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बेबाक बोलः महागुन के मायने

आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे गरीबों के हित में बताया था।
(जनसत्ता फोटो)

दिल्ली से सटे नोएडा में अमीरों की बस्ती बनाने का काम शुरू होता है और देश के विभिन्न हिस्सों से आए बेरोजगारों को रोजी-रोटी का सहारा मिलता है। कुछ सालों में जब निर्माण कार्य पूरा होता है तो ये उस इमारत में रहने आए लोगों के सहायक बन जाते हैं और चमचमाती सोसाइटी से कुछ दूर अपनी झुग्गी बसा लेते हैं। सालों तक फ्लैट मालिकों और स्थानीय प्रशासन को यह सहज लगता है। लेकिन अचानक एक सुबह उपद्रव के बाद ये झुग्गियां अवैध बताकर तोड़ दी जाती हैं और मालिकों से अपने तरीके से निपटने गए कामगारों पर हत्या की कोशिश तक का मामला दर्ज हो जाता है। नोएडा में हुआ यह हादसा जब अमेरिकी मीडिया में भी जगह पाता है तो हमारी आंखें खुलती हैं कि क्या यह किसी बड़े खतरे का संकेत है। महागुन सोसाइटी में दो वर्गों के बीच पैदा हुए तनाव के मायने पर इस बार का बेबाक बोल।

आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे गरीबों के हित में बताया था। 30 जून 2017 की मध्यरात्रि को संसद के ऐतिहासिक आयोजन में जीएसटी लागू करते वक्त इसे भी गरीबों के हितकारी फैसले के खाते में डाला। दिल्ली से सटे नोएडा की एक आधुनिक रिहाइशी सोसाइटी में फ्लैट मालिक और घरेलू कामगार के बीच तनाव के बाद उपद्रव होता है। कामगारों का खेमा अपनी गुमशुदा साथी की तलाश को अपने तरीके से हल करने की कोशिश में ऐसा करता है। और, इसके बाद स्थानीय प्रशासन सोसाइटी से सटी झुग्गी बस्ती हटा देता है। जब मानसून झमाझम बरस रहा है तो सरकार उन गरीबों की झुग्गी बस्ती को बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए तोड़ देती है जो इस फसाद के बाद अचानक से अवैध का तमगा हासिल कर लेती है। इसके पहले जब वे झुग्गियां बन रही होती हैं तो उन्हें देख कर भी अनदेखा किया जाता है। आखिर वोट बैंक का सवाल है। यही नहीं सभी पार्टियों के नेता पार्टी लाइन से इतर वहां हाथ जोड़ने जाते हैं कि मुहर साइकिल, कमल, हाथ या हाथी के निशान पर लगाएं। नोटबंदी और जीएसटी गरीबों के भले के लिए भले ही लाई गई हों लेकिन अब केंद्र सरकार के मंत्री ही इन प्रवासी मजदूरों को सबक सिखाने की बात करते हैं। गरीबों की भलाई के लिए उनके खातों पर पहरा लगा देने वाली सरकार के मंत्री खुलकर उच्च मध्यवर्गीय मॉडर्न सोसाइटी के बाशिंदों के पक्ष में आए और प्रशासन को अचानक से अधिसूचित जमीन पर अतिक्रमण का खयाल आता है।

नोएडा के महागुन सोसाइटी में कामगारों के हंगामे को कई तरीके से देखा गया। घरेलू सहायिका ने चोरी की, अपराध कबूला, मालिक का नौकर से भरोसा टूटा, समाज और सोसाइटी के बीच बढ़ती खाई पर भी चिंता जताई गई। वर्गीय विभेद की तो बात है ही। लेकिन इस समस्या को सिर्फ नौकर बनाम मालिकों के रिश्ते के तौर पर नहीं देखा जा सकता। जैसे नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक मुद्दों का तार गरीबों से नत्थी किया जाता है, वैसे ही इस समस्या का तार उस अर्थतंत्र से जुड़ा हुआ है जो हर चीज का केंद्रीकरण करता जा रहा है। नोटबंदी और जीएसटी से गरीबों को कितना फायदा हुआ फिलहाल यह आंकड़ा न तो उर्जित पटेल के पास है और न वित्त मंत्री के पास। लेकिन एकरैखिक दिशा में जाते राजमार्ग के सिकुड़ते अर्थतंत्र का सीधा रास्ता नोएडा की आसमान छूती सोसाइटी की दीवार के सहारे खड़ी की गई प्रवासी मजदूरों की झुग्गी से जुड़ता है।

