ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल- धर्मक्षेत्रे संघक्षेत्रे…

ऐतिहासिक जनादेश के अपने-अपने पाठ हैं। जनादेश की ऐतिहासिक मशाल थामे योगी आदित्यनाथ का क्या संघ के सपनों से कोई नाभिनाल संबंध है?
यूपी सीएम पद की शपथ लेते हुए योगी आदित्यनाथ। ( Photo Source: Reuters)

जनादेश बेहतर कल की उम्मीद में ही दिया जाता है। हम तर्क दे सकते हैं कि चुने गए विधायकों में से एक भी मुख्यमंत्री क्यों नहीं? जिस एकमात्र मुसलिम को कैबिनेट में जगह मिली वह किसी भी सदन का नेता नहीं। सबका साथ और सबका विकास का उदाहरण देने के लिए मठ और योगी क्यों, संविधान क्यों नहीं? ऐतिहासिक जनादेश के अपने-अपने पाठ हैं। जनादेश की ऐतिहासिक मशाल थामे योगी आदित्यनाथ का क्या संघ के सपनों से कोई नाभिनाल संबंध है? लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश ने ‘राजधर्म’ के अटल संदेश के बरक्स संघ के धर्म-संदेश को जगह दी है। योगी-युग के संदेश को समझने की कोशिश में इस बार का बेबाक बोल।

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ लोकसभा में मोदीमुग्ध दिखे। अपने भाषण के पहले हिस्से में मोदी सरकार की झंडाबरदार योजनाओं के जयकारे के बाद उन्होंने सीधे गोरखपुर का जिक्र किया। कहा कि गोरखपुर में दिमागी बुखार की चपेट में आकर मरने वाले नब्बे फीसद बच्चे दलित और मुसलिम समुदाय के होते हैं, लेकिन पिछली सरकारों ने उनके लिए क्या किया? ढाई साल पहले मोदी जी आए, एम्स लाए और दवा दी। आदित्यनाथ के भाषण के विश्लेषण से पहले हम मोदी जी के कुछ समय पहले कहे बयान पर जाते हैं। उन्होंने कहा था, ‘पहले कोई एक्सिडेंट होता था तो खबर आती थी कि फलाने गांव में एक्सिडेंट हुआ है एक ट्रक और साइकल में, साइकल वाला इंजुअर हो गया एक्सपायर हो गया…धीरे-धीरे रिपोर्टिंग बदली। बीएमडब्लू कार ने एक दलित को कुचल दिया। सर मुझे क्षमा करना वो बीएमडब्लू वाले कार को मालूम नहीं था कि वो दलित थे जी। लेकिन हम आग लगा देते थे। एक्सिडेंटल रिपोर्टिंग होना चाहिए। अगर हेडलाइन बनाने जैसा है तो हेडलाइन बना दो’।

केंद्र जीतने और उत्तर प्रदेश जीतने के बाद ये दो बयान हमारे सामने हैं। दूसरे में पहचान की राजनीति पर हमला किया गया है और पहले में पहचान की राजनीति के छिलके उतार कर आंसू बहाए गए हैं। इसका मतलब यह भी है कि जब आप विपक्ष में होते हैं तो आपकी भाषा दूसरी होती है और सत्ता में होते हैं तो दूसरी। विपक्ष में जो शब्द ध्रुवीकरण के औजार के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं सत्ता में आने के बाद वह सबका साथ और सबके विकास में काम आता है।
उत्तर प्रदेश के नतीजों के आने के बाद ही प्रमुख संघ प्रचारक का बयान अखबारों में छपा कि लोगों ने यह जनादेश राममंदिर के लिए दिया है। नतीजों के बाद यूं ही नहीं आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ को राममंदिर निर्माण की मुहिम की अगुआई करने के लिए याद किया जाने लगा। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ लोकसभा में बता चुके हैं कि कैसे गोरखपुर में मुसलमानों की दुकानें हैं, उन्हें ‘गुंडाराज’ से आजाद रखा, दुकानदारों से हफ्ता वसूली नहीं हुई। यानी उत्तर प्रदेश से अलग गोरखपुर में उनका अलग राज चलता था, और राजा अपनी प्रजा को नुकसान नहीं पहुंचाता है। तो यही संदेश है ‘राम राज’ का। यानी राजा और प्रजा का संबंध।

