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बेबाक बोलः विखंडित विकल्प- विजय पथ

पिछले कुछ चुनावों के बरक्स 26 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर नतीजे घोषित होने के बाद आम आदमी पार्टी की हार और भाजपा की एकतरफा जीत ने चौंकाया नहीं।

अखंड भारत के नक्शे, भारत माता की जयकार और यह देश है वीर जवानों का सरीखे देशभक्ति गाने से भक्ति प्रधान राजनीति की शुरुआत ‘आप’ ने ही की थी। कसमे-वादों को ‘बातें हैं बातों का क्या’ से आगे बढ़ा आंदोलन की भाषा में शामिल किया। जो अण्णा के खिलाफ बोलता ‘आप’ उसे भ्रष्टाचारी घोषित कर देते थे। लेकिन महज तीन साल में ‘आप’ से बड़े राष्टÑवादी आ गए और उनके देश और भक्ति का विस्तार निगम चुनावों तक हो गया। अब सारे कसमे-वादे बड़े राष्ट्रवादी के पास हैं। वही पक्ष भी, वही विपक्ष भी। वही लोक भी और वही लोकपाल भी। विपक्ष को विखंडित कर एकध्रुवीय राजनीति के बढ़ते विजयपथ पर इस बार का बेबाक बोल। 

पिछले कुछ चुनावों के बरक्स 26 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर नतीजे घोषित होने के बाद आम आदमी पार्टी की हार और भाजपा की एकतरफा जीत ने चौंकाया नहीं। आम आदमी पार्टी की प्रचार शाखा ने भाजपा नेता के लटके चेहरे के बरक्स केजरीवाल के कंप्यूटरीकृत ओजस्वी चेहरे का जो पोस्टर तैयार किया था उसका जाया होना तय लग रहा था। केजरीवाल अपने खिलाफ विजेंद्र गुप्ता का विकृत चेहरा तैयार करने में नाकाम रहे, लेकिन मोदी के जीवन से भी ऊपर का भरोसा दिलाते दिव्य चेहरे के आभामंडल में अन्य हर चेहरा गुमनाम हो गया।
जब केजरीवाल ने मतदान के बाद ही जुमला फेंक दिया कि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई तो हमें 272 में से 200 सीटें मिलेंगी तो साफ दिख रहा था कि अब उनके साथ वह मानवीय शक्ति नहीं रही जिसने उन्हें एक करिश्मा नुमाया किया था। आखिर एक समय के चमत्कारी नेता अरविंद केजरीवाल निगम चुनावों को भी निगम चुनावों की तरह नहीं लड़ पाए। निकाय चुनाव तो जनता से सबसे सीधा जुड़ा मुद्दा होता है। आपने जनता के साथ कैसे रिश्ते बनाए हैं उसका नतीजा प्रत्यक्ष तौर पर नतीजों में दिखता है। अगर जनता ने आपको वोट दिया होता और वह ईवीएम तक नहीं पहुंचा होता तो जनता आपके लिए जंतर मंतर पर खुद ही जुट आती। पंजाब, गोवा और दिल्ली के राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव के नतीजों के बाद जनता का मिजाज आम आदमी पार्टी के खिलाफ दिख गया था। भाजपा खेमे की ओर से धन्यवाद की पटकथा लिखी जानी शुरू हो चुकी थी। इस पटकथा में जिसे नायक घोषित किया गया, फिलहाल वह भाजपा को अपना सबसे मजबूत पक्ष दिख रहा है लेकिन वह एक कमजोर जनतंत्र की बानगी ही पेश करता है।

अमित शाह जब निगम चुनावों की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री को दे रहे थे और प्रधानमंत्री दिल्ली की जनता को धन्यवाद दे रहे थे तो भारतीय लोकतंत्र में यह भी इतिहास ही रच रहा था। निगम चुनावों का प्रधानमंत्री के चेहरे पर लड़ा जाना, भाजपा के लिए क्या संदेश देता है। हॉलीवुृड नायक सिलवेस्टर स्टोन की तरह पिछले तीन सालों से मोदी ही भाजपा की फिल्म का पूरा भार उठाए हुए हैं। यह एकल मानव चमत्कारी दस्ता नरेंद्र मोदी, एक मिथकीय नायक की तरह पेश हो चुके हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक अब आपका ही नायकत्व है, आपका ही संवाद है, आपकी ही क्रिया और प्रतिक्रिया है। किसी भी चरित्र अभिनेता के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है।