जिन्होंने पहले सोसाइटी वालों पर अपना गुस्सा उतारा और बाद में शासन प्रशासन का जिन पर गुस्सा उतरा उन्हें समाजशास्त्र की शब्दावली में प्रवासी मजदूर कहते हैं। उजड़े हुए लोग ही प्रवासी कहलाते हैं। यहां पर ये बंगाल के हैं, लेकिन ये बिहार, ओड़ीशा, आंध्र प्रदेश या कहीं के भी हो सकते हैं। ये अपने राज्यों से उजड़ते हैं क्योंकि वहां किसी भी तरह के रोजगार की संभावना खत्म कर दी गई है। पिछले तीन दशकों से सरकारी नीतियों के केंद्रीकरण का ताजा उदाहरण जीएसटी भी है। उदारीकरण अपने साथ-साथ केंद्रीकरण का औजार भी लेकर आता है। स्वाभाविक है कि केंद्रीकरण की नीति हाशिए पर पड़े लोगों को और विस्थापित करेगी। हाशिए के लोग उजड़ेंगे और केंद्र की तरफ आएंगे।

उदारीकरण का असर राज और समाज के हर स्तर पर पड़ना चाहिए था। लेकिन अफसोस की बात है कि उदार राज और बाजार में समाज उतना ही संकीर्ण रहा। शहरीकरण के दौरान कोई प्रक्रियागत परिवर्तन नहीं हुए और सामंती मूल्य ही हावी रहे। गांव का ठाकुर का कुआं मॉडर्न नाम का पुछल्ला लगाए हाउसिंग सोसाइटी में भी है ‘नौकरों और दाइयों’ के लिए अलग लिफ्ट के नाम पर। बड़ी बहुमंजिला सोसाइटियों में तो मजबूरन अलग लिफ्ट भी बना दी गई हैं लेकिन जिन सोसाइटियों के पास इतना संसाधन नहीं है और जो आकार में छोटी हैं उनमें बहुत जगह घरेलू सहायकों के लिए लिफ्ट का प्रयोग वर्जित है। उन्हें सीढ़ियों का ही इस्तेमाल करना है। बहुत से घरों में इनके शौचालयों के इस्तेमाल पर भी पाबंदी है।

और, आज इस वर्ग के लोगों के लिए इस्तेमाल करने वाले शब्द पर ध्यान दें नौकर, नौकरानी, बाई, कामवाली, मेड से आधुनिक होकर मामला घरेलू सहायकों तक पहुंचा। इन शब्दों के सामाजिक और राजनीतिक मायने भी हैं। हेल्पर या सहायक का मतलब है कि इन्हें एक श्रमशक्ति के रूप में पहचान नहीं मिली है। ये श्रम संसाधन के तौर पर नहीं देखे जाते हैं क्योंकि ये किसी तरह का उत्पादन नहीं कर रहे हैं। चूंकि ये उत्पादन श्रेणी से बाहर हैं इसलिए इन पर कोई श्रम कानून भी लागू नहीं होता है, इसलिए केंद्रीय मंत्री भी सबसे पहले इनके खिलाफ ही खड़े होते हैं।

दूसरी तरफ, जो समाज है वह भी इनके साथ सामंती मूल्यों के साथ रिश्ता बनाता है। मेहनताने की कोई तय दर नहीं, मोहल्ले वालों ने जितना तय कर लिया उतना देना है। बाकी सब कुछ मालिकों की दया पर निर्भर है। दयावान मालिकों के किस्से हैं कि कामवाली की बेटी की शादी में मदद कर दी, बच्चों के अंग्रेजी स्कूल की फीस भर दी, बचे खाने को फ्रिज में रखने के बजाए उन्हें पकड़ा दिया, लेकिन यह सब उस स्तर पर ही निर्भर है कि मालिक कितना दयालु है। गांवों, कस्बों, शहरों से लेकर महानगरों तक में फैले इतने बड़े वर्ग को ‘मालिकों की दया’ पर ही छोड़ दिया जाता है। और दया का अपना दायरा है। दया का भाव तभी तक रह सकता है जब तक सामने वाला दीन दिखे। तो क्या इतने बड़े वर्ग को आगे भी सिर्फ मालिकों की उस दया के भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा जिसका दायरा बहुत जल्दी सिकुड़ जाता है?