इस राजा और प्रजा के ‘अनुलोम-विलोम’ पर चर्चा के पहले हम सत्ता संभालते ही ‘योगी-राज’ के कुछ शुरुआती संकेतों को समझें। उन्होंने अफरशाही को शपथ दिलवाई। यह शपथ मोदी जी के सपनों को पूरा करने के लिए थी। अफरशाही को सबसे पहले ‘अवैध बूचड़खानों’ और ‘रोमियो’ के खिलाफ लगाया। महिला उत्पीड़न पूरे समाज के लिए चुनौती है। लेकिन महिलाओं की मुक्ति के लिए आप प्रतीक क्या चुनते हैं? रोमियो और मजनू का। हमारी मिट्टी की कहानियों से निकला रांझा हो, मजनू हो या शेक्सपियर के मंच पर उतरा रोमियो। ये प्रेम के प्रतीक हैं। इन प्रतीकों को प्रेम करने की सजा मिलती है। आपने महिला सुरक्षा के नाम पर प्रतीक देकर सीधे-सीधे यह भी कहा है कि लड़का और लड़की का प्यार करना भी अपराध होगा। हमारे समाज में स्त्री उत्पीड़न की जो परतें हैं उसमें ‘रोमियो’ शब्द किस मानसिकता को तुष्ट कर रहा है यह बताने की जरूरत नहीं है।

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन बनेगा, तब तक यह अंदाजा ही था जब तक कि दिल्ली दरबार से एलान नहीं हो गया। लेकिन मुख्यमंत्री आवास के शुद्धीकरण दर्शन के लिए मीडिया के दरवाजे खोल दिए गए। चुनावी नतीजों के अनुमान से लेकर कौन बनेगा मुख्यमंत्री का खेल दिखा रहे मीडिया को जो चीजें सहर्ष, सव्याख्या दिखाई गर्इं उसका संदेश क्या गया? लहसुन-प्याज वर्जित, गाय का दूध, घी, हवन, देसी गाय, बाल पुरोहित आदि पांच कालीदास मार्ग के प्रतीक घोषित किए गए। इनके दिव्यदर्शन और इन पर घंटों विचार करने के लिए मीडिया पर कोई ‘पाबंदी’ नहीं थी। मीडिया इसमें जितना उलझ रहा था, संघ का संदेश उतना साफ जा रहा था। एक मुख्यमंत्री को राज्यपाल पद और गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं। यह शपथ संविधान की सुरक्षा के लिए ली जाती है। अभी तक संविधान ही हमारा दिशानिर्देशक रहा है। ‘सबका साथ और सबका विकास’ का पाठ संविधान से बेहतर और कहां से सीखा जा सकता है। अफसरशाही को भी इसी संविधान की रक्षा का पाठ पढ़ाया जाता है। हालांकि अभी तक सब कुछ संवैधानिक दायरे में रहने के बाद भी सबसे उपेक्षित संविधान ही दिख रहा है। मोदी की बात हो रही है, योगी की बात हो रही है। गोरखपुर के राजा-प्रजा वाले न्याय की बात हो रही है। लेकिन सबसे भुलाया सा हिस्सा संविधान ही है। मोदी के पहले जो अटल संदेश था वह ‘राजधर्म’ का था, और इसका सीधा संबंध संविधान से था। मोदी के बाद योगी के जरिए यह संदेश भी है कि ‘राजधर्म’ वाला अटल युग खत्म हो चुका है और संघ का धर्म-युग शुरू हो चुका है।

उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतते ही योगी का चेहरा सामने नहीं आया। और एक मुख्यमंत्री के साथ दो उपमुख्यमंत्री। इस चुनाव में उच्च जातियों की जो आवाज गूंजी है, दलितों का प्रभाव दिखा है वह एक तरह से अंतर्विरोध भी है। यह आगे किस रूप में शक्ल लेगा यह अहम है। जरा याद करें, योगी आदित्यनाथ संघ नहीं हिंदूवाहिनी का चेहरा रहे हैं। मोदी के खिलाफ भी जा चुके हैं। अभी तक राजपूतों का चेहरा राजनाथ सिंह थे। उन्हें भी विस्थापित किया गया है। राजनाथ सिंह के बेटे को मंत्रिपद नहीं दिया गया। योगी के जरिए एक वैकल्पिक और क्षत्रिय राजपूत का चेहरा लाने के साथ वंशवाद और अवसरवाद के दाग से भी हाथ धोना था।मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने उत्साह के साथ खुद को राहुल से एक साल छोटा और अखिलेश से एक साल बड़ा बताया। उम्र का अपना निहितार्थ है। संघ की सत्ता में एक दिन मोदी और शाह को भी मार्गदर्शक मंडल में बैठना हो सकता है। योगी के युवा चेहरे का यह भी एक पाठ है। उत्तर प्रदेश में आपके पास 325 विधायक थे। लेकिन आपको जनता के चुने गए विधायकों से एक भी जनता का मुख्यमंत्री बनाने लायक नहीं लगता है। यहां तक कि जनता अंदाजा भी नहीं लगा सकती है कि उसका नेता कौन होगा। और योगी के मुख्यमंत्री बनते ही प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्र के लखनऊ पहुंचने और कल्याणकारी योजनाओं पर योगी के साथ चर्चा की खबरें प्रधानमंत्री कार्यालय और उत्तर प्रदेश की सत्ता के नाभिनाल संबंध की ओर इशारा करने के लिए काफी हैं।

