट्र’ की पैरोकारी कर रहे नरेंद्र मोदी को मिला।
इन चुनावों में पंजाब में ‘कांग्रेस-युक्त’ हो चुकी कांग्रेस ने गोवा और मणिपुर में जो मिसाल पेश की है वह यह बताने के लिए काफी है कि वह लड़ना भूल चुकी है। उत्तर प्रदेश चुनावों के वक्त जब राहुल गांधी ने शमशेर बहादुर सिंह की कविता पढ़ी थी ‘मैं हिंदी और उर्दू का दोआब हूं…’ तब भी लगा था कि यह चुनावी दुकानदार प्रशांत किशोर का पकड़ाया हुआ संवाद है जिसे बस जनता के सामने नायक (क्लाइंट) ने बोल भर दिया है। अगर राहुल गांधी शमशेर की कविता का मर्म समझते तो उन्हें अंतोन चेखव की यह बात भी समझ में आती कि संसार में अपनी बात कहे बिना कुछ नहीं मिलता, आप क्या चाहते हैं इसे दर्शाने में कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए या पाश की यह बात कि हम लड़ेंगे तब तक जब तक लड़ना जरूरी है।

गोवा और मणिपुर में कांग्रेस को जीत के कगार पर पहुंचाने वाले मतदाता आज कितने निराश होंगे, क्या यह कांग्रेस के कप्तानों ने सोचा है? जनता भी शायद यही सोच रही होगी कि जो लड़ना ही नहीं चाहते उसे क्यों जिताया? मायावती ने चुनावों के बाद पत्रकार सम्मेलन में बस इस बात का पर्चा पढ़ दिया कि उनकी हार ईवीएम मशीनों के कारण हुई है। हारे हुए अन्य पक्ष भी इस बात को उठा रहे हैं। लेकिन हमारा सवाल बस इतना है कि मायावती बस आरोप लगा कर ही चुप क्यों हो गर्इं? क्या वे और बसपा के नेता चंद हजार कार्यकर्ताओं के साथ ही चुनाव आयोग के सामने धरना नहीं दे सकते थे। क्या वे सैकड़े और हजार की संख्या में जनता को जुटा नहीं सकते थे कि हमारा वोट मायावती तक क्यों नहीं पहुंचा? इन चुनावों में जनता जितनी सक्रिय और मुखर है वही एकजुट होकर क्यों नहीं उनके पास पहुंची कि हमारा वोट आप तक क्यों नहीं पहुंचा? जनता की लड़ाई जनता के जरिए ही लड़ी जा सकती है। ईवीएम मशीनों को लेकर उठे संदेहों की जांच होनी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने इसे भरोसेमंद बनाने के जो उपाय बताए हैं (वीवीपीएटी) उसे पूरी तरह अमल में लाना चाहिए और लोकतंत्र पर भरोसे जैसी अमूल्य भावना के पीछे खर्चों को बहाना नहीं बनाना चाहिए। हां, अगर मायावती और केजरीवाल के पक्ष में जनता भी सड़कों पर उतर जाती तो ईवीएम पर सवाल उठते, जो नहीं हुआ।

शमशेर की पंक्तियों को पढ़ कर राहुल भूल गए लेकिन नरेंद्र मोदी ने बॉब डिलन की पंक्तियों के साथ खुद को परिवर्तन का वाहक बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस ‘परिवर्तन’ की अपनी-अपनी व्याख्या हो सकती है लेकिन आज नरेंद्र मोदी वह शख्स हैं जिसने हिंदुस्तान की राजनीति के पूरे पाठ्यक्रम में परिवर्तन ला दिया है।
राजनीति के पाठ्यक्रम में ‘परिवर्तन’ का यह पाठ विपक्ष जितना जल्दी समझ ले उतना अच्छा है। उत्तर प्रदेश के बाद 2019 की बात हो रही है। अगर विपक्ष नरेंद्र मोदी को इतनी आसानी से परिवर्तन लाने देगा तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदुस्तान की राजनीति में नरेंद्र मोदी, सत्ता हासिल करने के लिहाज से जवाहरलाल नेहरू के बराबर खड़े होंगे। मोदी की अगुआई में पार्टी शब्दश: अखिल भारतीय जनता पार्टी हो चुकी है।

अब विपक्ष जितनी जल्द अपना नया पाठ्यक्रम तैयार कर ले वही ठीक। आपकी आगे की लड़ाई और मुश्किल हो गई है। अमेरिका, इटली और फ्रांस वाले ‘उत्तर सत्य’ से निकल कर अपनी परिधि से बाहर निकलें। फासिस्ट और हिटलर जैसे शब्दों को ठंडे बस्ते में डालें, क्योंकि वे तो अपनी पहचान बॉब डिलन और मार्क्स के साथ बना रहे हैं और आप शमशेर को भी खारिज करवा बैठते हैं। बस इस मुगालते में न रहें कि कुछ समय बाद यह गुबार फूट जाएगा और आपके लिए खुद-ब-खुद रास्ता बन जाएगा। बिहार और केंद्र में नीतीश व मोदी की जिस तरह शराबबंदी और नोटबंदी वाली जुगलबंदी हुई है क्या, अब विपक्ष वैसा ही गठबंधन बना पाएगा? और नया पाठ्यक्रम भी मोदी से लेकर विपक्ष को एक ही बात कहता है, जनता को आसमान नहीं जमीन की चीज समझिए। जनपक्षीय काम कीजिए। नहीं तो परिवर्तन के वाहक बने चेहरे का भी उत्तर सत्य यही जनता तैयार करेगी।

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