महागुन मामले में आधुनिक नोएडा पुलिस का भी वही पारंपरिक चेहरा दिखा। घर के मालिक हों या वहां काम करने वाले सहायक। पुलिस और प्रशासन पर दोनों का भरोसा नहीं है। दोनों पक्षों में से कोई भी पहले पुलिस के पास नहीं गया और अपने-अपने समूहों के जरिए ही मामले को सुलझाने की कोशिश की। दोनों पक्षों को लगता है कि पुलिस के पास जाने का कोई हासिल नहीं है और हमें ही परेशान होना है। उच्च मध्यम वर्ग से लेकर हाशिए पर पड़ा कमजोर तबका तक पुलिस के झंझट में नहीं पड़ना चाहता। इसलिए पुलिस आम हिंदी फिल्मों की तरह सब कुछ हो जाने के बाद सबसे अंत में पहुंचती है। अब पुलिस का काम घटित घटना पर कार्रवाई करना मात्र हो जाता है। मामले के बेकाबू होने से पहले तक पुलिस और प्रशासन दोनों गायब हैं और बाद में जब कार्रवाई होती है तो सरकार के अनुसार ‘सबक सिखाया’ जाता है और कल तक खड़ी झुग्गी अवैध बताकर गिरा दी जाती है।

दुखद पहलू यह है कि इस पूरे मामले को चोरी के आरोप से बढ़ाकर सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। और, यह वही प्रवृत्ति है जो पिछले कुछ समय से ऊपर से चली आ रही है। समस्या का समाधान निकालने के बजाए दोनों पक्षों को एक-दूसरे के खिलाफ कर दिया गया। एक वर्ग के लोग दूसरे वर्ग के खिलाफ हो गए, दोनों एक-दूसरे से डरे हुए हैं। यह उदारीकरण का सबसे बड़ा औजार है जो लोगों को संगठित नहीं होने देता और कुल मिला कर हर किसी को दूसरे से डरा कर रखता है। बस लोग डरे रहें और समस्या के समाधान के रूप में विकल्प पैदा नहीं कर सकें।

महागुन मामले से समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र की जो खामियां उभर कर आई हैं उस पर चर्चा करने से परहेज किया जा रहा है। मध्यम या ऊंचे तबके के घरों में जो लोग सहायक के रूप में काम करने आते हैं क्या वे जरूरी हैं? और, अगर जरूरी हैं तो उन्हें सामाजिक उत्पादन की श्रेणी में होना चाहिए या नहीं? और, अगर ये सामाजिक उत्पादन के लिए जरूरी हैं तो इन्हें अपनी सुविधानुसार अवैध का तमगा क्यों? राज्य इन्हें वैध नहीं मानना चाहता क्योंकि ये प्रवासी हैं। लेकिन जब रोजगार के साधनों को दिल्ली और उसके उपनगरों तक ही समेट दिया जाए तो हाशिए पर पड़ा तबका क्या करे।
महागुन के मसले को झुग्गी उखाड़ कर खत्म मान लेने की चूक नहीं करनी चाहिए। अगर इस तरह के संघर्ष बढ़े तो सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिकता पर है। सामाजिकता एक माध्यम है इस तरह के विवादों को नियंत्रित करने का, इसलिए इसकी खाई और चौड़ी न होने दी जाए। प्रवासी कामगारों के बीच ऐसा गुस्सा जमता गया तो फिलहाल आपके पास कोई तरीका नहीं है इसे नियंत्रित करने का। आज, इस समस्या पर संवाद से परहेज करेंगे तो कल और बड़ी अराजकता के लिए तैयार रहें। इसका हल अभी से शुरू हो – राज और समाज से संवाद।

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