पहले जब हम संविधान के बाबत योगी और साध्वी के बयानों की बात करते थे तो उस समय कहे गए अनुपम खेर के शब्द आज भी आपको आसानी से यू-ट्यूब पर मिल जाएंगे कि इन सबको जेल जाना चाहिए। उस वक्त यह संदेश दिया जा रहा था कि ये चंद लोग मोदी जी के सपनों के खिलाफ हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मोदी ने गली-मोहल्ले तक में जिस तरह आक्रामक प्रचार किया था उससे वहां की आम जनता ने मोदी में अपने सबलीकरण का चेहरा देखा था। पिछले तीन दशकों में अपने अथक कार्यकर्ताओं के जरिए संघ ने जल-जंगल और जमीन पर कार्यकर्ता तैयार किए थे। अब जब वह चुनावी नतीजों में बदला तो विकास के सामने धर्म (हिंदुत्व) को रखने का यह सही समय था। पौराणिक ग्रंथों और मठों से सबका साथ और सबका विकास की व्याख्या संघक्षेत्रे की ओर बढ़ता कदम है।पिछले दिनों सुबह की सैर के बाद जब दूध का पैकेट लिया तो दुकानदार से पूछा कि भई दूध के दाम बढ़ा दिए? दुकानदार ने बड़े व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘साहब अब तो ये सवाल गृहणियां भी नहीं पूछतीं’। दुकानदार के इस तंज ने ‘मोदी युग’ से ‘योगी युग’ तक के सफर को बखूबी समझा दिया।

पिछले दिनों नोटबंदी के दौरान लोगों को काफी तकलीफ हुई, प्रधानमंत्री ने भी माना। वित्त मंत्री बजट में कालेधन के खिलाफ छेडेÞ गए इस अभियान का कोई हासिल नहीं बता पाए। लेकिन जब उत्तर प्रदेश के हर इलाके से ईवीएम मशीनों ने बताना शुरू कर दिया कि जनता ने सब तकलीफों को भूल मोदी जी के बताए ‘देश’ का साथ दिया है तो संघ के लिए इससे बेहतर समय कुछ और नहीं था, जब वो 2019 के संदेश के साथ योगी का चेहरा पेश करे। पैसे पर पहरा, रसोई गैस के आसमान छूते दाम, महंगे दूध पर जब जनता खामोश हो जाए, ये तो होना ही था, क्या कर सकते हैं वाला भाव आ जाए तो इसका भाव यही है कि अब सरकार बहुत मजबूत हो चुकी है। इसे लोकतंत्र की विडंबना ही कहा जा सकता है कि सबल जनता सरकार के एजंडे की सबसे बड़ी बाधा होती है। अब सरकार सबल है और जनता की उसके साथ मोल-भाव की क्षमता खत्म हो चुकी है। वो तो वोट देने के बाद रहस्यमी कथा के …कौन की तरह मुख्यमंत्री के किरदार का इंतजार करती है। ‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’ की तख्ती पलट चुकी है। अब गोरखपुर के योगी के जयकारे हैं।

2014 में जनादेश मोदी के पक्ष में था, और जनता 2017 में भी उनके साथ डटी रही। मोदी ने उत्तर प्रदेश में जनादेश की मशाल योगी के हाथ में दी है। इस तरह के ऐतिहासिक जनादेश के साथ सबका साथ और सबका विकास की जिम्मेदारी और अहम हो जाती है। जनादेश एक बेहतर कल की उम्मीद के पक्ष में ही दिया जाता है। मोदी और योगी इस जिम्मेदारी को बखूबी समझ रहे होंगे। अभी जनता और बेहतर कल की उम्मीद जिनके साथ हैं उनके लिए शुभकामनाएं। जनादेश के अपने-अपने पाठ के इतर लोकतंत्र के लिए एक बेहतर कल की उम्मीद हम सब करें।

योगी आदित्यनाथ इन तस्वीरों पर भी गौर कर लेते तो गैरभाजपाई वोटर्स भी हो जाते मुरीद

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. R
    rolu
    Mar 25, 2017 at 11:14 am
    Lagta hai America se aapki funding hai...
    (0)(0)
    Reply