दिल्ली निकाय चुनावों में जब नरेंद्र मोदी जीत गए हैं तो फिर लुटियन क्षेत्र के अलावा दिल्ली निगमों का हाल उन्हें पता ही होगा। दिल्ली में सत्ता की केंद्रीय सड़क से निकल कर जब आप भलस्वा, आनंद विहार, मयूर विहार, पटपड़गंज या गाजीपुर की तरफ निकलेंगे तो देश की राजधानी कूड़े का मुकुट पहने हुए दिखेगी। आप इन सड़कों के अभ्यस्त नहीं हैं तो तेज दुर्गंध से आपको मितली आ सकती है, आंखों के आगे अंधेरा छा सकता है। भलस्वा के कचरा क्षेत्र में जब आग लगती है तो उत्तरी दिल्ली के रोहिणी और जहांगीरपुरी के बहुमंजिला इमारतों में बैठे लोगों की आंखें जलने लगती हैं। सड़क पर फैले कचरे के कारण कई वाहन सवार हादसे का शिकार हो बैठते हैं।

जी, यह सब दिल्ली की स्थानीय समस्याएं हैं। लेकिन दिल्ली के इन घरेलू मुद्दों के जिम्मेदार भाजपा के पार्षद थे, यह केजरीवाल साहब जनता को नहीं समझा पाए। हां, भाजपा ने जनता को जरूर समझा दिया कि पार्षदों से हिसाब मांगने में वक्त मत गंवाओ। विघ्नहर्ता मोदी जी सब ठीक कर देंगे।
पिछले कुछ समय से मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पावन नदी के रूप में तब्दील कर दी गई है जिसमें डुबकी लगाते ही सारे पाप धुल जाते हैं। जो चीज कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी में गलत होती है, भाजपा में आते ही मोदी और शाह की शाहकार जोड़ी की छुअन से पाक हो जाती है। ये उस मसीही संदेश के भी ब्रांड अबंसेडर लगने लगे हैं कि घृणा पाप से करो, पापी से नहीं। 2014 में चुनावों से लेकर अब तक आपके लिए सबसे घृणित कांग्रेस है, लेकिन कांग्रेसी आपको उतने ही प्रिय हैं।
उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, मणिपुर हो या दिल्ली। हारती पार्टी को मझधार में छोड़ हर अवसरवादी, बागी कांग्रेसी को आपने जितने प्रेम से हृदय लगाया वह राजनीतिक शुचिता की एक नई परिभाषा गढ़ गया है। चार दशकों तक कांग्रेसी विचारधारा और नेहरु मॉडल के प्रचारकों पर लगे आरोपों को आप जितनी जल्दी भूलकर उन्हें दीनदयाल के दर्शन में ढाल लेने का दावा करते हैं उससे तो आप विचारधाराओं के अंत के प्रचारक लगने लगते हैं। हंगामा तो बहुत बरपाया था दस-जनपथ और कांग्रेस आलाकमान वाली संस्कृति पर। पहले हर कांग्रेसी सोनिया गांधी के सुर में बोलता था तो आज हर भाजपाई मोदी-मंत्र पर मुग्ध है। कैसे, कब और क्यूं के हर सवाल का जवाब नरेंद्र मोदी नाम के दो शब्द से निकलता है। तो अगर कांग्रेसी नेता आप पर आरोप लगा रहे हैं कि आप कांग्रेस-मुक्त भारत नहीं कांग्रेस-युक्त भाजपा का निर्माण कर रहे हैं तो क्या गलत है। लग रहा है कि साठ सालों बाद कांग्रेस से ऊबी जनता एक नई कांग्रेस खड़ी कर रही है।

पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से नरेंद्र मोदी लगातार चुनाव लड़ रहे हैं। दिल्ली विधानसभा से लेकर बिहार और दिल्ली नगर निगम तक के चुनाव उनके चेहरे पर लड़े गए। मोदी चुनाव लड़ते हैं और जनता को मनोहर लाल खट्टर, रघुवर दास और आदित्यनाथ योगी देते हैं। चुने गए विधायकों में से एक भी चेहरा मुख्यमंत्री बनने के योग्य नहीं समझा जाता है। जब चंडीगढ़ के 26 सीटों वाले निगम का चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जाए तो साफ संदेश जाता है कि कांग्रेस की तरह भाजपा में भी दूसरी, तीसरी या चौथी पंक्ति के नेता नहीं हैं। जमीनी मुद्दों से भटकाने के लिए नरेंद्र मोदी का आसमान सरीखा अतुलनीय चेहरा पेशतर है।

मोदी सरकार का स्वच्छता अभियान कागजी चरम पर है। चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली सारे निगमों पर मोदी जी जीत गए हैं। उत्तर भारत से लेकर महाराष्टÑ तक के शहरों के निकायों को हिंदुत्व की विचारधारा से जितनी आसानी से जीत लिया गया है क्या इन शहरों को कूड़े से मुक्त कर देना, बिजली, पानी, सड़क की सुविधा सारी जनता को दे देना उतना ही आसान है। यह बात तो उस शहर को देख कर आसानी से समझी जा सकती है जहां, गंगा मैया ने आपको बुलाया था। लेकिन आप यह बखूबी जानते हैं कि गंगा मैया वोट देने के लिए बुलाती है लेकिन वह यह सवाल नहीं पूछती कि महामानव का शहर इतना गंदा क्यों, मैं मैली क्यों?

गंगा तो सबका भार सहन कर ही लेती है पर सवाल यह है कि डेंगू के डंक और कचरे का दुर्गंध झेल रही जनता क्या संदेश दे रही है? क्या उसे भरोसा है कि जिस पार्टी के पार्षद दस साल से दगा दे रहे थे उसके प्रधानमंत्री अब वफा करेंगे? और अगर यही हाल रहा तो क्या 2019 में भी इसी एकल चमत्कारी दस्ते पर जनता भरोसा कर लेगी? भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के अलावा हालिया चुनाव एक नए समाज को लेकर भी संदेश दे रहा है। समाज को यथावत रख राजनीति के जादू से सब कुछ बदल जाने की उम्मीद पाले जनता एक कठिन पाठ बन गई है। विकल्प का आंधी की तरह जन्म लेना और उसकी नाकामी पर सबक लेने के बजाए प्रतिशोध में उसे दफन कर देने की जो प्रवृत्ति दिख रही है वह जम्हूरियत की जंग को कमजोर ही करेगी। विखंडित विकल्प और विपक्षविहीन जनतंत्र का यह तात्कालिक दौर फिलहाल डरावना दिख रहा है। कुछ समय पहले विचारधारा के अंत का जो जुमला उछला था, वह साबित होता सा दिखने लगा है।

दुनिया बदल गई है तो आपका (भाजपा) नजरिया भी बदल गया है। अब समय हिसाब नहीं मांग रहा है। जो कांग्रेस की नीति थी वही अब आपकी है। आप स्वेदशी को त्यागते हैं और कांग्रेसी को गले लगाते हैं। आम ने वाम का जुमला लिया और वह भी पिट गया। इतने कम समय में विकल्प का सहचर विखंडन बन गया। अमित शाह जब रचनात्मक विपक्ष की बात करते हैं तो वे एक खोखले जनतंत्र की ओर भी इशारा करते हैं। यानी विपक्ष सरकार की नीतियों का पोषक बने नहीं तो उसे अराजक और विखंडनवादी करार दिया जाएगा। निगम के चुनाव को मोदी लहर घोषित कर बंगाल और केरल को लक्ष्य बनाने का दावा किया जा रहा है। इसके पहले भी बिहार हो या बंगाल जहां विकल्प था, वहां लहर बनने में परेशानी हुई। विकल्प के बांध को तोड़ मोदी लहर जिस तेजी से 2019 की ओर बढ़ रही है वह एकरेखीय राजनीति की धारा बना रही है। फिलहाल तो नागपुर से लेकर फ्रांस तक का पाठ हमारे सामने है।

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